आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा!

आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।

धन्वंतरि समारम्भां, जीवकाचार्य मध्यमाम् । अस्मद् आचार्यपर्यन्ताम् , वन्दे गुरु परम्पराम् ॥

विभिन्न संहिताओं, ऐतिहासिक ग्रंथों, संस्कृत के ग्रंथों में आयुर्वेदिक की उत्पत्ति का विवरण उपलब्ध है। आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।चरक मुनि ने ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ कहकर आयुर्वेद को शाश्वत बताया है। आयुर्वेद अविरत चलायमान है और इसकी रक्षा अविरत होती रहती है।

 संहिताओं में निहित ज्ञान के आधार पर सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने करी। सहस्त्रों-सहस्त्रों वर्षों पहले सृष्टि की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद व अथर्वेद में उसका वर्णन है। विशेषकर तैत्तिरीय उपनिषद में बताया गया है:

“तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूत: | आकाशाद्वायु:| वायोरग्नि: | अग्नेराप: |अद्भ्य: पृथिवी | पृथिव्या औषधय: | औषदिभ्यो S न्नम् | अन्नात्पुरुष: ||

उस एक तत्व से आकाश की उत्पत्ति हुई, उसके बाद पंचभूतों की और फिर अनेक प्रकार के महाभूतों की क्रम से उत्पत्ति हुई, अंत में अन्न से मनुष्य की उत्पत्ति हुई। समस्त ब्रह्मांड की रचना की बात बहुत जगह पर आयी है। उन सबके पश्चात एक शास्त्र की रचना हुई।

जैसे कोई व्यक्ति एक यंत्र बनाता है, तो उसे बनाने के बाद उसकी एक अनुदेश पुस्तिका (user manual) निर्मित होती है, जिसमें उससे संबंधित सभी दिशा निर्देश होते हैं, बताया जाता है की उसकी विशेषता क्या है, उसे किस तरह से उपयोग करें, किस तरह से उपयोग न करें – यह सब संकलित कर वह निर्देश पुस्तिका यंत्र के साथ दी जाती है।  सृष्टि के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसकी रचना के बाद एक शास्त्र की रचना हुई जो मानव जीवन की एक प्रकार की निर्देश पुस्तिका है। इस शास्त्र को केवल मानव जीवन का नहीं, सर्व भूतों के जीवन की निर्देश पुस्तिका कहा जा सकता है। 

जिस शास्त्र की रचना हुई वह जीवन से जुड़ा हुआ था, इसीलिए उसका नाम आयुर्वेद रखा गया। आयु अर्थात जीवन, वेद अर्थात ज्ञान। जबसे सृष्टि का आरम्भ हुआ, तबसे अनेक प्रकार की बाधाओं से बचने के लिए, मनुष्य के शरीर को, मन को, आत्मा को, बुद्धि को, व्यवहार को समझने के लिए आयुर्वेद की रचना करी गयी। कोई भी परंपरा इतनी पुरानी नहीं होगी, जितना पुराना आयुर्वेद है। 

आयुर्वेद के सबसे पहले उपदेशक ब्रह्मा थे। वहाँ से आयुर्वेद की परंपरा का आरम्भ हुआ। ब्रह्मा अर्थात सर्जक! जो व्यक्ति सर्जन करता है वह उस कोटि का व्यक्ति है जो ईश्वरीय रूप है, जो पूर्णता की ओर है। वह ईश्वर वो नहीं जिसे हम मानते हैं, परंतु ईश्वरीय अर्थात जिसकी चेतना पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध है, ऐसे ब्रह्मा हैं। दो प्रकार की परम्पराओं का वर्णन, चरक संहिता में व सुश्रुत संहिता में आता है, दोनों ने ब्रह्मा जी को आयुर्वेद का प्रथम सर्जक बताया गया है। 

ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया। दक्ष प्रजापति अर्थात जो दक्ष है, कार्यकुशल है तथा प्रजापति अर्थात जो प्रजा को पालने वाले हैं, प्रजा की रक्षण की जिसकी बुद्धि है। ये नाम गुण को परिभाषित करता है, इन गुणों से युक्त व्यक्ति दक्ष प्रजापति है।  जो बौद्धिक हो और भौतिक न हो, अर्थात अंदर से तो वह बुद्धता को, आत्मा की चेतना को प्राप्त हो, परंतु बाहर से (प्रजा के)शरीर की रक्षा को प्रतिबद्ध हो। क्योंकि वह जानता है कि आत्मा तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम जो सीढ़ी है वो शरीर से आरम्भ होती है। इसलिए ये चिकित्सा के उद्भव का श्रेय ब्रह्मा, उसके बाद दक्ष प्रजापति को जाता है।

