मुराहू पण्डित का गंगा स्नान

मुराहू जी की जीवनचर्या से प्रतिचित्रण (map) कर यहाँ ये बताने का प्रयास है कि जो कुछ हम भारतीय ग्रंथों-शास्त्रों में पढ़ते हैं वह पूर्णतया प्रायोगिक है, समकालीन-अद्यतन है और उसे अपने जीवन में उतारकर कैसे व्यक्ति सुखी और स्वस्थ रह सकता है।

अभी कुछ दिन पहले @GYANDUTT ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने मुराहू पण्डित से एक लघु भेंट का ट्वीट किया। रोचक लगा! पाण्डेय जी से निवेदन किया कि उनकी जीवन व दिनचर्या की कुछ और जानकारी बटोरें। आदरणीय पाण्डेय जी ने ऐसा शीघ्र किया। उन्हें बहुत धन्यवाद! उन्होंने podcast और blog दोनों में उनसे दीर्घ जीवन के सूत्रों पर हुई चर्चा को सबसे साझा किया।

https://gyandutt.com/2021/06/18/murahu-pandit-and-longevity/ 

ये कौतूहल क्यों जागा? मैं प्रायः आयुर्वेद भारतीय शास्त्रीय जीवन, ज्ञान व दृष्टिकोण के बारे में ट्वीट करती हूँ। वो सब, जो अपने परिवर्तित जीवन मैं गुरु सानिध्य में ज्ञान पाकर, अनुभव से और प्रत्यक्ष प्रमाण से जी रही हूँ और साझा करती हूँ, उस पर, शायद उसे एक अच्छी ट्वीट/quote आदि से अधिक कुछ न समझ कर, पढ़ने/सुनने वाले विश्वास नहीं करते। और करते भी हों तो उसमें प्रस्तुत शास्त्रीय ज्ञान को अपने जीवन में उतारते हों, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। It is just good reading material ! आत्ममुग्धता के इस सामाजिक काल में, कोई निरपेक्ष होकर या तटस्थ होकर, गुरु प्राप्त व मनन किया ज्ञान, शिक्षा या जानकारी साझा करे तो उस पर विश्वास कम होता है। मुझे तो अहंकारी, opinionated, higher mortal आदि की उपाधियाँ भी मिलती रहती हैं। 

तो मुराहू उपाध्याय जी के उस संक्षित उल्लेख से भी मुझे समझ आ गया कि ये पथ्यापथ्य व आहार-विहार के सरल सिद्धातों का पालन करने वाले शुद्ध भारतीय हैं जिन तक आधुनिकता के साधनों और जीवन के नाम पर प्रचलित आलस्य, दूषण और वैचारिक भ्रष्टाचार नहीं पहुँचा है। मुराहू जी की जीवनचर्या से प्रतिचित्रण (map) कर यहाँ ये बताने का प्रयास है कि जो कुछ हम भारतीय ग्रंथों-शास्त्रों में पढ़ते हैं वह पूर्णतया प्रायोगिक है, समकालीन-अद्यतन है और उसे अपने जीवन में उतारकर कैसे व्यक्ति सुखी और स्वस्थ रह सकता है, वृद्धावस्था में भी! आधुनिक अध्ययन की तरह कुछ भी केवल जानकारी के लिए शास्त्रादि में नहीं बताया जाता है, उसे जीवन में उतारकर सीधे सीधे उससे स्वास्थ्य और आयु लाभ लिया जाता है। तो प्रस्तुत है मुराहू उपाध्याय का शास्त्रीय चित्रण:

अपनी वाणी से ही पुराहू जी बताते हैं की वह – 23 साल से रिटायर्ड हैं, सात विषय से M.A.हैं, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं, DM की बैठक में बैठते हैं और आयुर्वेदाचार्य, योगाचार्य हैं। उनके आधुनिक शिक्षा प्रणाली से प्राप्त प्रमाणपत्र तो आपको मिलेंगे, परंतु उनके आयुर्वेदाचार्य होने के नहीं। क्योंकि, उन्होंने आयुष मंत्रालय के बहुत ही उथले BAMS से नहीं अपितु किसी योग्य वैद्य अथवा गुरु से यह शिक्षा ली है, ऐसा उनके व्यक्तित्व, ज्ञान और शब्दों से प्रतीत होता है।

दुःखं समग्रं आयातं अविज्ञाने द्वयाश्रये। सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम्।। (भाव प्रकाश)

