वरदराज पेरूमाल कोविल मंदिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु

राजगोपुरम ! मुख्य द्वार

वरदराज पेरूमाल कोविल दिव्य देशम में से एक है, जो विष्णु के वह 108 मंदिर हैं जहाँ 12 आलवार संतों ने तीर्थ करा था और विष्णु स्तुति गायी थीं। यह मंदिर कुछ 1100 वर्ष पुराना है। इसे प्रसिद्ध चोल राजा राज राजा प्रथम ने बनवाया था। बाद के समय में चोल राजाओं कुलोत्तुंग प्रथम और विक्रम चोला ने इसमें विस्तार किए।

मंदिर के पीछे की ओर से मूलवर सन्निधि का शिखर (पुण्यकोटि विमानम)! इस शिखर पर नरसिंह शीर्ष दिखता है।
प्रवेशद्वार से भीतरी प्रांगण का दृश्य, जिसमें दो मण्डप और उसके पश्चात् ध्वज स्तंभ स्थित है।
ध्वज स्तंभ के दाईं ओर अन्न क्षेत्र और बाईं ओर पवित्र पुष्करणी स्थित है।
और यह है मंदिर की पुष्करणी जिसके कारण यह एक तीर्थस्थल कहलाता है।

वरदराज पेरूमल यानि वर देने वाले विष्णु ! जिनका नौ फ़ीट का अंजीर की लकड़ी का बना विग्रह इस पुष्करिणी में सदा जलमग्न विराजमान रहता है और हर 40 वर्ष में एक बार जल से बाहर आता है, भक्तों के दर्शन हेतु! इस मूर्ति का निर्माण स्वयं विश्व कर्मा द्वारा किया बताया जाता है।

इस स्थान में मूर्ति जलमग्न रहती है।

सोलहवीं शताब्दी तक यह गर्भग्रह में विद्यमान और पूजित थी। परंतु मुसलमान आक्रांताओं के बढ़ते हमलों के कारण अर्चकों ने उसे चांदी की पेटिका (casket) में सुरक्षित कर इस पुष्करणी में छिपा दिया और इसकी जानकारी गुप्त रखी। 1709 में पुष्करणी की सफाई में यह उद्घाटित हुआ। तब से यह परंपरा स्थापित हुई कि प्रत्येक चालीस वर्ष के बाद यह मूर्ति जल से निकाली जाती है और 48 दिनों तक भक्तों के दर्शन के लिए रखी जाती है। इसकी पौराणिक कथा गूगल पर सरलता से उपलब्ध है। कहते हैं कि ब्रह्मा जी द्वारा किये जा रहे यज्ञ की सरस्वती रूपी वेगवती नदी के जल प्रकोप से रक्षा के लिए स्वयं विष्णु यहां बाड़ की तरह लेट गये थे।

मुख्य दर्शन वीथिका

बारह स्तंभों की इस वीथिका की शोभा देखते ही बनती है। यहां विष्णु के उत्सव विग्रह श्री देवी तथा भू देवी के साथ विराजमान हैं। भारत भर से दर्शनार्थी यहां दर्शन के लिए आते हैं। किन्तु स्थानीय मूलनिवासी वैष्णव अपनी आभा और निष्ठा के कारण सहज ही पहचान में आ जाते हैं।

पेरूमाल(विष्णु) के उत्सव विग्रह के बायीं ओर ये छोटा आ प्रांगण है जिसके बायीं ओर तायार पेरुनदेवी की सन्निधि है।
ये मण्डप शायद तायार के उत्सव विग्रह के लिये हो!
जालीदार स्तंभ

इन जालीदार स्तंभों की शिल्पकारी चकित करती है। इतनी सूक्ष्मता से आकार और अनुपात का ध्यान रख, एक ही पत्थर को पूर्ण रूप से सही तराशा है।

अंदर की ओर से मण्डप की छत

केवल स्तंभ ही नहीं, इस मण्डप की छत भी विस्मित करती है। अच्छी बात यह है की जीर्णोद्धार के समय सामायिक चटक रंगों का प्रयोग ना करके प्राकृतिक रंगों की सहायता से इन्हें संरक्षित किया गया है।

तायार पेरून देवी की सन्निधि में उनके दर्शन में एक प्रकार की शीतलता का अनुभव होता है। परिक्रमा करते समय पीछे की ओर से शिखर का स्वर्ण आच्छादित शिखर बहुत सुन्दर दिखता है। तायार अर्थात् मां। मन्दिर के मुख्य देव की पत्नी का एक मां के रूप में स्वतंत्र सन्निधि रहती है। इस मंदिर में विष्णु पत्नी लक्ष्मी पेरुन देवी के रूप में विद्यमान हैं।
मूल विग्रह के बारे में पूछने पर मुख्य मण्डप वीथिका के पीछे की ओर स्थिति सन्निधि में जाने को कहा जाता है। मूलवर नरसिंह की सन्निधि में पंद्रह स्तंभों में से एक पर यह रूप उकेरा हुआ है। विग्रह का रूप कुछ इसी तरह है। यहां उग्र नरसिंह अथवा योगी नरसिंह का विग्रह स्थापित है।
और ये है प्रसिद्ध सौ स्तंभों वाला मण्डप!

चोल कला का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता यह शत -स्तंभ मण्डप पुष्करणी के बाईं ओर स्थित है। प्रत्येक स्तंभ एक भिन्न कथा और देव को प्रस्तुत करता है। भारतीय शिल्प जिज्ञासु और इतिहासकार यहां कितने ही दिन बिता सकते हैं। यह मण्डप विजय नगर के राजाओं द्वारा बनवाया बताया जाता है।

कठोर पाषाण में तराश कर बनाई इन कलाकृतियों की सूक्ष्मता और निपुणता देख बरबस ही शिल्प कार के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं। योद्धा के शस्त्र, घोड़े की लगाम, अश्व के पैरों के नीचे आए शत्रु की अवस्था, सह कुछ स्पष्ट है।

कल्याण मण्डप

इस मण्डप वेदी पर प्रति वर्ष वसंत के समय श्री विष्णु का विवाह पेरून देवी से होता है। सुनने में आया उत्सव भव्य होता है।

स्तंभ पर उकेरे आञ्जनेय (हनुमान)!
योगी नरसिंह

शत -स्तंभ मण्डप से दिख रही इस दिव्य पुष्करिणी की दिव्यता चित्र में नहीं बांधी जा सकती । श्री विष्णु से प्रार्थना है कि वह अपना वरदहस्त सदा भक्तों के शीश पर रखें और उन्हें दर्शनलाभ दें!

वर्षा ऋतु में आहार-विहार

जो व्यक्ति ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन के आदी होने के बारे में जानता है, ऐसी आदतों का समय पर अभ्यास करता है, उसका बल और ऊर्जा-आभा बढ़ जाती है, और वह एक स्वस्थ, लंबा जीवन जीता है।

वर्षा ऋतु का आगमन हो चुका है। आषाढ़  और सावन मास में वर्षा ऋतु का काल होता है। प्रत्येक ऋतु का काल अलग होता है, उस समय वातावरण की स्थिति अलग होती है और उसी प्रकार हमारे शरीर में त्रिदोष अर्थात वात-पित्त-कफ की स्थिति भी ऋतु के साथ बदलती है।  भाव प्रकाश में भाव मिश्र बताते हैं: 

क्षयकोपशमा यस्मिन्दोशाणां संभवन्ति हि । ऋतुशट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु संक्रमात् ।।

 – जिस समय दोषों की वृद्धि, कोप तथा शमन हुआ करता है, उस समय को ऋतु कहते हैं।

ऐसे में  सामान्य  प्रश्न उत्पन्न होते हैं कि इस ऋतु में  आहार विहार कैसा होना चाहिए? 

वर्षा ऋतु वात यानि वायु के प्रकोप का काल है। इस ऋतु में मंद अग्नि होती है जिसका हमारी पाचन क्रिया पर सीधा असर पड़ता है। यह ऋतु प्रजनन प्रक्रिया के आरंभ होने का भी काल है। जीवाणु, कीट सृष्टि की उत्पत्ति का काल है। यह एकमुख्य कारण है कि इस ऋतु में भारत में लोकाचार और परम्पराएं भी इस प्रकार से रची हैं कि सब ऋतु अनुकुल आहार विहार करें। जैसे –

मांस का सेवन करना – मांस के सेवन के लिए किसी पशु -पक्षी के जीवन का अंत किया जायेगा। क्योंकि प्राकृतिक रूप से यह पशु- सृष्टि की प्रजनन प्रक्रिया का काल है तो शिकार/आखेट से इस प्रक्रिया में, सृष्टि की उन्नति के कार्य में बाधा उत्पन्न होती है, अतः इस कार्य को ही इस ऋतु में निषिद्ध कर दिया जाता है।

हरी सब्जी, प्याज, फल विशेष का त्याग – वर्षा ऋतु में इनमें कीट-जीवाणु की उत्पत्ति अधिक होती है। ऐसा मुख्यतः वातावरण में अधिक नमी होने के कारण होता है। इन्हें त्यागने से इन्हें खाने की तथा इनके माध्यम से कीट-विषाणु खा लिए जाने की संभावना समाप्त हो जाती है तथा रोग होने से बच जाते हैं।

यात्रा करना और ग्रंथ अध्ययन करना – वर्षा होने के कारण और अधिकतर जगहों पर कच्चा जल उपलब्ध होने के कारण प्रवास यात्रा में कठिनाई होती है और जल के कारण उदर रोगों की संभावना बहुत बढ़ जाती है, अतः एक ही स्थान पर रहने का प्रावधान किया जाता है और समय का सदुपयोग हो इसलिए सम्यक वातावरण के तापमान में ग्रंथ अध्ययन का विधान रहता है।

इस ऋतु में कैसा आहार विहार करना चाहिए ?