दक्ष प्रजापति से ये ज्ञान अश्विनी कुमार को मिला है। अश्विनी कुमार दो हैं। हमारे यहां 33 कोटि (यानी प्रकार) के देवी देवता हैं। उन 33 में से यह दो अश्विनी कुमार युग्म के रूप में मिलते हैं [अश्विनी कुमारों के बारे में बहुत सारी लक्षणा है, इतिहास है, सत्य है, तथ्य है जिनकी चर्चा किसी अन्य अवसर पर करी जाएगी ]।  देवों के वैद्य के रूप में जो ख्यात हैं, वह  दक्ष प्रजापति से ज्ञान प्राप्त अश्विनी कुमार हैं। 

अश्विनी कुमारों से यह ज्ञान देवराज इंद्र ने लिया। देवराज इंद्र एक ऐतिहासिक व पौराणिक पात्र हैं। मनुष्यलोक के सामान एक देवलोक है, देव सृष्टि है  जिसके प्रतिनिधि इंद्र हैं। 

पशुओं की और मनुष्यों की भिन्न सृष्टि है और न दिखने वाली भी पशु सृष्टि हैं – एक वायरस (विषाणु) की सृष्टि है, एक बैक्टीरिया (कीट) की सृष्टि है। ये सूक्ष्म ऊत सृष्टि धीरे धीरे आज भैतिक साधनों के कारण ज्ञात होती जा रही है, दिखाई देती जा रही है। आज सूक्ष्मतम यंत्र से सूक्ष्मतम जीवाणु दिखाई देते हैं। साधन की सहायता से उसका अनुभव किया जा सकता है। किंतु आत्मा की चेतना जब ऊपर जाती है, तो वो कोई साधन की सहायता से नहीं, अपितु साधना के बल पर जाती है, ऐसी ही उत्तम चेतना से परिपूर्ण देवलोक की पूरी सृष्टि है। जैसे एक वायरस की या बैक्टीरिया की अज्ञात सृष्टि है, उसी तरह देवलोक की भी एक अज्ञात सृष्टि है। वो भी दिखाई पड़ती है, उसका भी अनुभव होता है। उसके लिए आत्मा की चेतना की अवस्था उत्तम होनी चाहिए। 

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥  

ब्रह्मा ने ऐसा कल्प के आदि में उत्पन्न प्रजाओं से कहा। इसलिए देवराज इंद्र, जो देव सृष्टि के प्रतिनिधि हैं, उन्हें आयुर्वेद का ज्ञान मिला।  यहाँ तक आयुर्वेद की अलौकिक परंपरा पूरी होती है। जहाँ पर देव सृष्टि है – जहाँ पर चेतना को उपलब्ध हुए जीवों को जो अनुभव होता है, उसे अलौकिक परंपरा कहते हैं जिसमें सर्वप्रथम ब्रह्मा हैं और अंत में इंद्र हैं। इसके बाद लौकिक परंपरा आरंभ होती है। 

देवों को जब कुछ परिवर्तन करना होता है, कुछ परिणत करना होता है तो वह मनुष्यों को खोजते हैं।  जिसके पास उत्तम वस्तुएँ होंगी और वह व्यक्ति यदि उत्तम चेतना वाला होगा – मनुष्य जीवन में देखें तो सात्विक चेतना वाला होगा – तो देव उसे उत्तर में अधिकारी के रूप में देखेंगे। देव सबसे योग्य व्यक्ति को ढूँढता ही रहता है। इंद्र ने भी आयुर्वेद के लिए ऐसा व्यक्ति खोजा और उन्हें वह भारद्वाज ऋषि के रूप में मिल गया।

इंद्र ने एक परंपरा के अनुसार आयुर्वेद का ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया। यहाँ से आयुर्वेद की लौकिक परंपरा आरम्भ हुई। ‘इमं द्विज भार’ ऐसा भारद्वाज शब्द की व्युत्पत्ति बताई है। जिसे संभालने की बुद्धि है, वह भारद्वाज, उन्हें इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान दिया।

इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान मिलने के बाद भारद्वाज ने ऋषि परिषद करी [पहले के ऋषि-मुनि उत्तम चेतना को उपलब्ध थे इसलिए जो ज्ञान मिला उसे वो वितरित करना चाहते थे। ज्ञान की ऐसी अदभुत परंपरा रही जिसमें न कोई प्रमाण पत्र देना था, न ही कोई पैसा लेना था और न ही अन्य कोई बातें थीं]। उस ऋषि परिषद में अत्रि मुनि ने भी भाग लिया। अत्रि मुनि का बहुत जगह पर वेदों में भी वर्णन है। ‘त्रिगुणात अतीत: अति अत्रि’, अर्थात  तीनों गुणों से पर जो व्यक्ति हो गया वह अत्रि। 

उस ऋषि परिषद के पश्चात आयुर्वेद के ज्ञान की परंपरा को अत्रि मुनि ने आगे बढ़ाया। अत्रि मुनि से आयुर्वेद की वास्तविक परंपरा आरम्भ होती है। अत्रि तक ये आयुर्वेद ज्ञान परंपरा श्रुति रूप में थी। 

अत्रि ने इस आयुर्वेद की परंपरा का अपने शिष्य व पुत्र आत्रेय को ज्ञान दिया। अब तक ये उपदेश मौखिक थे। क्योंकि पहले की वैदिक परंपरा श्रुत परंपरा थी यानी सुना हुआ याद रखना। इसलिए वेद भी श्रुति कहे जाते हैं। क्योंकि सुना हुआ बहुत महत्व का होता है। संस्कृत में विद्वान को ‘well read’ नहीं कहते, ‘बहु श्रुत’ कहते हैं। सुना हुआ, पढ़े हुए से बहुत गहरा होता है। 

पुनर्वसु आत्रेय का उपदेश, चरक संहिता ग्रंथ में पाया जाता है। चतकर्ण, पाराशर, भेल इन ऋषि मुनियों का भी वर्णन चरक संहिता में दिया गया है। 

आत्रेय ने आयुर्वेद के ज्ञान से आगे छह शिष्यों को तैयार किया, उनमें से एक अग्निवेश थे। अग्निवेश, भेल, चतकर्ण, पाराशर, क्षिप्रणि, हर्षता वह छह शिष्य थे। अनेक लोगों की संहिताएँ हैं, इन सभी ऋषियों के नाम से भी संहिता लिखी गयी हैं। ये छह शिष्य श्रोता थे। उन्होंने पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश को ग्रहण किया। उसके बाद अग्निवेश के पारगामी बुध्दि रचित तंत्र की रचना हुई [तंत्र की शास्त्रीय, दार्शनिक परिभाषा, संहिता की रचना किस प्रकार होती है, आदि किसी अन्य समय। यह एक कोर्स बनाने जितना सरल नहीं है], जो सबसे बड़ा कार्य हुआ। अग्निवेश के बाद ये तंत्र कालक्रम से चलता रहा। मूल उपदेश का तंत्र बनाया गया था, उसमें कालानुक्रम में कुछ मिश्रित होता गया और कुछ निकलता गया।  मूल आयुर्वेद के उपदेश से कुछ न कुछ अलग होता गया, कुछ दूषित भी हुआ।

चाणक्य ने बताया है कि अन्य किसी क्षेत्र में भ्रष्टाचार सह्य हो सकता है परंतु चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में, उनकी व्यवस्था में लेश मात्र भी यदि भ्रष्टाचार हो तो कोई भी व्यवस्था सही नहीं बचेगी और समाज की बहुत हानि होगी। चिकित्सा के क्षेत्र में यदि भ्रष्टाचार हुआ तो वह कभी सह्य नहीं होगा, ये चुकाना पड़ेगा। आयुर्वेद में लोभ एक तरह से वर्जित है, अगले जन्म में, इस जन्म में बहुत भोगना पड़ता है। कुवैद्य की निंदा करी गयी है और सुवैद्य की प्रशंसा करी गयी है। 