इसका अर्थ है – सारे दुख का कारण अवैज्ञानिकता का आश्रय है और सभी सुखों का कारण है विमल विज्ञान में प्रतिष्ठा। 

मुराहू पंडित का विमल विज्ञान में अपने विश्वास को प्रतिष्ठित करने का कितना सुखी परिणाम है। उनको, जो 87 वर्ष की आयु में भी 50 वालों को पानी पिला दें। वैसे भावमिश्र लिखित भाव प्रकाश का ये श्लोक आयुर्वेद का सिद्धांत कहा जाता है। और कितने की जन, विशेषकर अलोपथी डॉक्टर, आयुर्वेद को घरेलू नुस्खे और नीम-हकीमी, आधुनिक समय में प्रयोग की अनुपस्थिति आदि कह कर अपने ही अवैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। 

मुराहू जी अपने दीर्घ जीवन का सूत्र बताते हैं – भोजन कम करना, परिश्रम, व्यायाम, नियमित दिनचर्या और तनावमुक्त जीवन जीना। प्रतिदिन प्रातः साईकल से 7 किलोमीटर दूर गंगा स्नान को जाते हैं और सात किलोमीटर लौटते हैं। 

यहाँ मुराहू पण्डित आयुर्वेद के कई मुख्य/विशेष सूत्रों का क्या ही अच्छा अनुसरण करते दिखते हैं:

ब्रह्मुहूर्त जागरण: ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेत्स्वस्थो रक्षार्थमायुष:। – ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला स्वस्थ होता है, उसकी आयु की रक्षा होती है अर्थात वह दीर्घायु होता है।

गंगा स्नान: गंगाजल की महत्ता और विशेषता से अधिकतर जन परिचित हैं। एक सुभाषित इस प्रकार कहता हैं:

असारे खलु संसारे सारमेतत् चतुष्टयम्। काश्यां वासः सतांसंगः गंगास्नानं शिवार्चनम्।। – असार से इस पूरे संसार का सार इन चारों में हैं – काशी में वास, सज्जन लोगों का संग, गंगा स्नान और शिव की अर्चना!

और स्नान के योग्य स्थान के लिए मनुस्मृति बताती है: 

नदीषु देवस्थानेषु तडागेषु सर: सु च। स्नानं समाचरेनित्यं गर्त प्रस्रवणेषु च।

नदी, देवता का स्थान (तीर्थ), तालाब, सर: सु अर्थात नदी के समान जल प्रवाह, झरना, इनमें नित्य स्नान करना चाहिए। 

मुराहू जी नित्य स्नान करते हैं, गंगाजल से करते हैं और नदी पर जा कर करते हैं। सभी दिनचर्या के बताए गए आदर्शों का पालन कितनी सरलता से करते हैं और नियमित हैं। 

दिनचर्या

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी उन्हें अपने घर में अरहर के डंठल के बण्डल से झाड़ू लगाते देख उनकी ऊर्जा और जवानी (वस्तुतः उत्तम स्वास्थ्य) के कायल हो गए थे। अट्ठासी की उम्र में फिट – ऐसा स्वास्थ्य कौन नहीं चाहेगा?

अब देखिए:

समः दोष समाग्निच समधातु मलक्रिय:  प्रसन्नात्मेंद्रियमना: स्वस्थ इत्यामिधियते।। (सुश्रुत स. 15|41) 

दोषों की समता (वात, पित्त और कफ,शरीर में ये तीन दोष होते हैं), समस्त तेरह अग्नियों का समान रहना (पञ्चमहाभूताग्नि + रस रक्तादि सप्त धातु अग्नि + जठराग्नि) तथा रस रक्तादि धातुओं और विण्मूत्रस्वेदादि मलों का पोषण, धारण और निर्गमन आदि क्रियाओं का समान होना एवं आत्मा, इन्द्रिय और मन की प्रसन्नता जिसमें विद्यमान हों, उसे स्वस्थ कहा जाता है। 

मुराहू पण्डित गंगास्नान से लौटते समय गंगाजल का जरीकेन साईकल पर लटकाए लौटते हैं। रास्ते में जो भी मिलता है उसे गंगाजल का प्रसाद देते चलते हैं। रास्ते में कोई रोग ग्रस्त या अस्वस्थ व्यक्ति मिलता है तो उसे प्राकृतिक, सुलभ औषधि भी देते/बताते चलते हैं (podcast में उन्होंने रास्ते में एक महिला को अल्सर की औषधि देने की बात बताई) और कुछ दिन बीते हाल-चाल भी पूछते हैं कि व्यक्ति ठीक हुआ के नहीं!