नमकीन, खट्टा/अम्ल रस वाला , चिकना, हल्का और मधुर आहार लें। कब्ज़ न होने दें। जठराग्नि का विशेष ध्यान रखें। नया पानी और नए साकभाजी त्याग दें और साधारण श्रम करें। संयमी रहें, विशेष व्यायाम न करें। वायुकारी आहार न लें।

गुरुजी (आचार्य मेहुल भाई) वर्षा ऋतु में आहार -विहार के  प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते हैं:

शरीर व आत्मा दोनों का आरोग्य अच्छा रहना चाहिए। दोनों की पुष्टि हो, शरीर आत्मा को ना भूले और आत्मा शरीर को ना भूले यानी ऐसे में हम शरीर व आत्मा दोनों का विचार करें। संस्कृति आर्य गुरुकुलम् एकमात्र ऐसी संस्था है जो दोनों को साथ में रखकर चलती है। यह एकमात्र ऐसा गुरुकुल है जिसने आयुर्वेद तथा आध्यात्म – दोनों क्षेत्रों में अग्रगण्य प्रदान किया है। वर्षा ऋतु में आहार इसके दूसरे छोर यानी शरीर के विषय का प्रश्न है।  आयुर्वेद आषाढ़ व श्रावण मास में विशेष जिन वस्तु के सेवन करने की बात बताता है वह इस प्रकार है :

) अदरक : आषाढ़ मास में अग्नि मंद होती है या मन्दाग्नि होती है। यानि मेटाबॉलिज्म तथा डाइजेस्टिव एसिड्स निम्न होते हैं। अदरक अग्नि को प्रदीप्त करता है इसलिए भोजन से पहले से अदरक खाने से मंद अग्नि बढ़ती है। अतः पूरे आषाढ़ में और सावन में अदरक का सेवन करें। यदि किसी प्रकार का धार्मिक परहेज है तो सौंठ का भी सेवन पर सकते हैं।

लाभ :

अदरक खाने से अग्नि मंद नहीं होगी,  प्रदीप्त रहेगी जिसके फलस्वरूप अच्छा पाचन होगा, भूख लगेगी।

वायु का अनुलोमन होगा। वायु का अनुलोमन करने से शरीर में वायु नहीं बढ़ेगा। वात संबंधी रोग नहीं होंगे।

अदरक पुराने आम यानी कच्चे रस का पाचन करता है।

अदरक या सौंठ सुबह या शाम, किसी भी समय ले सकते हैं।अदरक के टुकडे पानी में भिगो कर या नमक के साथ सेवन करें। यदि सोंठ ले रहे हैं तो आधा चम्मच सुबह या शाम किसी भी समय ले सकते हैं। 

२) एरंड का तेल ( कैस्टर ऑयल) : एरंड के तेल से वायु का अनुलोमन होता है और स्वास्थ्य अच्छा होता है।

३) तिल तेल: विशेषकर इस ऋतु में लोकाचार में बहुत तली चीजें खाने का प्रचलन है, जैसे पकोड़े भज्जी आदि। इस ऋतु में आप यदि तले पदार्थ खाते हैं तो अच्छा लगता है क्योंकि वर्षा के कारण शरीर रुक्ष हो जाता है और तेल खाने से शरीर को स्निग्धता मिलती है। इस ऋतु में वात बढ़ जाता है जिससे रुक्षता बढ़ जाती है। यदि आप तेल के व्यंजन खाते हैं तो याद रखें इस समय सबसे अच्छा तेल है तिल तेल! चरक सूत्र में बताया गया है “तिल तैलं स्थावरजातानां स्नेहानाम्”, सभी प्रकार के स्थावर स्नेह हैं, उनमें तिल तेल सबसे अच्छा है । अर्थात इस समय जो पूरे शरीर में स्नेहन या ऑइलिंग होनी चाहिए, वह तिल का तेल कर देगा। तो तिल के तेल में बनाई वस्तुओं का सेवन करें।

४) भारी वस्तुएं ना खाएं।

५) दूध का सेवन कम करें।

६)  सादा आहार करें।

७) बासी भोजन बिल्कुल ना करें। रात का सुबह दोपहर का रात को ना खाएं इससे पाचन शक्ति मंद हो जाएगी, अग्नि मंद हो जाएगी, ऐसा ना करें।

ऐसा करने से आपका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।

मानसिक स्वास्थ्य के लिए, अध्यात्म की साधना के लिए यह दो महीने बहुत ही अच्छे हैं। इस समय में एक ही स्थान पर रहे अर्थात् भ्रमण यात्रा ना करें।  सामान्य रूप से आहार-विहार करें और चिंतन, मनन, ग्रंथ-अध्ययन अधिक से अधिक करें। चातुर्मास आरंभ हो गया है, उसका पूरा लाभ उठाएं और अपना ध्यान रखें।

ऋतुसम्यक आहार-विहार

ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन का आदी होने को ऋतुसात्मय कहते हैं । यदि कोई बाहरी वातावरण में परिवर्तन के अनुसार आहार और जीवन शैली या गतिविधियों को संशोधित (adjust or modify) कर सकता है, तो वह अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण प्राप्त कर सकता है – ऐसा चरक बताते हैं ।

तस्याशिताद्यादाहाराद्बलं वर्णश्च वर्धते| यस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्||

जो व्यक्ति ऋतुसात्मय को, ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन के आदी होने के बारे में जानता है, ऐसी आदतों का समय पर अभ्यास करता है, और जिसके आहार में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ होते हैं, उसका बल और ऊर्जा-आभा बढ़ जाती है, और वह एक स्वस्थ, लंबा जीवन जीता है।

‘रामात् नास्ति श्रेष्ठ:’ ‘शक्तिक्रीडा जगत सर्वम्’ – संस्कृत भाषा का आध्यात्मिक संबंध

कल की राम मंदिर की सुंदर घटना के समय जो लेख मैं लिख रही थी, वह वैसे तो अपने लिए था, “नोट्स टू सेल्फ” की तरह किंतु मंदिर के अनुभव के बाद लगा कि सबसे साझा करूं। क्योंकि जो उन अम्मा ने अंत में कहा, एक तरह से वही तो विश्लेषण के रूप में मैं लिख रही थी, जब वो आयी थीं।

(सूचना: विचारों का तंतुजाल जटिल हो सकता है, किंतु इसे सरल शब्दों में परिवर्तित करने की कोई मंशा नहीं है ☺️।)

‘रामात् नास्ति श्रेष्ठ:’ तथा ‘शक्तिक्रीडा जगत सर्वम्’ इन दोनों वाक्यों का संस्कृत भाषा के सन्दर्भ मे एक विशेष आध्यात्मिक संबंध है।

संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है, ये तो हमने कई बार सुना है। इसका बंधारण (व्याकरण) विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, जिस कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में इसका जड़ों के स्तर पर प्रयोग हो रहा है। किन्तु इस वैज्ञानिकता के साथ-साथ संस्कृत के बंधारण में आध्यात्म और सृष्टि की रचना के चक्र का जो रहस्य बुना है, वह जैसे प्रकट हुआ मन में! उसे ही मैंने शब्द देने का प्रयास किया है।

संस्कृत की वैज्ञानिकता क्या है ?

पहला तो यह शब्दों या मंत्र के रूप में, ध्वनि तरंगों के द्वारा हमारे स्थूल शरीर में जैविक और रासायनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, जो हमारे स्वास्थ्य से और मस्तिष्क की गतिविधि से सीधा सीधा संबंध रखती है। और दूसरा इस के पदों के अर्थ को समझकर उससे, मन में प्रस्तुत-परंतु-प्रायः-सुषुप्त अध्यात्म का विकास भी होता है। संस्कृत मनुष्य को अध्यात्म की ओर उसके जीवन चक्र के लक्ष्य की ओर ले जाती है।

संस्कृत की वैज्ञानिकता में अध्यात्म कैसे बुना है?

“रामात् नास्ति श्रेष्ठ:” इस वाक्य का प्रयोग तीन विषयों में उपमा-संकेत के लिए किया जाता है :

१) मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र और उनके कुशल राजतंत्र (रामराज्य) के कारण

२) आर्युवेद के अध्ययन मे

३) संस्कृत भाषा के अध्ययन , पाठन में

तकनीकी विश्लेषण:

संस्कृत में राम शब्द का परिचय “अकारांत पुल्लिंग राम शब्द” इस प्रकार से दिया जाता है। राम शब्द रम् धातु से बना है। रम् धातु का अर्थ है क्रीडा करना, उसमें घञ् प्रत्यय, उपधावृद्धि होकर- राम- यह कृदंत शब्द सिद्ध हुआ और कृदंत होने से प्रातिपदिक हुआ, अर्थात् अर्थवान हुआ, सार्थक हुआ। सुप् और तिङ् प्रत्याहार में आने वाले प्रत्ययों को विभक्ति कहते हैं। प्रातिपदिक (सार्थक शब्द) को विभक्ति की प्राप्ति होती है, इन दोनों के संयोग से जो परिणाम प्राप्त हुआ उसे पद कहते हैं।

विभक्तियाँ सात होती हैं जिन्हें हम क्रमशः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी (तथा संबोधन) कहते हैं। इनके नाम क्रमशः कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध अधिकरण तथा संबोधन हैं।

आध्यात्मिक विश्लेषण:

राम का अर्थ है “रमन्ते योगिनोऽस्मिन्” – योगी जिसने रमण करते हैं, यानि परम तत्व या ईश्वर। ‘शक्ति क्रीडा जगत् सर्वम्’ का अर्थ है यह सारा जगत शक्ति का खेल है अर्थात् माया चक्र है जिसमें सब जीव क्रीडा का भाग हैं। राम प्रातिपदिक अर्थात् सार्थक है, परम तत्व है जिसमें योगी रमण करते हैं। सार्थक को (परम तत्व को) शक्ति से विभक्ति की प्राप्ति हुई। विभक्ति अर्थात विभाजन। यह विभाजन शक्ति के द्वारा हुआ, शक्ति अर्थात् वह क्रीडा(माया) जिसमें योगी रमण करते हैं। तो राम शक्ति (प्रकृति) से विभक्त होकर सात रूपों में सिद्ध हैं, जो सात विभक्तियाँ हैं। राम ही कर्ता हैं; राम ही कर्म हैं; राम ही करण हैं साधन हैं, उनके ही द्वारा सब कुछ है; राम संप्रदान हैं अर्थात् सब कुछ राम के लिए है; राम से अलग होकर, अपादान कर; राम के ही सम्बन्ध से सब पुनः राम के अधिकरण में, उसके अधिकार में आ जाते हैं और शक्ति क्रीडा का चक्र पूर्ण होता है। जिस नाम को एक बार (एक वचन), एक बार और (द्विवचन), बहुत बार (बहुवचन) पुकारने की इच्छा होती है, संबोधन की विवक्षा होती है, वह है = राम!

सार्थक प्रातिपदिक राम की अर्थात् परम अणु की, शक्ति से कई अणुओं में विभक्ति हुई, किंतु परमाणु फिर भी पूर्ण ही रहा।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

यह, वह सब पूर्ण है, पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है। पूर्ण में से पूर्ण लेकर भी पूर्ण ही शेष रहता है।

और अंत में, रामरक्षा स्तोत्र के इस छंद में राम के सारे रूप (विभक्तियाँ) एक साथ उपस्थित हैं। विद्यार्थियों, विशेषकर बाल विद्यार्थियों के लिये एक साथ सरलता से सारी विभक्तियाँ स्मरण करने के लिये ये श्लोक स्मरण कर लेना सर्वोत्तम युक्ति है :

“रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥”

यात्रा जारी है….

मास्टरस्ट्रोक ! पर किसका..?

सावधान ! कृपया पहचानें कि किसका मास्टरस्ट्रोक आज सोशल मीडिया पर बड़ी अच्छी तरह चल रहा है।
मुँह नीचे करके तितर बितर हो जाएँ या एकजुट खड़े रहें?

आज का मूडी जी का मास्टरस्ट्रोक : जागो हिन्दू जागो

हैश्टैग “टेक द फ़ाइट टू द स्ट्रीट्स”

👆गहन चिंतन करें और समझें।

आज की नूपुर शर्मा की घटना अप्रत्याशित है। क्षुब्ध नहीं हूँ क्योंकि एक सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी को सनातन का न तो रक्षक मानती हूँ न ही तारनहार।

किसी से उसकी क्षमता से अधिक आशा बांधेंगे तो ठेस अधिक लगेगी ही।

सावधान ! कृपया पहचानें कि किसका मास्टरस्ट्रोक आज सोशल मीडिया पर बड़ी अच्छी तरह चल रहा है – जो सामान्य जन का एकजुट होना शुरू होता दिख रहा था (आभासी दुनिया में ही सही) वो आज ही छिन्न भिन्न हो रहा है। अधिकतर कह रहे हैं कि अपने आप और केवल अपने जीवन-जीविका पर ध्यान दो, हिंदू राष्ट्र के आशावाद ने अचानक मुँह फेर लिया आज। राष्ट्रत्व और अपने सामूहिक अस्तित्व के प्रति उदासीन और बँटा हुआ हिंदू ही उन राक्षसों को शक्ति है।

इस एक ही पासे से लकड़ी खाने वाले मकड़े ने रत्ती रत्ती लकड़ा खाते हुए आज उस भाग को खा डाला जी जगह से एक सशक्त शाखा निकली हुई थी।

इस गणित की पहेली जो आज की घटना के, हिन्दू राष्ट्र के संदर्भ में सुलझाइए और पहचानिये कि लकड़ी कौन है, मकड़ा कौन, रत्ती रत्ती खाई जाने वाला पदार्थ क्या है और कितने दिन लगेंगे लकड़े को समाप्त होने मेंः

अस्सी मन का लकड़ा, उस पर बैठा मकड़ा, रत्ती रत्ती खाये तो कितने दिन में खाये।

राष्ट्रवादी उपभोक्ता बनेंगे ?

राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में समर्थ होना चाहेंगे या असमर्थ रहना चाहेंगे ?

आपने शायद वो विडिओ देखा होगा चीन का मनी ट्रैप – यानि उसके पैसे के जाल के बारे में। कैसे चीन पहले सहायता के लिये लोन देता है और देशों के वापस ना चुकाने पर धीरे धीरे उस देश के संसाधनों और स्थानों तक पर अपना कानूनी रूप से वैध अधिकार कर लेता है। धीरे-धीरे कई देशों में ऐसा कर रहा है और अपने सिल्क-रूट पर कार्य कर रहा है। हम ये सोच कर खुश हो जाते हैं कि भारत की ऐसी स्थिति नहीं है तो हम सुरक्षित हैं । क्योंकि मोदी जी अन्य देशों के साथ सफल सामरिक व कूटनैतिक संबंधों के द्वारा सिल्क-रूट के षड्यन्त्र से भली-भाँति निबट रहे हैं, हम सुरक्षित हैं । बड़े बड़े सुरक्षा और आधारभूत इन्फ्रस्ट्रक्चर की वस्तुओं के भारत में निर्माण से हमें बल मिलता है, उसकी ओर सकारात्मक कदम बढ़ रहे हैं, इसलिए हम सुरक्षित हैं।
केवल इतना ही सोचकर निश्चिंत ना हो जाईये ! हम में से प्रत्येक का जो दायित्व है, राष्ट्रधर्म है उसका हम सबको अपने अपने स्तर पर ही पालन करना है। आप और हम उसमें कहाँ आते हैं, ये समझना चाहिए।
क्योंकि भारत बाकी देशों जैसा नहीं है, इसीलिए भारत के लिये चीन की रणनीति भी बाकी देशों जैसी नहीं है । उसका एक पक्ष ये है कि उसे भारत का आर्थिक नियंत्रण नहीं प्राप्त करना बल्कि उसे आर्थिक रूप से दुर्बल करना है, अस्थिर करना है, आर्थिक अराजकता फैलानी है।
यहाँ आर्थिक निर्भरता बनाने के लिये उसकी भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या पर निवेश का रास्ता लिया है। भारत के बाजार कर दोधारी निशाना है – एक फुटकर बाजार जिसे आप और हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं और दूसरा स्टार्ट-अप में निवेश । दोनों जगह दृष्टि में आए ऐसे बड़े बड़े नाम उसका लक्ष्य नहीं है, अपितु उसका लक्ष्य है साधारण उपभोक्ता-आप और हम! उपभोक्ता बाजार में ‘मेड इन चाइना’ को तो हम जानते ही हैं। बीच-बीच में ‘स्वदेशी ही लो’ की हवा चलती है किन्तु अंततः साधारण भारतीय उपभोक्ता सस्ता होने के कारण और सुलभता से उपलब्ध होने के कारण अभी भी अधिकतर चीन का बना सामान ही प्रयोग कर रहा है। ट्विटर की जागरूकता बहुत ही छोटे स्तर की होती है, उसे पूरे भारत का व्यवहार और उत्तर समझने की भूल हम ना करें तो अच्छा। फुटकर व्यापारी चीन के बने उत्पाद बहुत सरलता से, अत्यधिक उधार पर प्राप्त कर सकते हैं अतः धीरे-धीरे गोली-टॉफी तक यहाँ बनाना छोड़कर वही से आयात करने लगे हैं । हम सबको अपने परफेक्ट घर के परफेक्ट मंदिर में परफेक्ट मूर्ति चाहिए तो दीपावली पर एकदम समकोणीय सुंदर दिखने वाली लक्ष्मी-गणेश ही आते हैं जो पास के बाजार में मिल जाए। ट्विटर के फोटो-ओप में मिट्टी का सामान बनाने वाले या बेचने वाले से ही अंततः विसर्जन करने के लिये लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं लेने के आह्वान सीमित होते हैं; व्यापक स्तर पर बाजार में क्या उपलब्ध है और लोग क्या ले रहे हैं, एक दृष्टि डालने पर दिख जाता है। ये तो हमारी संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव की बात है, साधारण जीवन की मूल आवश्यकताओं के साधनों और उत्पादों के तो असंख्य उदाहरण हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार-नियमों के चलते सरकार एक सीमा के बाद इस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, लेकिन चीन को रोकने की पूरी आशा हम केवल सरकार/शासन से रखते हैं । फुटकर व्यापारी थोक विक्रेता का ग्राहक है और थोक विक्रेता चीन की महा-थोक, सस्ती और निरंतर आपूर्ति का। फुटकर और थोक व्यापारी की अधिक से अधिक लाभ कमाने की मूलभूल अपेक्षा है। वो अपना लाभ की मात्रा में कोई कमी नहीं चाहते और उपभोक्ता के रूप में हमें सबसे सस्ता और घर के बगल वाली दुकान में मिलने वाला सामान ही चाहिए।
उसी प्रकार वैसे तो स्टार्ट-अप के जगत में बहुत सारा विदेशी निवेश लगता है और चीन के निवेश की पूँजी छोटी लगती है – कुछ ६-७ बिलियन अमरीकी डॉलर ! कहा जाता है कि सरकार के लगाए प्रतिबंधों के बाद तो इस निवेश में और भी कमी आई है क्योंकि स्टार्ट-अप अन्य विदेशी निवेशकों से और भारत में से ही बहुत धन इकट्ठा कर ले रहे हैं। केवल बड़े-बड़े कुछ स्टार्ट-अप में चीन का पैसा लगा है (2020 में भारत के 24 में से 17 यूनीकॉर्न्स में चीन का प्रत्यक्ष निवेश था जिसमें अलीबाबा और टेनसेंट मुख्य थे, एन्ट फाइनैन्शल अलीबाबा की ही सहबद्ध कंपनी है)। आज byju, zomato जैसे कुछ का उदाहरण दे कर बताया जाता है कि चीन का निवेश भ्रम है, इन्होंने कितनी तेजी से चीन के निवेश से अपनी निर्भरता हटा ली और हम मान लेते हैं कि ऐसा ही है । जिन जिन प्रकाशन समूहों में ये बताते हुए आलेख-आर्टिकल आते हैं उनके नाम देखिएगा कभी। भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भ्रष्टाचार से ग्रसित है, ये हम केवल राजनैतिक चर्चाएं करते समय ध्यान में रखते हैं लेकिन ऐसे बिजनस आर्टिकल पढ़ते समय भूल जाते हैं। लेकिन छोटे-छोटे कितने ही स्टार्ट-अप की निवेश की पहली पसंद या विकल्प कोई चीनी निवेशक या निवेश कंपनी ही होती है। बहुत से ऐसे लोगों को निजी रूप से जानती हूँ।
परोक्ष रूप से चीन क्या कर रहा है और किस प्रकार अमेरिका में वेन्चर केपिटल कंपनियाँ बना के छद्म वेश में निवेश कर रहा है, ये भी कम ही लोग जानते हैं। ट्रम्प के शासन तंत्र ने बहुत सी ऐसी कंपनियों को बंद किया, उन के दाँत कुंद किये, तो व्यापार जगत ने बहुत भर्त्सना करी (र.र. शब्द का प्रयोग करने का बड़ा मन है यहाँ!) । वहाँ भी ‘करेला, वो भी नीम चढ़ा’ तब हो जाता है जब सारी व्यापारी दुनिया कहती है (भारत की विशेष रूप से) कि राजनीति और व्यापार को अलग रखना चाहिए। कदाचित उसका निहित आर्थिक स्वार्थ इतना अधिक है कि ये समझ नहीं पाती कि चीन का हर कदम वैश्विक राजनीति से प्रेरित है। जैक मा (की कंपनी अलीबाबा) ने भारत में निवेश को केवल व्यापारिक दृष्टि से नाप-तोल कर विवेकपूर्ण व्यवहार करना शुरू किया और अपने देश में भी शासन से अलग आर्थिक स्वावलंबन की राह पर चलने का प्रयास किया तो, एक दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी कंपनी को रातों-रात क्या बना दिया गया !और जैक मा ऐसे अंतर्ध्यान हुये कि कभी-कभी ही कहीं-कहीं ही दिखते हैं अब!
पेटीएम का उदाहरण देखिए। एक भारतीय के विचार और प्रयास पर चीन ने भरपूर पैसा लगाया । सबसे अधिक प्रचलित हुआ, उपभोक्ता ने हाथोंहाथ लिया । सरकार ने भी विमुद्रीकरण लागू होने पर उसका लाभ लिया और जनता ने भी । धीरे-धीरे प्रकल्प सफेद हाथी बन गया । अब चंद्रशेखर जी का राष्ट्रीय स्वावलंबन जागा या आत्मनिर्भरता का भाव अथवा कोश के खाली होने और निवेशकों के हाथ खींचने की स्थिति बन गई – जिस भी वजह से, आईपीओ आया… और लगभग मुँह के बल ही गिरा। भारत के फुटकर उपभोक्ता ने जरूरत के समय उसका बहुत लाभ लिया पर जब निवेशक के रूप में आया तो बोला “ नहीं भाई, ओवरप्राइस्ड है, कोई फायदा नहीं, मत-लो/बेचो !” भारत में ही बने, भारतीयों के लिये ही बने एक उत्पाद को बनाए रखने के लिये भी राष्ट्रीयता नहीं, निजी लाभ ही मुख्य बन गया । ये केवल एक उदाहरण दिया यहाँ !
ऐसे ही अवसर चीन पूरी मेहनत से, समय लगा के, बुन-बुनकर आपके सामने परोसता रहा है और रहेगा। और हम जब तक हमारी अपनी निजता को बहुत छोटा और प्रभावहीन मानते हुए, अपने नित्य जीवन और राष्ट्रीयता को दो अलग अलग पदार्थ मानते रहेंगे, सुख और हित में से सुख को चुनते रहेंगे, तब तक ठगे जाते रहेंगे और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में असमर्थ रहेंगे।

अम्मा

माँ

नोवेम्बर 1938 – अगस्त 2020

अम्मा चली गयीं। उनकी आत्मा अब दिवंगत हो गई। ईश्वर की शरण में है। जीवन चक्र का एक वृत्त पूर्ण हुआ।

ये अच्छी तरह पता है, लेकिन माँ का रूप तो वही देखा जाना, जो इस जीवनमें था। आत्मा की यात्रा की जानकारी उनके अब अचानक से न होने दुख, ख़ालीपन, कष्ट और अवसाद को कम नहीं कर पा रही। धीरे धीरे उनके जाने के दिन के एक-एक दिन पीछे होते जाने से ये अनुभव स्मृति में परिवर्तित होना आरंभ हुआ है पर यही जीवन भर की स्मृतियाँ एक विद्युत तरंग की तरह आती हैं और हाथ पैर सुन्न कर जाती हैं, एक ही जगह पर जड़ खड़े कर जाती हैं।

ईश्वर की कृपा से आपस में प्रेम से जुड़े घर परिवार की ‘जगत मामी’ ने प्रत्येक व्यक्ति जीवन को छुआ है। कोरोना के समय में भी जो अपने को उनके अंतिम दर्शन लेने से नहीं रोक पाए, उन सभी व्यक्तियों में एक भी, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसने उनसे कुछ सीखा ना हो, उनके हाथ का बना कुछ फ़ेवरेट खाया हो या उनके हाथ से बना कुछ पहना न हो। अनगिनत स्मृतियाँ..सबकी..

कोई शोक के आता है तो कभी बात कर पाती हूँ, कभी नहीं कर पाती। लगा था, लिख कर मन का सार शब्दों में आ पाएगा। पर यह असीम ईश्वर का अंश, जिसे हम माँ के रूप में जानते हैं, शब्दों से बहुत परे है।

कितने रूप मन में, मस्तिष्क में एक साथ घूम रहे हैं।

वो वाली अम्मा, जिसकी पहली लिखाई उनकी काली डायरी में देखी जो वो बच्चों की तोते भाई वाली कविता थी, या वो वाली जिनकी आख़िरी लिखाई स्वस्तिक के आकार में लिखा राम-नाम था।

वो वाली माँ जो एकता कपूर के अधिकतर धारावाहिक बड़े रस से देखती थीं, या वो वाली जो एक बार में विस्तृत श्रीमद्भागवतम पढ़ गईं थीं।

वो वाली माँ जो हाथ के पंखे, झाड़ू से पिटाई करती थीं, या वो वाली माँ जिसने अपनी बेटी की नाक इसलिए नहीं छिदाई थी क्योंकि उससे दर्द बहुत होता है।

वो वाली माँ जो सारे स्कूल जीवन में बेटी को अकेले पैदल आने-जाने की आदत डालती थीं या वो वाली जो ऑफ़िस की कैब से भी घर पहुँचने तक गेट पर ही टहलती रहती थीं।

वो वाली माँ जो परिवार की सभी बहुओं को सूने हाथ रखने पर बहुत डाँटती थीं, या वो वाली जो पापा के जाने के बाद कभी पिक्चर देखने हॉल में नहीं गयीं।

वो वाली माँ जिसे सारा जीवन स्वावलंबी व दौड़ता फिरता देखा, जिन्हें नानाजी उनसे 8 साल बड़े मामाजी के पीछे भगाते थे, या वो वाली जो ICU की मशीनों के तारों, अपने अंदर गयीं नलियों में घिरी, धीरे धीरे शारीरिक कष्ट से अचेतन होती इसलिए भावशून्य मुख लिए थी कि उनके चेहरे पर कष्ट देखकर उनके बेटे को असह्य कष्ट हो रहा था।

वो वाली माँ जिसकी कभी कभी चिंता होती थी कि कैसे अपनी गृहस्थी का,पुत्र का मोह छोड़ सकेंगी, या वो वाली जिन्होंने तीन दिन में अपनी जिजीविषा समेट ली और वेंटिलेटर पर भी अपनी हृदय गति रोक कर, बाहर के बल से एक श्वास भी स्वीकार नहीं करी।

उनके जाने के दुःख को बता नहीं सकती लेकिन अम्बे माँ ने उन्हें अपनी शरण में लिया और उनका ध्यान करने पर गले तक भरी हुई संतुष्टि का आभास देकर जो ममता भरी सांत्वना दी, वही आगे जीवन का संबल है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

मेरा गीता पथ

गीता जयंती के अवसर पर अनेक गहन लेख, विश्लेषण कई विद्वानों ने आज साझा किये। मेरा तो साधारण सा लगने वाला मेरा असाधारण अनुभव, साझा कर रही हूँ।

गीता विश्व की सर्वाधिक अनुवादित पुस्तक है। गीता प्रेस, गोरखपुर का गीता की प्रतियाँ छापने का विश्व रिकॉर्ड है। सबसे प्रिय व प्रचलित ग्रंथों में से एक है भगवद्गीता! आज गीता-जयंती है, मोक्षा एकादशी – मार्ग शीष शुक्ल एकादशी!

अनेक गहन लेख, विश्लेषण आज देखने और पढ़ने को मिले। 

दो वर्ष पहले तक मुझे कुछ नहीं पता था गीता जयंती के बारे में और गीता की बारे में केवल जानकारी थी। कितने योग हैं, प्रत्येक का क्या संदेश है, भीम के शंख का नाम क्या है, ईश्वर को कौन प्रिय है, निष्काम कर्म के सोपान क्या हैं – कुछ नहीं पता था।

घर में चार या पाँच गीता, अलग अलग रूपों में होने पर भी, पूरी एक बार भी पढ़ी नहीं थी। अनुवाद तो बाद की बात है, मूल संस्कृत के श्लोक भी गिने-चुने थे जो पता थे या कंठस्थ थे ( बी आर चोपड़ा का धन्यवाद)। जर्मनी, ब्लैक फारेस्ट घूमने गयी थी और वहां के एक छोटे से गाँव जैसी जगह में मुझे एक इस्कॉन के जर्मन व्यक्ति ने भगवद्गीता की अंग्रेजी अनुवाद की प्रति पकड़ाई थी और कहा था कि वह वृंदावन जाने के लिए प्रतीक्षारत है। उस दिन अपने आप को पहली बार गीता न पढ़ी होने के लिए धिक्कारा था।

उसके बाद घर आ कर कितनी बार नियम बनाने का प्रयत्न किया कि नित्य एक श्लोक पढ़ने से तो आरम्भ करें पर हुआ ही नहीं। बस एक इंग्लिश अनुवाद वाली और एक गीता प्रेस की छोटी गुटका living room में रखी रहती थीं। उसे पूजा के समय नित्य पढ़ने का प्रयास किया, ‘कॉफ़ी टेबल बुक’ की तरह पढ़ने का प्रयास किया, ऑफिस आते-जाते पढ़ने का नियम बनाने का प्रयास किया पर प्रथम अध्याय के 8-10 श्लोकों से आगे किसी अवस्था में आगे नहीं बढ़ पाई। फिर सोचा पहले अच्छे से संस्कृत का पुनरावर्तन (revision) कर लूँ फिर गति से और सरलता से पढ़ ली जाएगी। पुस्तक से स्वयं पढ़ना आरम्भ किया क्योंकि लगता था दसवीं तक पढ़ी है तो उतना तक पहुँचे आगे की पास की एक वेद शाला में पढ़ लेंगे (पुणे में घर के पास मठ है वहाँ वेद शाला चलती है)। स्कूल वाला पुनरावर्तन भी न हो पाया, वेद शाला तो क्या ही जाते। इन सब में कुछ दो साल निकल गये।

पिछले वर्ष मैं गुरकुल में अंतः वासी बनने के बाद से चौथा गेयर लग गया! प्रतिदिन पहले शिक्षा सत्र में बच्चे गीता के दो अध्याय अवश्य पढ़ते हैं और एक संध्या समय। जिस समय मैं आयी तो तीसरा और पंद्रहवाँ प्रातः और पहला अध्याय संध्या समय चल रहा था। इतनी संस्कृत तो पढ़नी आती थी कि क्या लिखा है पढ़ लेते थे और बच्चों के साथ साथ गुरूमाँ से सुनकर उच्चारण की अशुद्धियाँ भी ठीक कर लीं। आते जाते गुरु जी कुछ त्रुटि ठीक कराते रहते थे। एक मास में बच्चों को तो तीनों पाठ कंठस्थ हो गए और मुझे त्रुटि रहित पढ़ने का अभ्यास हो गया। मोबाइल से अधिक गीता कहाँ रखी है इसका ध्यान होता था (सबकी अपनी अपनी प्रति है यहाँ)। अनुभव तो कर लिया पर एक बार किसी अतिथि से गुरुमाँ को कहते सुना तो आभास हुआ की गीता तो गुरुकुल में एक विषय है, नियम से नित्य व पूरी गंभीरता से पढ़ा जाने वाला और जीवन शैली भी।

गुरु माँ को 13 वर्ष की आयु से पूरी गीता कंठस्थ है। किसी भी अध्याय से कोई भी श्लोक, उसका कोई भी पद (एक अनुष्टुप छंद श्लोक में चार पद होते हैं) कभी भी पूछ लीजिये। उससे भी अधिक उसका दिनचर्या में कभी भी प्रयोग दृष्टांत के रूप में, कभी बच्चों से उनकी स्मृति परखने के बहाने, जो बच्चों ने याद कर लिया है उसमें से, कुछ भी पूछ लेना – बहुत सहजता से आता है उनके व्यक्तित्व में। उन्हें याद कराने के लिए तरह तरह से श्लोकों को लिखने का ग्रह कार्य मिलता है, जैसे प्रत्येक अध्याय का तीसरा श्लोक लिखो। मैंने भी बच्चों के साथ ऐसा करना आरम्भ कर दिया। फिर कभी शाम को हमने गाँव वाली गीता सुनी। गाँव की गुजराती में सुनाई गीता (कुछ ही श्लोक) सुनकर, उसकी शैली और शब्द चुनाव से हँस हँस के पेट में दर्द हो गया। सच में ROFL, साँस अटकने तक हँसे थे। संजय – हनजड़ेया, धृतराष्ट्र – धरतड़या और कृष्ण – कनहड़िया थे उसमें। ये भी गुरुमाँ ने सुनाया और कुछ महीनों में जैसे जैसे समय मिला उन्होंने गीता के प्रत्येक श्लोक पर एक गुजराती गीत लिखा, बात करते करते लिखती रहती थीं वो! 700 श्लोक हैं गीता में!

गुरुजी तो गीता-दर्शन के विशारद हैं। यहाँ उनसे गीता पढ़ने कितने लोग आते हैं, सभी वर्गों से। कई जैन गुरु मुनि आदि भी आते हैं उनसे गीता व दर्शन के विशेष प्रश्नों के लिए। तब मैंने जाना कि कितने लोग कितने स्तर पर गीता को अपने जीवन से जोड़ने के लिए प्रयासरत हैं। गीता के लिए क्या-2 करते हैं। अविश्वसनीय सा था।

अब गीता नित्य जीवन में है। प्रतिदिन एक अध्याय का सस्वर वाचन करना अत्यंत सहज है अब। कितने वर्तन पूरे हो चुकें हैं एक साल में। बच्चों के साथ बदल बदलकर नित्य के तीन अध्याय पढ़ते हुए; उच्चारण की अशुद्धि सुधारते हुए; कभी शब्दों से, कभी अंतः प्रेरणा से, कभी अनुभव कर, कभी गुरुजी को सुनकर श्लोकों को समझते हुए, कब भगवद्गीता जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई है, पता नहीं चला।

पहला पड़ाव

पिछले वर्ष गीता जयंती पर युवाओं (कॉलेज के बच्चों) के लिए आयोजित गीता निबंध प्रतियोगिता के आयोजको में सम्मिलित हुई तो वो भी अविश्वसनीय सा ही था कि एक वर्ष पहले तक गीता जयंती का ही पता नहीं था और अगले वर्ष में गीता निबंध प्रतियोगिता के निबंध जांच रही थी। 800-900 निबंध आये थे और मुझे इंग्लिश के और कुछ हिंदी के निबंध जांचने थे। संस्कृत में केवल एक निबंध आया था। बच्चे अंक तालिका बनाते थे। गुजराती निबंधों की वर्तनी त्रुटि और व्याकरण त्रुटि पर दबे दबे हँसते थे कि कॉलेज के भैया-दीदी इतनी ग़लतियाँ करते हैं। पहली परीक्षा थी मेरी, गुरुजी से मैंने कहा कि मुझे तो गीता का कुछ ज्ञान नहीं है, मैं कैसे जाँच सकूँगी? वे बोले थे- “मुझे पता है आपको सही संदेश ही समझेंगे, गीता को समझने के लिए उसके एक एक श्लोक का ज्ञात होना आवश्यक नहीं है।” तार्किक बुद्धि से सोचें तो ऐसे में मुझे अहंकार आना चाहिए था, पर नहीं आया, कृतज्ञता का भाव आया। ये मेरे लिए विलक्षण अनुभव था। आत्म शुद्धि आरम्भ हो गयी थी, भगवद्गीता के कारण!

हर वर्ष यह प्रतियोगिता आयोजित करना गुरुकुल की एक परंपरा सी है। युवा गीता पढ़ें, गीता से जुड़ें इसलिए आयोजित करी जाती है। इसी बहाने हाथ में तो उठाएंगे, कुछ पृष्ठ तो पलटेंगे। 900 में से 10 तो गीता को लेकर जिज्ञासु बनेंगे। निष्काम कर्म का बहुत ही सुंदर प्रत्यक्ष उदाहरण देखा। और बच्चों ने जो लिखा था वो एक अलग ही लघु यात्रा थी, विषय था – ‘अपने अपने जीवन में गीता के कौन से संदेश, उसके किन सिद्धान्तों का पालन उन्हें सफलता दिलाएगा और कैसे’। मेरा उन सब में से प्रिय वाक्य था – “गीता मा तो बद्धू खुल्लु छे!”-गीता में तो सब कुछ खुला है :)। उस किशोरी के कहने का अर्थ था कि सभी रहस्य ईश्वर ने सरलता से उजागर कर दिए हैं गीता में।

(बड़े गुरुजी पंडित विश्वनाथ दातार शास्त्री जी ने गुरुजी मेहुलभाई आचार्य को भी गीता निबंध प्रतियोगिता द्वारा ही प्राप्त किया था। उस समय डाक से भेजे गए उनके निबंध को पढ़कर फ़ोन कर बड़े गुरुजी ने गुरुजी के पिताजी से उन्हें लेकर वाराणसी आने को कहा था और उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया था। कोई निवेदन नहीं, कोई एडमिशन की प्रक्रिया नहीं, कोई बैकग्राउंड चेक नहीं, कोई आधुनिक स्कूलों के प्रपंच नहीं! बड़े गुरुजी के बाद मेहुलभाई आचार्य अब गुरुकुल के मुख्य आचार्य हैं, विषय विशारद है। गीता, आयुर्वेद, दर्शन के सभी मुख्य ग्रंथ, उपनिषद आदि उन्हें कंठस्थ हैं और सही समय और अवसर पर उसका उपयोग उद्धरण बहुत ही सहज है उनके लिए। केवल कंठस्थ ही नहीं, आत्मसात हैं ,उसमें से सब कुछ प्रत्येक बिंदु वह समझा सकते हैं फिर भी बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं। गुरुकुल में (दो तीन स्थानों में विभक्त) 30,000 पुस्तकें/ग्रंथ शोध पत्रादि हैं। )

दूसरा पड़ाव

चार महीने पहले, अचेत अम्मा को उनके अंतिम क्षणों में पंद्रहवाँ अध्याय जब पढ़ कर सुना रही थी तो वह सुन रही थीं। ICU में तीन पेशेंट चिंताजनक स्थिति में थे परंतु डॉक्टर ने अंदर रहकर अम्मा को गीता सुनाने की अनुमति दे दी थी। अम्मा के साथ साथ वो तीनों भी पूरी सभानता से सुन रहे थे। सभी नर्सिंग स्टाफ भी काम करते हुये सुन रहा था, दोनों सीनियर डॉक्टर भी। दूसरी बार बिना एक-एक श्लोक का अर्थ जाने अनुभव हुआ कर्मयोगी की परिभाषा का। अम्मा के साथ वाले बेड पर से मुझे निर्निमेष देखती और सुनती एक युवती के आर्त भाव से रहित उसकी विवश स्थिति में श्रवण क्षमता का – जैसे गुडाकेश की रही होगी कदाचित! और अम्मा के जीवन भर के सकाम और निष्काम कर्म का आभास और उसके अंतर का विवेक अपने आप प्रकट हुआ मन में। उस दिन तीन जीवों ने ICU में देह छोड़ा था। अम्मा की स्मृति के साथ एक श्लोक अब अंकित है मानस पटल पर:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

गीता कंठस्थ अभी भी नहीं है क्योंकि स्मृति की दृढ़ता बहुत क्षीर्ण है, उसका पिछले बीस साल में बहुत ह्रास किया है। जीवन शैली, दूषित भोजन, दवाओं का प्रयोग, रोग, बहुत सारे कारण हैं। श्लोकों का शब्दार्थ से भावार्थ व अंत में निहित अर्थ और उसकी आत्मिक धारणा अभी तक पूरी नहीं है, बल्कि लगता है अभी भी शून्य ही है। किन्तु गीता की पूर्ण अनुपस्थिति से सदैव उपस्थिति में ये स्थानांतरण कैसे हुआ, सच में पता नहीं चला। और यात्रा….जारी है।

सुता चली ससुराल!

नारी की यह प्रतिष्ठा, अविवाहितावस्था का स्वातंत्र्य, गृहव्यवस्था की स्वामिनी रूप में परिवर्तन, धर्म व्यवस्था शिक्षा का संतान को परंपरागत रूप में हस्तांतरण, पुरुष को संरक्षण व पोषण के लिए दिया जाने वाला दायित्व और ज्ञान-विज्ञान जैसे गंभीर विषय पर प्रभुत्व – पश्चिम के प्रकाश में सुधार की धूसित धारणा रखने वाले लोगों विशेषकर देवियों को अब भी पथ-प्रदर्शन के लिए पर्याप्त है।

शादी करके लड़कियों को ही पति के घर क्यों जाना होता है ? इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास..

जिस वैदिक समाज की आदिम वैवाहिक कल्पना ‘सूर्या’ के रूप में ऋग्वेद में प्रस्तुत की है, उसकी कल्पना न जाने कितनी शत-सहस्त्राब्दियों के बाद भी समाज में यथावत देखी जा सकती है। ऋषिका सूर्या का ऋग्वेद के दसवें मण्डल में सूक्त है:

सम्राज्ञी श्वसुरे भव सम्राज्ञी श्वश्रवा भव। ननांदरी सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधिदेवेषु । ।

अर्थात, हे वधु, तू ससुराल जाकर (अपने सदाचरण और सबके साथ अच्छे बर्ताव से) सास ससुर नंद के ऊपर अधिपत्य जमाकर सर्वत्र महारानी होकर रह!

कारण अवलोकन :

(1) ये परंपरा यानि कन्या का विवाह कर के अपने वर/पति के घर जाना ऋग्वैदिक काल से है और थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ अभी तक समाज में यथावत है। कोई व्यवस्था यदि सर्वहितकारी नहीं होती तो इतने लंबे समय तक टिक नहीं पाती। तो पहली बात ये इतनी प्राचीन है। पुराणों के काल से भी पहले की प्रथा, अतः परंपरा। पुराणों की बात इसलिए कि कई प्रकार का दूषण उसके बाद से आना आरम्भ हुआ जब गूढ़ ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों तक सरलता से समझाने के लिए लाक्षणिक भाषा में कथाओं और पात्रों की रचना हुई, जिसका अक्षरशः और स्थूल अर्थ लेकर के भ्रांतियों या ऐसी मान्यताओं का प्रसार हुआ जो तार्किक नहीं लगतीं। 

एक तर्क जो इस प्रथा के बदलाव के पक्ष में दिया जाता है कि सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएँ भी बंद हुईं और यह इस बात का द्योतक है कि निरंतर परिवर्तनशीलता व ‘सुधार’ हमारे धर्म का, सनातन का परिचायक है इसलिए इस प्रथा (विवाह कर के कन्या का ससुराल जाना) को भी क्यों न बदलें! तो पहली बात यह कुप्रथा नहीं प्रथा है। प्रथा केवल इसलिए बदलनी चाहिए क्योंकि वह पुरानी है, कुछ उचित तर्क नहीं लगता। दूसरा, सती भी प्रथा नहीं थी। आपने और हमने जो देखा सुना है वह अधिकतर ताज़े लिखे इतिहास में पढ़ा है और राजा राममोहन राय जैसे समाज ‘सुधारकों’ के जीवन चरित्र के माध्यम से जानते हैं। पहले तो उसकी तह तक जाकर देखिए की क्या यह प्रथा थी? – देशव्यापि और चिरकालीन? अथवा क्षेत्र विशेष में कुछ समय के लिए आयी विसंगति! दूसरा, राजपूतों के रण पश्चात होने वाले जौहर को यदि हम सती-प्रथा मानते हैं तो ये ठीक नहीं। ऐसा ही कुछ बाल-विवाह के साथ है। बाल-विवाह को चिर कालिक प्रथा मानते हों तो खोजें-पढ़ें कि लड़कियों की शिक्षा 16-17 वर्ष की आयु तक होती थी और लड़कों की 25 वर्ष तक। इस आयु में विवाह होने को बाल-विवाह कहा जाएगा ? तो इस विसंगति के आरम्भ होने का काल ढूंढें और कारण भी। तो पहला बिंदु यह है कि यह प्रथा वैदिक काल से ही स्थापित है। ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित व्यवस्थाएँ बहुत सूक्ष्म, गहन चिंतन व परीक्षण के बाद स्थापित करीं गयीं थीं,जो बहुत लचीली हैं, यानी परिवर्तनशील होते हुए भी सशक्त सिद्धान्तों पर आधारित हैं जो पूर्णतया व्यावहारिक हैं। इसलिए इतने समय तक चल पा रहे हैं। 

एक किसी ने इस प्रश्न पर मत प्रकट किया था कि इसे बदलना समाज को तोड़ने या राष्ट्र को नष्ट करने की ओर एक कदम होगा, तो उसका बहुत उपहास व तिरस्कार किया गया। किसी भी एक ओर के अंतिम ध्रुव पर अपना विचार बाँधने की बजाय एक मूल बात मैं ये समझती हूँ कि पूर्वजों के अतीत को जानने की उत्कंठा व अभिलाषा हर मनुष्य की होती है। जब अपने ही जीवन की अतीत कालिक स्मृतियों को वह परम् समान व स्नेह की दृष्टि से देखते है भले ही वह सुख की हों या दुख की, ऐसे ही अपने प्राचीन ज्ञान व परम्परा भी हमारे राष्ट्र की स्मृतियाँ हैं, उन्हें खो देने पर हम राष्ट्र का अस्तित्व भी खोते जाते हैं। 

ऐसे में एक रोचक सत्य ये भी है दक्षिण भारत के कुछ प्रान्तों में, जहाँ मातृ-प्रधान समाज का रूप है, वहाँ लड़के विवाह करके लड़की के घर जाते हैं, गोत्रादि बदलते हैं, वंशवृक्ष मातृपक्ष (माता की सत्ता से, पिता की नहीं) से चलते हैं। इसका मूल वैदिक-प्रथाओं से ये अपभ्रंश क्यों और कैसे हुआ, यह जानना रोचक होगा। ऐसा सीमित क्षेत्रों व कुलों में ही होता है, सर्वव्यापि नहीं है। 

(2) नर और नारी की रचना में अंतर है। मानव शरीर सत, रज और तम, इन तीन गुणों से बनता है, उसमें ये तीन गुण होते हैं। नर सत प्रधान है और नारी रज प्रधान है। 

ईश्वर के अहंकार ने, सत से सृष्टि की रचना की प्रेरणा करी और प्रकृति ने रज से सृष्टि की रचना करी। स्त्री को प्रकृति ने जीवन सृजन का गुण व लक्षण दिया है। पतञ्जलि के अनुसार स्त्री का अर्थ है – ‘स्त्यापति अस्यां गर्भ इति स्त्री’ – नारी को स्त्री इस लिए कहते हैं कि गर्भ की स्थिति उसके भीतर होती है। रजोधर्म, गर्भधारण व स्तन्य (breast milk) स्त्री की योग्यता है। न्याय बताता है ‘गर्भधारण योगत्वं’ – गर्भधारण की योग्यता उसका लक्षण! मनुष्य होते हुए भी जिसमें स्तन्य योग्यत्व हो वह स्त्री है। इन लक्षणों का उद्देश्य फल या उपस्थिति का कारण है संतान उत्पत्ति (संतति अथवा प्रजा की वृद्धि) अर्थात मातृत्व की प्राप्ति। 

नर में केवल पुरुषत्व होता है और नारी में स्त्रीत्व और कन्यात्व दोनों होते हैं। वस्तुतः जब एक पिता विवाह संस्कार के समय पुत्री का हाथ जामाता के हाथ में देता है तो केवल उसके कन्यात्व का दान करता है, उसके स्त्रीत्व का नहीं। पाणिग्रहण संस्कार में उसके कन्यात्व अर्थात भोग्यत्व की योग्यता (उसके द्वारा सर्जन करे जाने की योग्यता) का अमूल्य दान कन्या का पिता वर को देकर उसके संरक्षण व पोषण का दायित्व वर को देता है (वर के परिवार को नहीं)। अपने ही घर में परिपक्व स्त्री होने पर भी वह संतान की छाया से बाहर नहीं आ पाती। जब तक स्त्री स्वयं संतान की भूमिका व भाव में रहेगी तो माँ होने के भाव का दमन रहेगा। उसका पूर्ण उत्तरदायित्व लेने का भाव सीमित रूप में जागृत रहेगा क्योंकि वह स्वयं अपना उत्तरदायित्व अपने माता-पिता पर छोड़े है। 

(3) स्त्री रजप्रधान है और पुरुष (नर) सत प्रधान है। रज कामना का, इच्छा का द्योतक है। रज प्रधान होने के कारण उसमें लालसा, इच्छा, चाह प्रबल होती है, अतः स्त्री का एक नाम (विशेषण रूपी) ‘ललना’ है। इसी रज गुण के कारण स्त्री प्रेम-प्रधान है (और सत गुण के कारण पुरुष तर्क-प्रधान), लज्जाशीलता उसकी सहज-प्रेरणा है, प्राकृतिक लक्षण है। जैसे छुई-मुई के पौधे का छूते ही सिकुड़ जाना उसका प्राकृतिक लक्षण है। प्रकृति ने इन्हें ऐसा बनाया है तो ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’ का विचार तर्क की परिधि से बाहर है। इन गुणों के कारण स्त्री की कोमलता को लता स्वरूप बताया जाता है जिसे बढ़ने के लिए आधार-आश्रय की आवश्यकता होती है। इसी लिए उसके कन्यात्व को वर को सौंपते हुए कन्या का पिता उसके संरक्षण व पोषण का दायित्व वर को देता है। वर अथवा पुरुष उसका संरक्षक व पोषक होता है, स्वामी नहीं, उसका अधिकार नहीं होता स्त्री पर क्योंकि स्त्रीत्व का तो दान ही नहीं दिया गया, केवल कन्यात्व का दिया गया है। जब संरक्षण व पोषण का दायित्व वर को सौंप दिया तो पिता के घर न रह कर स्त्री वर के घर जाती है क्योंकि वर अपने उत्तरदायित्व का वहन अपनी अनुकूल व प्रभावी परिस्थितियों में अधिक अच्छी प्रकार कर पायेगा। इसे लता के रूपक से समझते हैं कि लता बिना किसी सहारे के, भूमि पर पड़ी-पड़ी भी बढ़ सकती है, परंतु जब उसे उचित आश्रय मिलता है तब उसके गुण, शक्ति व फल-फूल पूर्ण व उत्तम रूप से आते हैं। जब उस लता रूपी स्त्री का दायित्व वर को सौंप दिया तो पोषक का दायित्व स्थानांतरित हो गया। वर का कन्या के घर आ जाना एक ही घर में दो संरक्षक/ पोषक की स्थिति उत्पन्न करता है। सोचिये इसमें सामंजस्य कब तक शान्तिपूर्वक रहेगा?

(4)स्त्री के प्रेम प्रधानता के दो स्वरूप होते हैं – भावुक या आश्रित (emotional or dependant)। किसी भी स्त्री पर ध्यान देंगे तो दोनों में एक स्वरूप स्पष्ट दिखेगा। पुरुष तर्क प्रधान है, उसके भी दो स्वरूप होते हैं – तार्किक या जड़। दोनों प्रकार के पुरुष का बाहरी स्वरूप एक ही होता है। जहाँ भावुकता की, प्रेम की आवश्यकता हो वहाँ पुरुष को पुरुषार्थ करना पड़ेगा और स्त्री में स्वाभाविक है। ऐसे ही यदि स्त्री को तार्किक बुद्धि विकसित करनी है तो उसे पुरुषार्थ करना पड़ेगा। अब तुलना करिए, कौन नई परिस्थितियों में प्रसन्नतापूर्वक व सुलभता से रह पायेगा, – जड़ या भावुक, तार्किक या आश्रित?

(5) नर बीज का दाता है (giver) और स्त्री बीज की पात्र है, ग्रहीता है (receiver)। प्रकृति ने बीज को पोषित कर उससे फल बनाने का दायित्व स्त्री को दिया है, प्रकृति दायित्व लेने वाले (receiver) को देती है, देने वाले (giver) को नहीं। देने और लेने वाले समानांतर कब होंगे?,जब देने वाले को भी कुछ उत्तरदायित्व हो। इसलिए ग्रहीता के संरक्षण व पोषण का, माता की देखभाल का उत्तरदायित्व नर अथवा वर को देने की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक व्यवस्था का सृजन हुआ। यदि उस स्थिति में बेटी पिता के ही घर पर है तो वर पूर्ण उत्तरदायित्व नहीं ले इसकी गहन संभावना सदैव रहेगी। 

‘स्थिरत्व’ स्त्री का प्राकृतिक गुण है (रज प्रधानता के कारण)। वह एक स्थिति या परिस्थिति में लंबे समय तक रह सकती है। पुरुष का प्राकृतिक गुण महत्वाकांक्षा है (सत गुण, अहंकार प्रधान होने के कारण), इस कारण वह एक स्थिति या परिस्थिति में अधिक समय तक नहीं रह सकता। ऐसे में पूर्णतया अनुकूल न होने पर भी नए स्थान पर रह पाना स्त्री के लिए सहज है, पुरुष के लिए कठिन है। एक पुरुष (पिता) की इच्छा (उसकी जड़ता) के लिए दूसरा पुरुष लंबे समय तक अनुकूल न होने पर अथवा निज जड़ता के कारण, लंबे समय तक उस स्थिति में सहजता से नहीं रह पायेगा। जबकि स्त्री दूसरी (वरिष्ठ) स्त्री के उपस्थिति व सत्ता में अपने भावुकता, आश्रितता व स्थिरत्व के प्राकृतिक गुण के कारण लंबे समय तक पूर्णतया अनुकूल न होने पर भी उस स्थिति में रह पाएगी। स्थिरत्व के गुण के अभाव के कारण पुरुष पारिवारिक संरचना में आत्म-वश्य, संचालनीय (self-manageable) बहुत कम होता है, ऐसे में स्त्री का उसके परिवार के संचालन के लिए उसके घर आना प्रायोगिक, वांछनीय है। स्थिरत्व, बुद्धि-बल (युक्ति-बल, काल-बल, व सहज-बल) के जो अवयव व्यवहार बल कहलाते हैं उसकी मात्रा स्त्री में कहीं अधिक है। गृह व्यवस्था का निर्वहन स्त्री सुलभ है। उस गृह की स्वामिनी होने का भाव उसके लिए आवश्यक है। अपने पिता के घर में गृहस्वामिनी का भाव आने की संभावना नहीं या अति क्षीण है। 

एक जगह पढ़ा तो बात तर्कसंगत लगी कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी स्त्री (अपनी पत्नी) के परिग्रह में रहने पर उन्हें कटु वचन कहे और अपने चरित्र की विशुद्धि की सफाई सीता को देनी पड़ी। तो क्या एक सामान्य कलियुगी नर मानव से अपेक्षा करी जा सकती है कि वह अन्य घर में (अपने पिता के घर में) रहने वाली अपनी पत्नी पर किसी प्रकार का अनुचित लांछन नहीं लगाता रहेगा? गृहस्थी की शांति के लिए सामान्य अवस्था में भी स्त्री के अपने पति के घर में रहने की व्यवस्था की परंपरा ही चली और रही भी। स्त्री का एक नाम ‘योषा’ है अर्थात जो पुरुष को अपने साथ जुटाती है। 

ऐसे ही स्त्री का एक नाम ‘मानिनी’ है। अर्थ विस्तृत है। स्त्री मानप्रिय है, रूठने पर मनाए जाने की आकांक्षा वाली है, दूसरे उसमें स्वाभिमान व आत्मसम्मान की भावना तीव्र होती है और साथ ही साथ अपनत्व की भावना भी।   

समाज में पतनसूचक आये दो परिवर्तन इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य हैं।  पहला – चार प्रकार के बल में पुरुष में अर्थ-बल और काम-बल( पौरुषत्व, कर्म को सिद्ध करने की शारीरिक क्षमता) स्त्री की अपेक्षा अधिक होने पर उसने संरक्षक व पोषक की भूमिका को अर्थ-बल के कारण अधिकार व स्वामित्व मान लेना आरम्भ किया और काम-बल का स्त्री के भावुक व आश्रित- सहज-प्रेरित/प्राकृतिक गुणों का दमन करने के लिए प्रयोग करना आरम्भ किया। फलस्वरूप अन्य दो बलों (बुद्धि-बल/व्यवहार-बल व प्रतिकार-बल) को हीन और अर्थ-बल व काम-बल को श्रेष्ठ मानने लगा। दूसरा-  स्त्री की आश्रितता के मूलभूत गुण को ठेस लगने से और आत्मसम्मान व स्वाभिमान की भावना तीव्र होने से, उसने अपने को इन दोनों बलों अर्थात अर्थ-बल व काम-बल को विशेष पुरुषार्थ कर सशक्त करना आरम्भ कर दिया जिसका रूप हम आज के समय में जीविका-उपार्जन/धन-उपार्जन में कार्यरत स्त्रियों के रूप में देखते हैं। अपने काम-बल को अधिक दृढ़ करते-करते उसका पुरुषार्थ करते-करते आज वह हर उस क्षेत्र में कार्य करने को तुली है जहाँ स्वाभाविक शारीरिक बल ही अधिक चाहिए होता है और इसे जेंडर इक्वलिटी (gender equality) का सिद्धांत बना दिया गया है। इसका सीधा दुष्प्रभाव उसके आंतरिक अंगों और गृहस्थी पर पड़ता है।

 विवाह होने पर स्त्री किसी की कन्या न होकर पत्नी हो जाती है (कन्यात्व का दान पाणिग्रहण के समय होता है)। पिता पुरुष है – तर्कप्रधान, जड़, भावुकता के अपेक्षाकृत अभाव वाला (यहाँ सबके प्रति सामान्यतः भावुकता की बात है केवल अपनी पुत्री के प्रति नहीं) और महत्वाकांक्षी! परिस्थिति का संतुलन, लचीलापन, कन्या से मातृत्व में परिवर्तन, गृहव्यवस्था में परिवर्तन, संतान से गृह स्वामिनी होने का भाव – यह सब पुत्री एक स्त्री होने के कारण बहुत सहजता से जी लेगी परंतु पिता और पति इतने सारे परिवर्तन पुरुष होने के कारण इतनी सहजता से नहीं जी पाएंगे। 

परिवार, पीढ़ी और अंततः संस्कृति सहज और सुचारू रूप से कैसे चले, ये ही विचार कर हमारे अति ज्ञानी पूर्वज ऋषि-मुनियों ने ऐसी कालातीत (timeless) परम्पराएँ स्थापित करी हैं जो अत्यंत दूरगामी परिणाम देने वाली, सशक्त और समाज को सदैव विकास की ओर अग्रसर रखने वाली हैं। आजकल के हम सभों की समस्या यह लगती है की एक तो हम ऋषि-मुनियों को अपने से कुछ ही बेहतर (marginally better) समझते हैं, उनकी पारगामी बुद्धि की योग्यता का आकलन अपनी सीमित बुद्धि से करते हैं इसलिए स्वीकार नहीं कर पाते की मानव जीवन, समाज व राष्ट्र के विचार से गहन चिंतन, अनुभव व प्रयासों के बाद उन्होंने परम्पराएँ व व्यवस्थाएँ स्थापित करी हैं जो कालातीत होने में सक्षम हैं। हमें सब कुछ अविश्वास व प्रश्नवाचक दृष्टि से ही देखना है और मूल व दूषित में अंतर करने के विवेक को विकसित करने का प्रयास नहीं करना है। 

दूसरा, समय के साथ योजयनद्ध तरीके से हमारे दृष्टिकोण व सोच में जो पतित परिवर्तन लाया गया है, उसके चलते हम अपने संस्कार, परंपरा, व्यवस्था या जीवन-शैली को अति सरल होने के कारण उसे प्रभावी स्वीकार नहीं करते। उसे रूढ़ीवादी, अपूर्ण, अप्रासंगिक होने की दृष्टि से अधिक देखते हैं। चैतन्य को प्राप्त हमारे पूर्वज जिस स्तर पर चिंतन व मनन करते थे वह हमें उपलब्ध नहीं। उसके फलस्वरूप हमें सूत्रबद्ध ज्ञान, विज्ञान, विद्याएँ, कालजयी व्यवस्थाएँ प्राप्त हुई हैं। प्रभावी को जटिल (complex) होना आवश्यक नहीं, ये हमारी बहुत सारी परम्पराएँ सिद्ध करती हैं। 

घर के भीतर स्त्री समस्त व्यापार का केंद्र होती है। गृह व्यवस्था का निर्वहन (उसमें केवल भोजन पकाना कपड़े धोना नहीं, सब कुछ है), परिस्थिति संतुलन, स्थिरत्व उसे सुलभ व सहज है। विभिन्न वय एवं श्रेणी के पुरुषों से अलग न रहकर वह उनकी चर्चाओं, क्रियाओं और विचारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। क्या एक पिता जिसने उसे जन्म दिया, उसके ऐसा करने पर उसे इस परिपक्व दायित्व के अयोग्य समझें (कन्या संतान भाव के बने रहने के कारण), इसकी संभावना नहीं? गृहस्थी का मूल भार्या है, जो गृहस्वामिनी  होने पर स्त्री का परिवर्तित रूप है। वैदिक समाज की जो वैवाहिक कल्पना, कन्या की कल्पना ‘सूर्या’ के रूप में ऋग्वेद में प्रस्तुत करी है, वह यौवन के लक्षणों सहित हुई है और उसे स्वतः पति की कामना करने वाली सूचित किया है। अपने जीवन-संगी निर्वाचित करने की स्वाधीनता रखने वाली ये कुमारिकाएँ आधुनिक नहीं, ठेठ वैदिक काल की हैं। नारी की यह प्रतिष्ठा, अविवाहितावस्था का स्वातंत्र्य, गृहव्यवस्था की स्वामिनी रूप में परिवर्तन, धर्म व्यवस्था शिक्षा का संतान को परंपरागत रूप में हस्तांतरण, पुरुष को संरक्षण व पोषण के लिए दिया जाने वाला दायित्व और ज्ञान-विज्ञान जैसे गंभीर विषय पर प्रभुत्व – पश्चिम के प्रकाश में सुधार की धूसित धारणा रखने वाले लोगों विशेषकर देवियों को अब भी पथ-प्रदर्शन के लिए पर्याप्त है। 

हमारी भारतीय व्यवस्थाओं और पद्धति ने समाज के मनोनुकूल सुविधा प्रदान करके भी पवित्र परंपरा का जो अंकुश रखा है, उसकी कल्पना भी आधुनिक सुधारकों को मुश्किल ही छू सकी है। ये सामाजिक आधार की दूरदर्शी सुविधाएँ, हमारी पुरातन सभ्यता के मूल – निरंतर प्रगतिशीलता – पर ही टिकी हैं। प्रगतिशीलता व प्रगति को शुद्ध व विवेकी बुद्धि से समझना आवश्यक है। क्योंकि प्रगतिशील संस्कृति के सुदृढ़ सिद्धांत पर समाश्रित होने वाले समाज का अस्तित्व ही सदा अविचल रहता है। 


“शक्तिक्रीड़ा जगत् सर्वम्”

सारा जगत चित्शक्ति विलास है!

यह सारा जगत शक्ति की ही क्रीड़ा है।वस्तुत: परमात्मरूपा महाशक्ति ही विविध शक्तियों के रूप में सर्वत्र क्रीड़ा कर रही हैं। जहाँ शक्ति नहीं वहाँ न्यूनता है। शक्तिहीन का कहीं भी समादर नहीं होता। ध्रुव और प्रह्लाद भक्तिशक्ति के कारण पूजित हैं। गोपियाँ प्रेमशक्ति के कारण जगत्पूज्य हुई हैं। हनुमान और भीष्म की ब्रह्मचर्यशक्ति, व्यास और वाल्मीकि की कवित्वशक्ति, भीम और अर्जुन की शौर्यशक्ति, युधिष्ठिर और हरीशचंद्र की सत्यशक्ति, प्रताप और शिवाजी की वीरशक्ति ही सबको श्रद्धा और समादर का पात्र बनाती है। सर्वत्र शक्ति की ही प्रधानता है। समस्त विश्व महाशक्ति का ही विलास है। देवीभागवत में स्वयम भगवती कहती है – ‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् – अर्थात समस्त विश्व मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त दूसर को सनातन या अविनाशी तत्व नहीं है।

‘नित्यैव सा जगन्मूर्ति:’ – वह जगदात्मिका भगवती नित्या है।

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती तवेत्याहु: सन्तो धरणिधरराजन्यतनये।

तदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयत: परित्रातुं शंके परिह्रतनिमषास्तव दृश:।।

 हे शैलेंद्रतनये! शास्त्र ऐवं संत यह कहते हैं कि तुम्हारे पलक झपकते ही यह संसार प्रलय के गर्भ में लीन हो जाता है और पलक खोलते ही यह फिर से प्रकट हो जाता है।संसार क बनना और बिगड़ना तुम्हारे लिये एक पल का खेल है। तुम्हारे एक बार पलक उठाने से जो यह संसार खड़ा हो गया है वह नष्ट न हो जाये, मानो ऐसी शंका से तुम सदा निर्निमेष दॄष्टि से अपने भक्तों को निहारती रहती हो।

चित्त-विलास प्रपंच यह, चिद्-विवर्त चिद्-रूप।

ऐसी जाकी दृष्टि है, सो विद्वान अनूप।।

ॐ श्रीमूलशक्त्यै नम:

~ साभार: कल्याण – शक्ति अंक । चित्र सौजन्य: बिजय बिसवाल

अट्ठारह पुराण – उनके नाम

अट्ठारह पुराणों के नाम कैसे याद करें?

हमारे अट्ठारह पुराण मुख्य हैं, जो हमारे इतिहास की श्रेणी में आते हैं (रामायण व महाभारत हमारे अन्य दो मुख्य ऐतिहासिक ग्रंथ हैं)।

यदि उनके नामों को जानकर ही अपने इतिहास की जानकारी को आरंभ करना चाहें और विशेषकर बच्चों को बताना चाहें तो सबसे बड़ी कठिनाई उनके नाम याद करने या रखने में आती है। अट्ठारह नाम रटने का बड़ा प्रयत्न करते हैं, पर फिर भी कोई न कोई भूल ही जाते हैं।

इन्हें सूत्र रूप में याद रखना बड़ा ही सरल है इस अनुष्टुप छंद के माध्यम से:

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।

अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्

इसे गाकर याद करेंगे तो और भी सरल होगा। गीता के (अधिकतर) श्लोकों की गायन शैली में ही इन्हें भी गाया जाता है।

मद्वयं अर्थात् दो म (से) १. मत्स्य पुराण २. मार्कण्डेय पुराण

भद्वयं अर्थात् दो भ (से) ३. भागवत् पुराण ४. भविष्य पुराण

ब्रत्रयं अर्थात् तीन ब्र (से) ५. ब्रह्म पुराण ६. ब्रह्माण्ड पुराण ७. ब्रह्मवैवर्त पुराण

वचतुष्टयम् अर्थात् चार व (से) ८. विष्णु पुराण ९. वराह पुराण १०. वामन पुराण ११. वायु पुराण (जो विष्णुपुराण के अनुसार शैव पुराण है)

से एक १२. अग्नि पुराण

ना से एक १३. नारद पुराण

से एक १४. पद्म पुराण

लिं से एक १५. लिङ्ग पुराण

से एक १६. गरुड़ पुराण

कू से एक १७. कूर्म पुराण

स्क से एक १८. स्कन्द पुराण

और अंत में इन पुराणों के सार स्वरूप ये सुभाषित है:

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी — पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

तो यदि न किया हो तो स्वयं भी याद करें और बच्चों को भी याद कराएँ। प्रतिदिन एक काम ऐसा करें जो आपके बच्चों को, चाहे वो किसी भी आयु के हों, आपके इतिहास व संस्कृति से अवगत कराए और उनके निकट ले जाए। जिस भारत को इतने गर्व से Indic civilisation कहते हैं, उसके इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम से इतर और उससे पहले बहुत बहुत कुछ है और सही अर्थ में वही हमारे भविष्य की सफलता की कुंजी है।

यात्रा जारी है….