अग्निवेश के तंत्र के बाद एक ऋषि आये जिन्हें हम चरक कहते हैं। चरक पारगामी बुद्धि के ऋषि थे, उन्होंने अग्निवेश तंत्र का परिमार्जन, पुनर्गठन किया। उन्होंने देखा की अग्निवेश तंत्र में क्या दूषित हुआ है और उसके लिये क्या किया जा सकता है, ये उन्होंने एक बहुत बड़ी क्रांति रूपक बात आरम्भ करी और चरक संहिता की रचना करी।  इसलिए कहा जाता है की अग्निवेश ने तंत्र लिखा, उसका प्रतिसंस्कार चरक ने किया। वह संहिता इतनी ख्यात हुई की चरक को ‘father of indian medicine’ कहा जाता है। 

चरक दो प्रकार के हैं: एक परंपरा का नाम है चरक (जैसे शंकराचार्य एक परंपरा का भी नाम है जो उनकी पीठ से चलता है और समकालीन शंकराचार्य गुरु व्यक्ति रूप भी हैं)और दूसरा ऋषि प्रकति का, उत्तम ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति भी चरक है । उन्होंने प्रज्ञा व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया, उसका भी नाम चरक हो गया। क्योंकि ‘चरैवेति चरैवेति’, वे अनेक स्थानों पर जाते थे, सदा चलायमान रहते थे इसलिए उनका नाम चरक पड़ा। कई जगह वर्णन है की चरक और पतंजलि, दोनों एक ही हैं। जिन्होंने योगसूत्र लिखा है, उन्होंने ही अपना एक उपनाम चरक रखा है। चरक संहिता में उनके व्यक्ति विशेष पहचान के लिए कुछ नहीं मिलता है। किन्तु  इतिहास के अनेक ग्रंथ देखे जाएँ तो ये भी पता चलता है कि वह राजा तनिष्क के यहां राजवैद्य थे। 

चरक मुनि ने अग्निवेश तंत्र का सुव्यवस्थित रूप से गठन किया। वो गठन करने के बाद, जिसे आज हम संपादन (compilation) कहते हैं, उससे भी बड़ा काम चरक मुनि ने किया। चरक संहिता कोई छोटी मोटी संहिता नहीं है, आठ स्थान में विभक्त है जिसमें 140 अध्याय हैं। यह सब उस समय किया गया जब कागज़, कलम नहीं थे और बहुत सारी टेक्नोलॉजी नहीं थी। उस समय उन्होंने बहुत ही मेहनत से इस ग्रंथ को बनाया। 

परंपरा को बचाने के लक्ष्य को निर्धारित करके उन्होंने एकनिष्ठ होकर यह कार्य किया जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं था। और उन्होंने इतने विषय चरक संहिता में ले लिए कि कहा जाता है, जो यहाँ मिलेगा, वह दूसरे स्थान में होगा, ऐसा नहीं कह सकते, किन्तु दूसरे स्थान में होगा तो चरक संहिता में होगा ही!

युग व प्रमुख वैद्य

काल के अनुसार आयुर्वेद के अनेक ऋषियों की महत्ता बतायी गयी है। उसके अनुसार अत्रि की कृतयुग/सतयुग में बहुत महत्ता है। सतयुग के वैद्य के रूप में अत्रि प्रमुख हैं। अत्रि ने अपनी स्मृति में सात्विक लोगों की चिकित्सा कैसे करी जाए, उसपर कार्य किया। उस युग में सत्त्वप्रधान व्यक्ति हुआ करते थे तो रोग भी उस प्रकार के होते थे, चिकित्सा भी उसी प्रकार की करनी होती थी। सतयुग के रोग ऐसे थे की अधिक तप करने से, अधिक सहन करने से, अधिक शरीर को कष्ट देने से होते थे तो उसी प्रकार की चिकित्सा अत्रि मुनि ने स्थापित करी।

द्वापर युग में बहुत युद्ध घटित हुये, सुश्रुत द्वापर के वैद्य थे। द्वापर में युद्ध बहुत हुये, उसके लिए शल्य की आवश्यकता रही। ऋषि-मुनि परंपरा से बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति को समाज कल्याण की चिंता रहती ही है, इसलिए सुश्रुत( जो विश्वामित्र के पुत्र थे) के रूप में वह दिवोदास धन्वंतरि की परंपरा में आये। धन्वंतरि की परंपरा में आकर उन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी, उन्हें शल्य चिकित्सा (surgery) का जनक माना जाता है। 