नित्यं हिताहार विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेश्वसक्तः। दाता समः सत्यपर: क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः।।   

यही शास्त्रीय या आयुर्वेद वर्णित स्वस्थता मुराहू पण्डित में विद्यमान है। जो दीर्घ जीवन के सूत्र मुराहू जी ने बताए, वो आयुर्वेद के ग्रंथों में वस्तुतः स्वस्थ रहने की मैनुअल के रूप में वर्णित हैं!

दिनचर्यां निशाचर्यां ऋतुचर्यां यथोदितम्। आचारान् पुरुषः स्वस्थ: सदा तिष्ठति नान्यथा।। (भाव प्र. 5|13)

स्वस्थ व्यक्ति दिनचर्या रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या का उसी प्रकार पालन करें जिस प्रकार शास्त्रों में वर्णित किया गया है। इसका आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रहता है, उसके विपरीत आचरण करने से रोग से ग्रस्त हो जाता है। 

दिने, दिने चर्या, दिनस्य वा चर्या। दिनचर्या चरणम् चर्या। 

उभयलोकहितमाहारविहारचेष्टितामिति यावत् प्रतिदिने यतकर्तव्यम्। (अष्टांग ह. सू 2|1) – चर्या का अर्थ है चरण (आचरण), प्रतिदिन करने योग्य, प्रतिदिने की चर्या का नाम दिनचर्या है। 

निशि स्वस्थ मनास्तिष्ठेन्मौनी दण्डी सहायवान्। एवं दिनानि मे यान्तु चिंतयेदिति सर्वदा। – रात्रि चर्या में शयन से पूर्व, ,मन को सभी चिंताओं से दूर रखते हुए स्वस्थ पुरुष (व्यक्ति) मौन धारण कर धर्म चिंतन करते हुए ध्यान करें कि शेष दिन भी इसी प्रकार सुखपूर्वक व्यतीत हों। 

उत्थायोत्थाय सततं स्वस्थेनारोग्यमिच्छिता। धीमता यदनुष्ठेयं तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यते।। (सु. चि. 23|3)

आरोग्य की कामना करने वाले धीमान् पुरुष (व्यक्ति) को दिनचर्या में वर्णित कार्यों को प्रतिदिन करना चाहिए।  

दिनचर्या में आने वाने कर्तव्य (कार्य जो नियमित रूप से करने चाहियें):

  1. ब्रह्मुहूर्त जागरण – सूर्योदय से 2 घड़ी पहले उठना। निष्कर्ष- सूर्योदय से पहले उठना।
  2. उषापान: सूर्योदय से पहले खाली पेट पानी पीना। ये पानी तब पीना जब पिछली रात्रि हल्का सात्विक खाना खाने के तीन घंटे बाद सोएँ हों।
  3. मलत्याग – पेट साफ करना
  4. आचमन : मुख प्रक्षालन, कुल्ला करना
  5. दंत धावन – दाँत साफ करना
  6. जिह्वनिर्लेखन – जीभ साफ करना
  7. मुख व नेत्र प्रक्षालन – आँखें और मुँह धोना
  8. अञ्जन कर्म – आँखों में अञ्जन
  9. नस्य कर्म: नाक में नस्य डालना/ नाक की सफाई करना
  10. कवल-गणडूष – औषधियुक्त द्रव्य से कुल्ला करना
  11. धूमपान – धूप के धुएँ का सेवन करना (सिगरेट पीना नहीं)
  12. ताम्बूल सेवन – नागरवेल के पत्ते पर औषधि के कुछ घटक डालकर पान खाना (तंबाकू वाला/ लज़ीज़ पान नहीं)
  13. अभ्यंग – तेल मालिश
  14. व्यायाम – अर्ध शक्ति व्यायाम करना। अति व्यायाम न करना
  15. उद्वर्तन – उबटन लगाना, कड़वे आदि रसयुक्त द्रव्यों के चूर्ण को शरीर पर रगड़ना
  16. स्नान – ऊपर से नीचे की ओर पानी डालकर नहाना (पहले सिर, फिर कंधे, अंत में पाँव, यथा)। सिर गरम पानी से न धोना और ज्वर एवं ऋतुचर्या (menstruation) में स्नान न करना।
  17. अनुलेपन – औषधीय द्रव्यों के चूर्ण का लेपन अर्थात आयुर्वेदिक पाउडर लगाना 🙂
  18. वस्त्रधारण – ऋतु के अनुकूल और स्वच्छ (नित्य धुले हुए) वस्त्र पहनना

नित्य 14 किलोमीटर साईकल चलाना (7 किलोमीटर के बाद अंतराल लेकर)- व्यायाम:मुराहू पण्डित की दिनचर्या का एक अभिन्न अंग हैं नित्य 14 किलोमीटर साईकल चलाना। आदर्श व्यायाम करते हैं उपाध्याय जी! सुश्रुत का कथन का अनुसरण करते दिखते हैं वह, बलार्द्ध तक व्यायाम करते हैं। व्यायाम के लिए बताया गया है : बलस्यार्धेन कर्तव्यो व्यायामो हंत्यतोSन्यथ। (सु. चि. 24|27)

हित चाहने वाले स्वस्थ व्यक्तियों को सभी ऋतुओं में व्यायाम अर्धशक्ति (बलार्द्ध तक) करने का निर्देश मिलता है। व्यायाम करते हुए मनुष्य के हृदय में स्थित वायु जब मुख में आने लगे, यह बलार्द्ध समझना चाहिए। सुश्रुत के अनुसार इसके लक्षण हैं माथे पर, नासिक छिद्र में, शरीर संधि (जोड़ों), हाथों पैरों के जोड़ों, बगल आदि स्थानों में पसीना आने लगे, मुख सूख जाए, ये सभी अर्ध शक्ति के लक्षण हैं। अति व्यायाम करने से अनेक दोष व रोग उत्पन्न होते हैं। 

साईकल चलाना, दौड़ने और gymming से कहीं अच्छा व्यायाम है।चक्रमण (घूमना) श्रेष्ठ व्यायाम है, कुछ योगासनों के साथ। आजकल cardio और weight training का जो चलन है और जिसे स्वास्थ्य बनाने की निशानी माना जाता है, आयुर्वेद की दृष्टि से अति व्यायाम की श्रेणी में आता है क्योंकि इसमें अर्ध-शक्ति या बलार्द्ध के लक्षण आने पर रुकने की बजाए, इनके अति होने तक यंत्र देखकर और समय देखकर व्यायाम किया जाता है।

कम खाना अर्थात सम्यक आहार: मुराहू पण्डित भोजन कम करने को दीर्घ जीवन का सूत्र बताते हैं। कहते हैं महीने में एक बार उपवास करिए। शर्बत, मट्ठा पीजिये, टेंशन मत रखिये।

कलियुग के वैद्य कहे जाने वाले वाग्भट्ट का भगवान धन्वंतरि को दिया गया यह उत्तर, सम्यक आहार का कुंजी सूत्र है – ‘हित भुक् मित भुक् अशाक् भुक्’ – अपने हित के लिए खाने वाला अर्थात जीभ के स्वाद के लिए नहीं शरीर की आवश्यकता और अवस्था के अनुसार खाने वाला, कम अर्थात सम्यक अथवा सही मात्रा में खाने वाला और बिना (कम) सब्जी खाने वाला अर्थात अन्न/कड़धान्य खाने वाला (निरोगी है)।

चरक आहार के हितकारी या अहितकारी होने के कारण इन आठ विधानों में बताते हैं:

तत्र खलविमान्यष्टाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति: तद्यथा – प्रकृतिकरणसंयोगराशिदेश कालोपयोग संस्थोपयोक्त्रष्टमानि। (च. वि. 1|2)

यहाँ वर्णित आठ विधान, आहार के हित या अहित होने के कारण बताते हैं। इन विधानों को सम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को लाभ मिलता है, वहीं असम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को हानि होती हैं। ये इस प्रकार हैं – प्रकृति (स्वभाव) ; करण (संस्कार); संयोग (जल सन्निकर्ष, अग्नि संयोग); राशि (मात्रा); देश; काल; उपयोक्त, उपयोग संस्था (rules of food consumption/dietetic rules)।

मुराहू पण्डित की 87 वर्ष की आयु, स्वस्थ शरीर, शिक्षित, सम्मानित, प्रसन्नचित्त, उदार, परोपकारी, निश्चिन्त, आर्थिक रूप से सुरक्षित, चिंतामुक्त नियमित जीवन – सब कुछ इस बात का सूचक है द्योतक है कि हमारे शास्त्रों में बताए गए सिद्धांत, निर्देश, युक्तियाँ और नियम, सभी अति सरलता से आचरण का भाग बनते हैं। कोई कठिन परिश्रम नहीं करना पड़ता। यही असाधारण साधारणता आदर्श भारतीय का लक्षण है। यह केवल मुराहू पण्डित द्वारा ही नहीं, हम सबके द्वारा प्राप्य है, achievable है। जैसे ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं – “आदर्श ढूंढने के लिए न तो कहीं दूर जाना होता है, न ही अति विशिष्ट कठिन तप करते व्यक्ति से कुछ करना होता है। अपने आस पास, गाँव देहात में आदर्श जीवन जीते अनेक व्यक्ति मिल जाते हैं।” भारतीयता उनमें ही जीवित है। शहर का भारतीय अब इंडियन हो गया है। प्रार्थना व निवेदन है कि पुनः भारतीय बनें।

मुराहू पण्डित सद्वृत्त में अर्थात satvik health circle में रहते हैं। सद्वृत्त आयुर्वेद का उत्कृष्ट विचार है। 

सतां सज्जनानां वृत्त व्यवहारजातं सदवृत्तम्। (च.सू. 8|17) – सदा सज्जनों के आचरणों का पालन करना, उनके बीच रहना ही सद्वृत्त है। 

सद्वृत्त पालन करने से मानसिक रोगों से बचा जाता है। सोशल मीडिया, आधुनिक धारावाहिक (हिंदी/अंग्रेजी), पिक्चर इन सभी को दुर्जनों की श्रेणी में रखा जा सकता है। 

आर्द्रसंतानता त्याग: कायवाक्चेतसां दम:। स्वार्थबुद्धि परार्थेषु पर्याप्तं इति सद्वृतम्।।

(अ.हृ.सू.2|46)

सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना (सुपात्र को), शरीर मन वाणी पर नियंत्रण रखना तथा दूसरे के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना (उन्हें अपने जैसा ही समझना) ही सद्वृत्त है।

मुराहू पण्डित को प्रणाम!

यात्रा जारी है……

Author: Brahm Varchas

I am here to share my journey from the regular run of the mill life to reach Brahm Varchas - the pinnacle of knowledge and existence !

3 thoughts on “मुराहू पण्डित का गंगा स्नान”

  1. अत्यंत उत्कृष्ट विवेचन! मैंने इतने विस्तार से सोचा नहीं था। और शायद जानकारी भी नहीं थी। आपको बहुत धन्यवाद।

    “कवल-गणडूष – औषधियुक्त द्रव्य से कुल्ला करना” – यह क्या है? कौन सा द्रव्य प्रयुक्त होना चाहिये?
    “अनुलेपन – औषधीय द्रव्यों के चूर्ण का लेपन अर्थात आयुर्वेदिक पाउडर लगाना” यह चूर्ण कैसे बनता है या बाजार में उपलब्ध है?
    —-
    आपकी पोस्ट तो मेरे लिये संदर्भ पोस्ट हो गयी। आजकल लॉन्गेविटी पर बहुत सोचना हो रहा है। उस विचार करने की कवायद को आपकी पोस्ट एक नया आयाम देगी। बहुत धन्यवाद।

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    1. आपके शब्दों के लिए आभार 🙏🏻! ये बड़े हर्ष का विषय है कि आपको कुछ आगे शोध का संदर्भ मिला।
      कवल-गण्डूष दातुन करना और क्वाथ से कुल्ला करना है। इस क्वाथ में पाँच वृक्षों की छाल और मुलेठी आदि डाल के उबाल के क्वाथ बनाया जाता है। इसकी विस्तृत विधि ग्रंथों में उपलब्ध है। आप जानना चाहें तो ट्विटर DM के माध्यम से अपना फ़ोन नम्बर दे दें। आपको जानकारी भेज दूँगी।
      अनुलेपन या आयुर्वेदिक पाउडर की विधि भी उपलब्ध है।
      वैसे ये दोनों ही वस्तुएँ संस्कृति आर्य गुरुकुलम बनाता है क्योंकि अब उपलब्ध बहुत ही कम है। आप चाहें तो मँगवा सकते हैं। पुनः उसके लिये आपका नम्बर दीजिएगा। शेष सूचना आदान प्रदान वहाँ आसान होगा।
      और आपकी longitivity की क़वायद में कुछ आयुर्वेद के संदर्भ की सहायता की आवश्यकता हो तो यहाँ गुरुकुल में आपका स्वागत है। मैं वर्तमान में संस्कृति आर्य गुरुकुलम में अंतःवासी हूँ।
      शुभकामनाएँ / अंशु

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