कलियुग में वाग्भट्ट प्रमुख वैद्य हुये। कलियुग में सत्व के लिए अधिक तप के कारण, शरीर के कष्टों के कारण रोग नहीं होते, युद्ध के कारण भी नहीं होते, अपितु अधिकतर आहार विहार के नियमों का पालन न करने के कारण होते हैं, इसलिए वाग्भट्ट का नाम कलियुग में गौरवपूर्ण हुआ, क्योंकि उन्होंने आहार-विहार से संबंधित अति विस्तृत चिकित्सा स्थापित करी (अष्टांग हृदय, अष्टांग संग्रह ग्रंथ)। 

चरक संहिता की रचना के 1000 साल बाद, दृढ़वल ने उसका प्रतिसंस्कार किया, उसमें 141 अध्याय किये। आधुनिक समय में भी बहुत विद्वानों ने चरक पर काम किया है, जैसे चरक विन्यास, जल कल्पतरु, चक्रपाणि आदि के व्याख्याएँ चरक पर मिलती हैं। प्राय: 44 व्याख्याओं का वर्णन चरक के ऊपर प्राप्त हैं।

आधुनिक चिकित्सा जगत की बात करें तो एलोपैथी के लिए हैप्पोक्रिटिस का नाम आता है, होमियोपैथी को देखें तो  हैनिमैन, सुशलर  का नाम आता है, ऐसे ही अन्य पथियों के लिए विभिन्न चिकित्सकों का, लेखकों का नाम आता है, जिन्होंने वो पद्धति/पथी आरम्भ करी। आयुर्वेद को किसी व्यक्ति विशेष ने आरम्भ नहीं किया। ये ज्ञान अनादि से प्रवाहित है। 

 ‘आयुर्वेद: पंचमो वेद:’ आयुर्वेद को पाँचवे वेद का स्थान दिया गया है। आयुर्वेद एक काढ़ा,दवाई अथवा केवल वटी-गुटी का शास्त्र नहीं है। ये जीवन से जुड़ा हुआ, सूक्ष्मतम ज्ञान से निहित शास्त्र है। इसमें जीवन की प्रत्येक पक्ष को सूक्ष्मता से देखा गया है, प्रत्येक व्याधि का समाधान दिया गया है। चाहे प्रमाणिकता हो, चाहे जीवन के अछूते पक्ष हों, सबकी बात आयुर्वेद में करी गयी है, इसीलिए चरक मुनि ने कहा है ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ |

शायद ही किसी अन्य चिकित्सा पथी की पुस्तकें पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद कही गयीं। इसलिए आयुर्वेद में बताया :

‘न कामर्थं न अर्थार्थं, अथ भूत दयां प्रति’ ये शास्त्र भूतानुकंपया है, ये शास्त्र धन कमाने के लिए नहीं है, किसी कामार्थ नहीं है, ये पेट भरने के लिए भी नहीं है। इसका हेतु है कि ये अनेक प्रकार के जीव जंतु का कल्याण हो जाए, मनुष्य स्वस्थ रह सके, रोगों से बच सके और जो रोग हो गए हैं उनका निदान कर सके। इसलिए रोगों से बचने के लिए क्या क्या आवश्यक है, ये सारा ज्ञान आयुर्वेद में हैं, इसलिए उसकी रचना हुई। 

आयुर्वेद में चरक संहिता को पवित्र ग्रंथ व अति वंदनीय माना जाता है। वैद्य उसकी उसकी परंपरा के पालन का जतन करते हैं। 

सुश्रुतो न श्रुतो येन, वाग्भटो येन वाग्भट: | नाधितश्च चरक येन, स वैद्यो यम किंकर:||

सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसको वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।

यात्रा जारी है……

Author: Brahm Varchas

I am here to share my journey from the regular run of the mill life to reach Brahm Varchas - the pinnacle of knowledge and existence !

2 thoughts on “आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा!”

  1. Bahot sundar tarah se likha gaya lekh hein anshu. Thank you for sharing the journey of ayurveda. The importance of non corrupt health and education system for a healthy society is so relevant in today’s time.

    Like

Leave a Reply to Minal Jakhadi Cancel reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: