मास्टरस्ट्रोक ! पर किसका..?

सावधान ! कृपया पहचानें कि किसका मास्टरस्ट्रोक आज सोशल मीडिया पर बड़ी अच्छी तरह चल रहा है।
मुँह नीचे करके तितर बितर हो जाएँ या एकजुट खड़े रहें?

आज का मूडी जी का मास्टरस्ट्रोक : जागो हिन्दू जागो

हैश्टैग “टेक द फ़ाइट टू द स्ट्रीट्स”

👆गहन चिंतन करें और समझें।

आज की नूपुर शर्मा की घटना अप्रत्याशित है। क्षुब्ध नहीं हूँ क्योंकि एक सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी को सनातन का न तो रक्षक मानती हूँ न ही तारनहार।

किसी से उसकी क्षमता से अधिक आशा बांधेंगे तो ठेस अधिक लगेगी ही।

सावधान ! कृपया पहचानें कि किसका मास्टरस्ट्रोक आज सोशल मीडिया पर बड़ी अच्छी तरह चल रहा है – जो सामान्य जन का एकजुट होना शुरू होता दिख रहा था (आभासी दुनिया में ही सही) वो आज ही छिन्न भिन्न हो रहा है। अधिकतर कह रहे हैं कि अपने आप और केवल अपने जीवन-जीविका पर ध्यान दो, हिंदू राष्ट्र के आशावाद ने अचानक मुँह फेर लिया आज। राष्ट्रत्व और अपने सामूहिक अस्तित्व के प्रति उदासीन और बँटा हुआ हिंदू ही उन राक्षसों को शक्ति है।

इस एक ही पासे से लकड़ी खाने वाले मकड़े ने रत्ती रत्ती लकड़ा खाते हुए आज उस भाग को खा डाला जी जगह से एक सशक्त शाखा निकली हुई थी।

इस गणित की पहेली जो आज की घटना के, हिन्दू राष्ट्र के संदर्भ में सुलझाइए और पहचानिये कि लकड़ी कौन है, मकड़ा कौन, रत्ती रत्ती खाई जाने वाला पदार्थ क्या है और कितने दिन लगेंगे लकड़े को समाप्त होने मेंः

अस्सी मन का लकड़ा, उस पर बैठा मकड़ा, रत्ती रत्ती खाये तो कितने दिन में खाये।

राष्ट्रवादी उपभोक्ता बनेंगे ?

राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में समर्थ होना चाहेंगे या असमर्थ रहना चाहेंगे ?

आपने शायद वो विडिओ देखा होगा चीन का मनी ट्रैप – यानि उसके पैसे के जाल के बारे में। कैसे चीन पहले सहायता के लिये लोन देता है और देशों के वापस ना चुकाने पर धीरे धीरे उस देश के संसाधनों और स्थानों तक पर अपना कानूनी रूप से वैध अधिकार कर लेता है। धीरे-धीरे कई देशों में ऐसा कर रहा है और अपने सिल्क-रूट पर कार्य कर रहा है। हम ये सोच कर खुश हो जाते हैं कि भारत की ऐसी स्थिति नहीं है तो हम सुरक्षित हैं । क्योंकि मोदी जी अन्य देशों के साथ सफल सामरिक व कूटनैतिक संबंधों के द्वारा सिल्क-रूट के षड्यन्त्र से भली-भाँति निबट रहे हैं, हम सुरक्षित हैं । बड़े बड़े सुरक्षा और आधारभूत इन्फ्रस्ट्रक्चर की वस्तुओं के भारत में निर्माण से हमें बल मिलता है, उसकी ओर सकारात्मक कदम बढ़ रहे हैं, इसलिए हम सुरक्षित हैं।
केवल इतना ही सोचकर निश्चिंत ना हो जाईये ! हम में से प्रत्येक का जो दायित्व है, राष्ट्रधर्म है उसका हम सबको अपने अपने स्तर पर ही पालन करना है। आप और हम उसमें कहाँ आते हैं, ये समझना चाहिए।
क्योंकि भारत बाकी देशों जैसा नहीं है, इसीलिए भारत के लिये चीन की रणनीति भी बाकी देशों जैसी नहीं है । उसका एक पक्ष ये है कि उसे भारत का आर्थिक नियंत्रण नहीं प्राप्त करना बल्कि उसे आर्थिक रूप से दुर्बल करना है, अस्थिर करना है, आर्थिक अराजकता फैलानी है।
यहाँ आर्थिक निर्भरता बनाने के लिये उसकी भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या पर निवेश का रास्ता लिया है। भारत के बाजार कर दोधारी निशाना है – एक फुटकर बाजार जिसे आप और हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं और दूसरा स्टार्ट-अप में निवेश । दोनों जगह दृष्टि में आए ऐसे बड़े बड़े नाम उसका लक्ष्य नहीं है, अपितु उसका लक्ष्य है साधारण उपभोक्ता-आप और हम! उपभोक्ता बाजार में ‘मेड इन चाइना’ को तो हम जानते ही हैं। बीच-बीच में ‘स्वदेशी ही लो’ की हवा चलती है किन्तु अंततः साधारण भारतीय उपभोक्ता सस्ता होने के कारण और सुलभता से उपलब्ध होने के कारण अभी भी अधिकतर चीन का बना सामान ही प्रयोग कर रहा है। ट्विटर की जागरूकता बहुत ही छोटे स्तर की होती है, उसे पूरे भारत का व्यवहार और उत्तर समझने की भूल हम ना करें तो अच्छा। फुटकर व्यापारी चीन के बने उत्पाद बहुत सरलता से, अत्यधिक उधार पर प्राप्त कर सकते हैं अतः धीरे-धीरे गोली-टॉफी तक यहाँ बनाना छोड़कर वही से आयात करने लगे हैं । हम सबको अपने परफेक्ट घर के परफेक्ट मंदिर में परफेक्ट मूर्ति चाहिए तो दीपावली पर एकदम समकोणीय सुंदर दिखने वाली लक्ष्मी-गणेश ही आते हैं जो पास के बाजार में मिल जाए। ट्विटर के फोटो-ओप में मिट्टी का सामान बनाने वाले या बेचने वाले से ही अंततः विसर्जन करने के लिये लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं लेने के आह्वान सीमित होते हैं; व्यापक स्तर पर बाजार में क्या उपलब्ध है और लोग क्या ले रहे हैं, एक दृष्टि डालने पर दिख जाता है। ये तो हमारी संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव की बात है, साधारण जीवन की मूल आवश्यकताओं के साधनों और उत्पादों के तो असंख्य उदाहरण हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार-नियमों के चलते सरकार एक सीमा के बाद इस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, लेकिन चीन को रोकने की पूरी आशा हम केवल सरकार/शासन से रखते हैं । फुटकर व्यापारी थोक विक्रेता का ग्राहक है और थोक विक्रेता चीन की महा-थोक, सस्ती और निरंतर आपूर्ति का। फुटकर और थोक व्यापारी की अधिक से अधिक लाभ कमाने की मूलभूल अपेक्षा है। वो अपना लाभ की मात्रा में कोई कमी नहीं चाहते और उपभोक्ता के रूप में हमें सबसे सस्ता और घर के बगल वाली दुकान में मिलने वाला सामान ही चाहिए।
उसी प्रकार वैसे तो स्टार्ट-अप के जगत में बहुत सारा विदेशी निवेश लगता है और चीन के निवेश की पूँजी छोटी लगती है – कुछ ६-७ बिलियन अमरीकी डॉलर ! कहा जाता है कि सरकार के लगाए प्रतिबंधों के बाद तो इस निवेश में और भी कमी आई है क्योंकि स्टार्ट-अप अन्य विदेशी निवेशकों से और भारत में से ही बहुत धन इकट्ठा कर ले रहे हैं। केवल बड़े-बड़े कुछ स्टार्ट-अप में चीन का पैसा लगा है (2020 में भारत के 24 में से 17 यूनीकॉर्न्स में चीन का प्रत्यक्ष निवेश था जिसमें अलीबाबा और टेनसेंट मुख्य थे, एन्ट फाइनैन्शल अलीबाबा की ही सहबद्ध कंपनी है)। आज byju, zomato जैसे कुछ का उदाहरण दे कर बताया जाता है कि चीन का निवेश भ्रम है, इन्होंने कितनी तेजी से चीन के निवेश से अपनी निर्भरता हटा ली और हम मान लेते हैं कि ऐसा ही है । जिन जिन प्रकाशन समूहों में ये बताते हुए आलेख-आर्टिकल आते हैं उनके नाम देखिएगा कभी। भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भ्रष्टाचार से ग्रसित है, ये हम केवल राजनैतिक चर्चाएं करते समय ध्यान में रखते हैं लेकिन ऐसे बिजनस आर्टिकल पढ़ते समय भूल जाते हैं। लेकिन छोटे-छोटे कितने ही स्टार्ट-अप की निवेश की पहली पसंद या विकल्प कोई चीनी निवेशक या निवेश कंपनी ही होती है। बहुत से ऐसे लोगों को निजी रूप से जानती हूँ।
परोक्ष रूप से चीन क्या कर रहा है और किस प्रकार अमेरिका में वेन्चर केपिटल कंपनियाँ बना के छद्म वेश में निवेश कर रहा है, ये भी कम ही लोग जानते हैं। ट्रम्प के शासन तंत्र ने बहुत सी ऐसी कंपनियों को बंद किया, उन के दाँत कुंद किये, तो व्यापार जगत ने बहुत भर्त्सना करी (र.र. शब्द का प्रयोग करने का बड़ा मन है यहाँ!) । वहाँ भी ‘करेला, वो भी नीम चढ़ा’ तब हो जाता है जब सारी व्यापारी दुनिया कहती है (भारत की विशेष रूप से) कि राजनीति और व्यापार को अलग रखना चाहिए। कदाचित उसका निहित आर्थिक स्वार्थ इतना अधिक है कि ये समझ नहीं पाती कि चीन का हर कदम वैश्विक राजनीति से प्रेरित है। जैक मा (की कंपनी अलीबाबा) ने भारत में निवेश को केवल व्यापारिक दृष्टि से नाप-तोल कर विवेकपूर्ण व्यवहार करना शुरू किया और अपने देश में भी शासन से अलग आर्थिक स्वावलंबन की राह पर चलने का प्रयास किया तो, एक दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी कंपनी को रातों-रात क्या बना दिया गया !और जैक मा ऐसे अंतर्ध्यान हुये कि कभी-कभी ही कहीं-कहीं ही दिखते हैं अब!
पेटीएम का उदाहरण देखिए। एक भारतीय के विचार और प्रयास पर चीन ने भरपूर पैसा लगाया । सबसे अधिक प्रचलित हुआ, उपभोक्ता ने हाथोंहाथ लिया । सरकार ने भी विमुद्रीकरण लागू होने पर उसका लाभ लिया और जनता ने भी । धीरे-धीरे प्रकल्प सफेद हाथी बन गया । अब चंद्रशेखर जी का राष्ट्रीय स्वावलंबन जागा या आत्मनिर्भरता का भाव अथवा कोश के खाली होने और निवेशकों के हाथ खींचने की स्थिति बन गई – जिस भी वजह से, आईपीओ आया… और लगभग मुँह के बल ही गिरा। भारत के फुटकर उपभोक्ता ने जरूरत के समय उसका बहुत लाभ लिया पर जब निवेशक के रूप में आया तो बोला “ नहीं भाई, ओवरप्राइस्ड है, कोई फायदा नहीं, मत-लो/बेचो !” भारत में ही बने, भारतीयों के लिये ही बने एक उत्पाद को बनाए रखने के लिये भी राष्ट्रीयता नहीं, निजी लाभ ही मुख्य बन गया । ये केवल एक उदाहरण दिया यहाँ !
ऐसे ही अवसर चीन पूरी मेहनत से, समय लगा के, बुन-बुनकर आपके सामने परोसता रहा है और रहेगा। और हम जब तक हमारी अपनी निजता को बहुत छोटा और प्रभावहीन मानते हुए, अपने नित्य जीवन और राष्ट्रीयता को दो अलग अलग पदार्थ मानते रहेंगे, सुख और हित में से सुख को चुनते रहेंगे, तब तक ठगे जाते रहेंगे और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में असमर्थ रहेंगे।

अम्मा

माँ

नोवेम्बर 1938 – अगस्त 2020

अम्मा चली गयीं। उनकी आत्मा अब दिवंगत हो गई। ईश्वर की शरण में है। जीवन चक्र का एक वृत्त पूर्ण हुआ।

ये अच्छी तरह पता है, लेकिन माँ का रूप तो वही देखा जाना, जो इस जीवनमें था। आत्मा की यात्रा की जानकारी उनके अब अचानक से न होने दुख, ख़ालीपन, कष्ट और अवसाद को कम नहीं कर पा रही। धीरे धीरे उनके जाने के दिन के एक-एक दिन पीछे होते जाने से ये अनुभव स्मृति में परिवर्तित होना आरंभ हुआ है पर यही जीवन भर की स्मृतियाँ एक विद्युत तरंग की तरह आती हैं और हाथ पैर सुन्न कर जाती हैं, एक ही जगह पर जड़ खड़े कर जाती हैं।

ईश्वर की कृपा से आपस में प्रेम से जुड़े घर परिवार की ‘जगत मामी’ ने प्रत्येक व्यक्ति जीवन को छुआ है। कोरोना के समय में भी जो अपने को उनके अंतिम दर्शन लेने से नहीं रोक पाए, उन सभी व्यक्तियों में एक भी, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसने उनसे कुछ सीखा ना हो, उनके हाथ का बना कुछ फ़ेवरेट खाया हो या उनके हाथ से बना कुछ पहना न हो। अनगिनत स्मृतियाँ..सबकी..

कोई शोक के आता है तो कभी बात कर पाती हूँ, कभी नहीं कर पाती। लगा था, लिख कर मन का सार शब्दों में आ पाएगा। पर यह असीम ईश्वर का अंश, जिसे हम माँ के रूप में जानते हैं, शब्दों से बहुत परे है।

कितने रूप मन में, मस्तिष्क में एक साथ घूम रहे हैं।

वो वाली अम्मा, जिसकी पहली लिखाई उनकी काली डायरी में देखी जो वो बच्चों की तोते भाई वाली कविता थी, या वो वाली जिनकी आख़िरी लिखाई स्वस्तिक के आकार में लिखा राम-नाम था।

वो वाली माँ जो एकता कपूर के अधिकतर धारावाहिक बड़े रस से देखती थीं, या वो वाली जो एक बार में विस्तृत श्रीमद्भागवतम पढ़ गईं थीं।

वो वाली माँ जो हाथ के पंखे, झाड़ू से पिटाई करती थीं, या वो वाली माँ जिसने अपनी बेटी की नाक इसलिए नहीं छिदाई थी क्योंकि उससे दर्द बहुत होता है।

वो वाली माँ जो सारे स्कूल जीवन में बेटी को अकेले पैदल आने-जाने की आदत डालती थीं या वो वाली जो ऑफ़िस की कैब से भी घर पहुँचने तक गेट पर ही टहलती रहती थीं।

वो वाली माँ जो परिवार की सभी बहुओं को सूने हाथ रखने पर बहुत डाँटती थीं, या वो वाली जो पापा के जाने के बाद कभी पिक्चर देखने हॉल में नहीं गयीं।

वो वाली माँ जिसे सारा जीवन स्वावलंबी व दौड़ता फिरता देखा, जिन्हें नानाजी उनसे 8 साल बड़े मामाजी के पीछे भगाते थे, या वो वाली जो ICU की मशीनों के तारों, अपने अंदर गयीं नलियों में घिरी, धीरे धीरे शारीरिक कष्ट से अचेतन होती इसलिए भावशून्य मुख लिए थी कि उनके चेहरे पर कष्ट देखकर उनके बेटे को असह्य कष्ट हो रहा था।

वो वाली माँ जिसकी कभी कभी चिंता होती थी कि कैसे अपनी गृहस्थी का,पुत्र का मोह छोड़ सकेंगी, या वो वाली जिन्होंने तीन दिन में अपनी जिजीविषा समेट ली और वेंटिलेटर पर भी अपनी हृदय गति रोक कर, बाहर के बल से एक श्वास भी स्वीकार नहीं करी।

उनके जाने के दुःख को बता नहीं सकती लेकिन अम्बे माँ ने उन्हें अपनी शरण में लिया और उनका ध्यान करने पर गले तक भरी हुई संतुष्टि का आभास देकर जो ममता भरी सांत्वना दी, वही आगे जीवन का संबल है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

मेरा गीता पथ

गीता जयंती के अवसर पर अनेक गहन लेख, विश्लेषण कई विद्वानों ने आज साझा किये। मेरा तो साधारण सा लगने वाला मेरा असाधारण अनुभव, साझा कर रही हूँ।

गीता विश्व की सर्वाधिक अनुवादित पुस्तक है। गीता प्रेस, गोरखपुर का गीता की प्रतियाँ छापने का विश्व रिकॉर्ड है। सबसे प्रिय व प्रचलित ग्रंथों में से एक है भगवद्गीता! आज गीता-जयंती है, मोक्षा एकादशी – मार्ग शीष शुक्ल एकादशी!

अनेक गहन लेख, विश्लेषण आज देखने और पढ़ने को मिले। 

दो वर्ष पहले तक मुझे कुछ नहीं पता था गीता जयंती के बारे में और गीता की बारे में केवल जानकारी थी। कितने योग हैं, प्रत्येक का क्या संदेश है, भीम के शंख का नाम क्या है, ईश्वर को कौन प्रिय है, निष्काम कर्म के सोपान क्या हैं – कुछ नहीं पता था।

घर में चार या पाँच गीता, अलग अलग रूपों में होने पर भी, पूरी एक बार भी पढ़ी नहीं थी। अनुवाद तो बाद की बात है, मूल संस्कृत के श्लोक भी गिने-चुने थे जो पता थे या कंठस्थ थे ( बी आर चोपड़ा का धन्यवाद)। जर्मनी, ब्लैक फारेस्ट घूमने गयी थी और वहां के एक छोटे से गाँव जैसी जगह में मुझे एक इस्कॉन के जर्मन व्यक्ति ने भगवद्गीता की अंग्रेजी अनुवाद की प्रति पकड़ाई थी और कहा था कि वह वृंदावन जाने के लिए प्रतीक्षारत है। उस दिन अपने आप को पहली बार गीता न पढ़ी होने के लिए धिक्कारा था।

उसके बाद घर आ कर कितनी बार नियम बनाने का प्रयत्न किया कि नित्य एक श्लोक पढ़ने से तो आरम्भ करें पर हुआ ही नहीं। बस एक इंग्लिश अनुवाद वाली और एक गीता प्रेस की छोटी गुटका living room में रखी रहती थीं। उसे पूजा के समय नित्य पढ़ने का प्रयास किया, ‘कॉफ़ी टेबल बुक’ की तरह पढ़ने का प्रयास किया, ऑफिस आते-जाते पढ़ने का नियम बनाने का प्रयास किया पर प्रथम अध्याय के 8-10 श्लोकों से आगे किसी अवस्था में आगे नहीं बढ़ पाई। फिर सोचा पहले अच्छे से संस्कृत का पुनरावर्तन (revision) कर लूँ फिर गति से और सरलता से पढ़ ली जाएगी। पुस्तक से स्वयं पढ़ना आरम्भ किया क्योंकि लगता था दसवीं तक पढ़ी है तो उतना तक पहुँचे आगे की पास की एक वेद शाला में पढ़ लेंगे (पुणे में घर के पास मठ है वहाँ वेद शाला चलती है)। स्कूल वाला पुनरावर्तन भी न हो पाया, वेद शाला तो क्या ही जाते। इन सब में कुछ दो साल निकल गये।

पिछले वर्ष मैं गुरकुल में अंतः वासी बनने के बाद से चौथा गेयर लग गया! प्रतिदिन पहले शिक्षा सत्र में बच्चे गीता के दो अध्याय अवश्य पढ़ते हैं और एक संध्या समय। जिस समय मैं आयी तो तीसरा और पंद्रहवाँ प्रातः और पहला अध्याय संध्या समय चल रहा था। इतनी संस्कृत तो पढ़नी आती थी कि क्या लिखा है पढ़ लेते थे और बच्चों के साथ साथ गुरूमाँ से सुनकर उच्चारण की अशुद्धियाँ भी ठीक कर लीं। आते जाते गुरु जी कुछ त्रुटि ठीक कराते रहते थे। एक मास में बच्चों को तो तीनों पाठ कंठस्थ हो गए और मुझे त्रुटि रहित पढ़ने का अभ्यास हो गया। मोबाइल से अधिक गीता कहाँ रखी है इसका ध्यान होता था (सबकी अपनी अपनी प्रति है यहाँ)। अनुभव तो कर लिया पर एक बार किसी अतिथि से गुरुमाँ को कहते सुना तो आभास हुआ की गीता तो गुरुकुल में एक विषय है, नियम से नित्य व पूरी गंभीरता से पढ़ा जाने वाला और जीवन शैली भी।

गुरु माँ को 13 वर्ष की आयु से पूरी गीता कंठस्थ है। किसी भी अध्याय से कोई भी श्लोक, उसका कोई भी पद (एक अनुष्टुप छंद श्लोक में चार पद होते हैं) कभी भी पूछ लीजिये। उससे भी अधिक उसका दिनचर्या में कभी भी प्रयोग दृष्टांत के रूप में, कभी बच्चों से उनकी स्मृति परखने के बहाने, जो बच्चों ने याद कर लिया है उसमें से, कुछ भी पूछ लेना – बहुत सहजता से आता है उनके व्यक्तित्व में। उन्हें याद कराने के लिए तरह तरह से श्लोकों को लिखने का ग्रह कार्य मिलता है, जैसे प्रत्येक अध्याय का तीसरा श्लोक लिखो। मैंने भी बच्चों के साथ ऐसा करना आरम्भ कर दिया। फिर कभी शाम को हमने गाँव वाली गीता सुनी। गाँव की गुजराती में सुनाई गीता (कुछ ही श्लोक) सुनकर, उसकी शैली और शब्द चुनाव से हँस हँस के पेट में दर्द हो गया। सच में ROFL, साँस अटकने तक हँसे थे। संजय – हनजड़ेया, धृतराष्ट्र – धरतड़या और कृष्ण – कनहड़िया थे उसमें। ये भी गुरुमाँ ने सुनाया और कुछ महीनों में जैसे जैसे समय मिला उन्होंने गीता के प्रत्येक श्लोक पर एक गुजराती गीत लिखा, बात करते करते लिखती रहती थीं वो! 700 श्लोक हैं गीता में!

गुरुजी तो गीता-दर्शन के विशारद हैं। यहाँ उनसे गीता पढ़ने कितने लोग आते हैं, सभी वर्गों से। कई जैन गुरु मुनि आदि भी आते हैं उनसे गीता व दर्शन के विशेष प्रश्नों के लिए। तब मैंने जाना कि कितने लोग कितने स्तर पर गीता को अपने जीवन से जोड़ने के लिए प्रयासरत हैं। गीता के लिए क्या-2 करते हैं। अविश्वसनीय सा था।

अब गीता नित्य जीवन में है। प्रतिदिन एक अध्याय का सस्वर वाचन करना अत्यंत सहज है अब। कितने वर्तन पूरे हो चुकें हैं एक साल में। बच्चों के साथ बदल बदलकर नित्य के तीन अध्याय पढ़ते हुए; उच्चारण की अशुद्धि सुधारते हुए; कभी शब्दों से, कभी अंतः प्रेरणा से, कभी अनुभव कर, कभी गुरुजी को सुनकर श्लोकों को समझते हुए, कब भगवद्गीता जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई है, पता नहीं चला।

पहला पड़ाव

पिछले वर्ष गीता जयंती पर युवाओं (कॉलेज के बच्चों) के लिए आयोजित गीता निबंध प्रतियोगिता के आयोजको में सम्मिलित हुई तो वो भी अविश्वसनीय सा ही था कि एक वर्ष पहले तक गीता जयंती का ही पता नहीं था और अगले वर्ष में गीता निबंध प्रतियोगिता के निबंध जांच रही थी। 800-900 निबंध आये थे और मुझे इंग्लिश के और कुछ हिंदी के निबंध जांचने थे। संस्कृत में केवल एक निबंध आया था। बच्चे अंक तालिका बनाते थे। गुजराती निबंधों की वर्तनी त्रुटि और व्याकरण त्रुटि पर दबे दबे हँसते थे कि कॉलेज के भैया-दीदी इतनी ग़लतियाँ करते हैं। पहली परीक्षा थी मेरी, गुरुजी से मैंने कहा कि मुझे तो गीता का कुछ ज्ञान नहीं है, मैं कैसे जाँच सकूँगी? वे बोले थे- “मुझे पता है आपको सही संदेश ही समझेंगे, गीता को समझने के लिए उसके एक एक श्लोक का ज्ञात होना आवश्यक नहीं है।” तार्किक बुद्धि से सोचें तो ऐसे में मुझे अहंकार आना चाहिए था, पर नहीं आया, कृतज्ञता का भाव आया। ये मेरे लिए विलक्षण अनुभव था। आत्म शुद्धि आरम्भ हो गयी थी, भगवद्गीता के कारण!

हर वर्ष यह प्रतियोगिता आयोजित करना गुरुकुल की एक परंपरा सी है। युवा गीता पढ़ें, गीता से जुड़ें इसलिए आयोजित करी जाती है। इसी बहाने हाथ में तो उठाएंगे, कुछ पृष्ठ तो पलटेंगे। 900 में से 10 तो गीता को लेकर जिज्ञासु बनेंगे। निष्काम कर्म का बहुत ही सुंदर प्रत्यक्ष उदाहरण देखा। और बच्चों ने जो लिखा था वो एक अलग ही लघु यात्रा थी, विषय था – ‘अपने अपने जीवन में गीता के कौन से संदेश, उसके किन सिद्धान्तों का पालन उन्हें सफलता दिलाएगा और कैसे’। मेरा उन सब में से प्रिय वाक्य था – “गीता मा तो बद्धू खुल्लु छे!”-गीता में तो सब कुछ खुला है :)। उस किशोरी के कहने का अर्थ था कि सभी रहस्य ईश्वर ने सरलता से उजागर कर दिए हैं गीता में।

(बड़े गुरुजी पंडित विश्वनाथ दातार शास्त्री जी ने गुरुजी मेहुलभाई आचार्य को भी गीता निबंध प्रतियोगिता द्वारा ही प्राप्त किया था। उस समय डाक से भेजे गए उनके निबंध को पढ़कर फ़ोन कर बड़े गुरुजी ने गुरुजी के पिताजी से उन्हें लेकर वाराणसी आने को कहा था और उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया था। कोई निवेदन नहीं, कोई एडमिशन की प्रक्रिया नहीं, कोई बैकग्राउंड चेक नहीं, कोई आधुनिक स्कूलों के प्रपंच नहीं! बड़े गुरुजी के बाद मेहुलभाई आचार्य अब गुरुकुल के मुख्य आचार्य हैं, विषय विशारद है। गीता, आयुर्वेद, दर्शन के सभी मुख्य ग्रंथ, उपनिषद आदि उन्हें कंठस्थ हैं और सही समय और अवसर पर उसका उपयोग उद्धरण बहुत ही सहज है उनके लिए। केवल कंठस्थ ही नहीं, आत्मसात हैं ,उसमें से सब कुछ प्रत्येक बिंदु वह समझा सकते हैं फिर भी बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं। गुरुकुल में (दो तीन स्थानों में विभक्त) 30,000 पुस्तकें/ग्रंथ शोध पत्रादि हैं। )

दूसरा पड़ाव

चार महीने पहले, अचेत अम्मा को उनके अंतिम क्षणों में पंद्रहवाँ अध्याय जब पढ़ कर सुना रही थी तो वह सुन रही थीं। ICU में तीन पेशेंट चिंताजनक स्थिति में थे परंतु डॉक्टर ने अंदर रहकर अम्मा को गीता सुनाने की अनुमति दे दी थी। अम्मा के साथ साथ वो तीनों भी पूरी सभानता से सुन रहे थे। सभी नर्सिंग स्टाफ भी काम करते हुये सुन रहा था, दोनों सीनियर डॉक्टर भी। दूसरी बार बिना एक-एक श्लोक का अर्थ जाने अनुभव हुआ कर्मयोगी की परिभाषा का। अम्मा के साथ वाले बेड पर से मुझे निर्निमेष देखती और सुनती एक युवती के आर्त भाव से रहित उसकी विवश स्थिति में श्रवण क्षमता का – जैसे गुडाकेश की रही होगी कदाचित! और अम्मा के जीवन भर के सकाम और निष्काम कर्म का आभास और उसके अंतर का विवेक अपने आप प्रकट हुआ मन में। उस दिन तीन जीवों ने ICU में देह छोड़ा था। अम्मा की स्मृति के साथ एक श्लोक अब अंकित है मानस पटल पर:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

गीता कंठस्थ अभी भी नहीं है क्योंकि स्मृति की दृढ़ता बहुत क्षीर्ण है, उसका पिछले बीस साल में बहुत ह्रास किया है। जीवन शैली, दूषित भोजन, दवाओं का प्रयोग, रोग, बहुत सारे कारण हैं। श्लोकों का शब्दार्थ से भावार्थ व अंत में निहित अर्थ और उसकी आत्मिक धारणा अभी तक पूरी नहीं है, बल्कि लगता है अभी भी शून्य ही है। किन्तु गीता की पूर्ण अनुपस्थिति से सदैव उपस्थिति में ये स्थानांतरण कैसे हुआ, सच में पता नहीं चला। और यात्रा….जारी है।

अट्ठारह पुराण – उनके नाम

अट्ठारह पुराणों के नाम कैसे याद करें?

हमारे अट्ठारह पुराण मुख्य हैं, जो हमारे इतिहास की श्रेणी में आते हैं (रामायण व महाभारत हमारे अन्य दो मुख्य ऐतिहासिक ग्रंथ हैं)।

यदि उनके नामों को जानकर ही अपने इतिहास की जानकारी को आरंभ करना चाहें और विशेषकर बच्चों को बताना चाहें तो सबसे बड़ी कठिनाई उनके नाम याद करने या रखने में आती है। अट्ठारह नाम रटने का बड़ा प्रयत्न करते हैं, पर फिर भी कोई न कोई भूल ही जाते हैं।

इन्हें सूत्र रूप में याद रखना बड़ा ही सरल है इस अनुष्टुप छंद के माध्यम से:

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।

अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्

इसे गाकर याद करेंगे तो और भी सरल होगा। गीता के (अधिकतर) श्लोकों की गायन शैली में ही इन्हें भी गाया जाता है।

मद्वयं अर्थात् दो म (से) १. मत्स्य पुराण २. मार्कण्डेय पुराण

भद्वयं अर्थात् दो भ (से) ३. भागवत् पुराण ४. भविष्य पुराण

ब्रत्रयं अर्थात् तीन ब्र (से) ५. ब्रह्म पुराण ६. ब्रह्माण्ड पुराण ७. ब्रह्मवैवर्त पुराण

वचतुष्टयम् अर्थात् चार व (से) ८. विष्णु पुराण ९. वराह पुराण १०. वामन पुराण ११. वायु पुराण (जो विष्णुपुराण के अनुसार शैव पुराण है)

से एक १२. अग्नि पुराण

ना से एक १३. नारद पुराण

से एक १४. पद्म पुराण

लिं से एक १५. लिङ्ग पुराण

से एक १६. गरुड़ पुराण

कू से एक १७. कूर्म पुराण

स्क से एक १८. स्कन्द पुराण

और अंत में इन पुराणों के सार स्वरूप ये सुभाषित है:

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी — पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

तो यदि न किया हो तो स्वयं भी याद करें और बच्चों को भी याद कराएँ। प्रतिदिन एक काम ऐसा करें जो आपके बच्चों को, चाहे वो किसी भी आयु के हों, आपके इतिहास व संस्कृति से अवगत कराए और उनके निकट ले जाए। जिस भारत को इतने गर्व से Indic civilisation कहते हैं, उसके इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम से इतर और उससे पहले बहुत बहुत कुछ है और सही अर्थ में वही हमारे भविष्य की सफलता की कुंजी है।

यात्रा जारी है….

मुराहू पण्डित का गंगा स्नान

मुराहू जी की जीवनचर्या से प्रतिचित्रण (map) कर यहाँ ये बताने का प्रयास है कि जो कुछ हम भारतीय ग्रंथों-शास्त्रों में पढ़ते हैं वह पूर्णतया प्रायोगिक है, समकालीन-अद्यतन है और उसे अपने जीवन में उतारकर कैसे व्यक्ति सुखी और स्वस्थ रह सकता है।

अभी कुछ दिन पहले @GYANDUTT ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने मुराहू पण्डित से एक लघु भेंट का ट्वीट किया। रोचक लगा! पाण्डेय जी से निवेदन किया कि उनकी जीवन व दिनचर्या की कुछ और जानकारी बटोरें। आदरणीय पाण्डेय जी ने ऐसा शीघ्र किया। उन्हें बहुत धन्यवाद! उन्होंने podcast और blog दोनों में उनसे दीर्घ जीवन के सूत्रों पर हुई चर्चा को सबसे साझा किया।

https://gyandutt.com/2021/06/18/murahu-pandit-and-longevity/ 

ये कौतूहल क्यों जागा? मैं प्रायः आयुर्वेद भारतीय शास्त्रीय जीवन, ज्ञान व दृष्टिकोण के बारे में ट्वीट करती हूँ। वो सब, जो अपने परिवर्तित जीवन मैं गुरु सानिध्य में ज्ञान पाकर, अनुभव से और प्रत्यक्ष प्रमाण से जी रही हूँ और साझा करती हूँ, उस पर, शायद उसे एक अच्छी ट्वीट/quote आदि से अधिक कुछ न समझ कर, पढ़ने/सुनने वाले विश्वास नहीं करते। और करते भी हों तो उसमें प्रस्तुत शास्त्रीय ज्ञान को अपने जीवन में उतारते हों, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। It is just good reading material ! आत्ममुग्धता के इस सामाजिक काल में, कोई निरपेक्ष होकर या तटस्थ होकर, गुरु प्राप्त व मनन किया ज्ञान, शिक्षा या जानकारी साझा करे तो उस पर विश्वास कम होता है। मुझे तो अहंकारी, opinionated, higher mortal आदि की उपाधियाँ भी मिलती रहती हैं। 

तो मुराहू उपाध्याय जी के उस संक्षित उल्लेख से भी मुझे समझ आ गया कि ये पथ्यापथ्य व आहार-विहार के सरल सिद्धातों का पालन करने वाले शुद्ध भारतीय हैं जिन तक आधुनिकता के साधनों और जीवन के नाम पर प्रचलित आलस्य, दूषण और वैचारिक भ्रष्टाचार नहीं पहुँचा है। मुराहू जी की जीवनचर्या से प्रतिचित्रण (map) कर यहाँ ये बताने का प्रयास है कि जो कुछ हम भारतीय ग्रंथों-शास्त्रों में पढ़ते हैं वह पूर्णतया प्रायोगिक है, समकालीन-अद्यतन है और उसे अपने जीवन में उतारकर कैसे व्यक्ति सुखी और स्वस्थ रह सकता है, वृद्धावस्था में भी! आधुनिक अध्ययन की तरह कुछ भी केवल जानकारी के लिए शास्त्रादि में नहीं बताया जाता है, उसे जीवन में उतारकर सीधे सीधे उससे स्वास्थ्य और आयु लाभ लिया जाता है। तो प्रस्तुत है मुराहू उपाध्याय का शास्त्रीय चित्रण:

अपनी वाणी से ही पुराहू जी बताते हैं की वह – 23 साल से रिटायर्ड हैं, सात विषय से M.A.हैं, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं, DM की बैठक में बैठते हैं और आयुर्वेदाचार्य, योगाचार्य हैं। उनके आधुनिक शिक्षा प्रणाली से प्राप्त प्रमाणपत्र तो आपको मिलेंगे, परंतु उनके आयुर्वेदाचार्य होने के नहीं। क्योंकि, उन्होंने आयुष मंत्रालय के बहुत ही उथले BAMS से नहीं अपितु किसी योग्य वैद्य अथवा गुरु से यह शिक्षा ली है, ऐसा उनके व्यक्तित्व, ज्ञान और शब्दों से प्रतीत होता है।

दुःखं समग्रं आयातं अविज्ञाने द्वयाश्रये। सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम्।। (भाव प्रकाश)

इसका अर्थ है – सारे दुख का कारण अवैज्ञानिकता का आश्रय है और सभी सुखों का कारण है विमल विज्ञान में प्रतिष्ठा। 

मुराहू पंडित का विमल विज्ञान में अपने विश्वास को प्रतिष्ठित करने का कितना सुखी परिणाम है। उनको, जो 87 वर्ष की आयु में भी 50 वालों को पानी पिला दें। वैसे भावमिश्र लिखित भाव प्रकाश का ये श्लोक आयुर्वेद का सिद्धांत कहा जाता है। और कितने की जन, विशेषकर अलोपथी डॉक्टर, आयुर्वेद को घरेलू नुस्खे और नीम-हकीमी, आधुनिक समय में प्रयोग की अनुपस्थिति आदि कह कर अपने ही अवैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। 

मुराहू जी अपने दीर्घ जीवन का सूत्र बताते हैं – भोजन कम करना, परिश्रम, व्यायाम, नियमित दिनचर्या और तनावमुक्त जीवन जीना। प्रतिदिन प्रातः साईकल से 7 किलोमीटर दूर गंगा स्नान को जाते हैं और सात किलोमीटर लौटते हैं। 

यहाँ मुराहू पण्डित आयुर्वेद के कई मुख्य/विशेष सूत्रों का क्या ही अच्छा अनुसरण करते दिखते हैं:

ब्रह्मुहूर्त जागरण: ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेत्स्वस्थो रक्षार्थमायुष:। – ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला स्वस्थ होता है, उसकी आयु की रक्षा होती है अर्थात वह दीर्घायु होता है।

गंगा स्नान: गंगाजल की महत्ता और विशेषता से अधिकतर जन परिचित हैं। एक सुभाषित इस प्रकार कहता हैं:

असारे खलु संसारे सारमेतत् चतुष्टयम्। काश्यां वासः सतांसंगः गंगास्नानं शिवार्चनम्।। – असार से इस पूरे संसार का सार इन चारों में हैं – काशी में वास, सज्जन लोगों का संग, गंगा स्नान और शिव की अर्चना!

और स्नान के योग्य स्थान के लिए मनुस्मृति बताती है: 

नदीषु देवस्थानेषु तडागेषु सर: सु च। स्नानं समाचरेनित्यं गर्त प्रस्रवणेषु च।

नदी, देवता का स्थान (तीर्थ), तालाब, सर: सु अर्थात नदी के समान जल प्रवाह, झरना, इनमें नित्य स्नान करना चाहिए। 

मुराहू जी नित्य स्नान करते हैं, गंगाजल से करते हैं और नदी पर जा कर करते हैं। सभी दिनचर्या के बताए गए आदर्शों का पालन कितनी सरलता से करते हैं और नियमित हैं। 

दिनचर्या

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी उन्हें अपने घर में अरहर के डंठल के बण्डल से झाड़ू लगाते देख उनकी ऊर्जा और जवानी (वस्तुतः उत्तम स्वास्थ्य) के कायल हो गए थे। अट्ठासी की उम्र में फिट – ऐसा स्वास्थ्य कौन नहीं चाहेगा?

अब देखिए:

समः दोष समाग्निच समधातु मलक्रिय:  प्रसन्नात्मेंद्रियमना: स्वस्थ इत्यामिधियते।। (सुश्रुत स. 15|41) 

दोषों की समता (वात, पित्त और कफ,शरीर में ये तीन दोष होते हैं), समस्त तेरह अग्नियों का समान रहना (पञ्चमहाभूताग्नि + रस रक्तादि सप्त धातु अग्नि + जठराग्नि) तथा रस रक्तादि धातुओं और विण्मूत्रस्वेदादि मलों का पोषण, धारण और निर्गमन आदि क्रियाओं का समान होना एवं आत्मा, इन्द्रिय और मन की प्रसन्नता जिसमें विद्यमान हों, उसे स्वस्थ कहा जाता है। 

मुराहू पण्डित गंगास्नान से लौटते समय गंगाजल का जरीकेन साईकल पर लटकाए लौटते हैं। रास्ते में जो भी मिलता है उसे गंगाजल का प्रसाद देते चलते हैं। रास्ते में कोई रोग ग्रस्त या अस्वस्थ व्यक्ति मिलता है तो उसे प्राकृतिक, सुलभ औषधि भी देते/बताते चलते हैं (podcast में उन्होंने रास्ते में एक महिला को अल्सर की औषधि देने की बात बताई) और कुछ दिन बीते हाल-चाल भी पूछते हैं कि व्यक्ति ठीक हुआ के नहीं!

नित्यं हिताहार विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेश्वसक्तः। दाता समः सत्यपर: क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः।।   

यही शास्त्रीय या आयुर्वेद वर्णित स्वस्थता मुराहू पण्डित में विद्यमान है। जो दीर्घ जीवन के सूत्र मुराहू जी ने बताए, वो आयुर्वेद के ग्रंथों में वस्तुतः स्वस्थ रहने की मैनुअल के रूप में वर्णित हैं!

दिनचर्यां निशाचर्यां ऋतुचर्यां यथोदितम्। आचारान् पुरुषः स्वस्थ: सदा तिष्ठति नान्यथा।। (भाव प्र. 5|13)

स्वस्थ व्यक्ति दिनचर्या रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या का उसी प्रकार पालन करें जिस प्रकार शास्त्रों में वर्णित किया गया है। इसका आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रहता है, उसके विपरीत आचरण करने से रोग से ग्रस्त हो जाता है। 

दिने, दिने चर्या, दिनस्य वा चर्या। दिनचर्या चरणम् चर्या। 

उभयलोकहितमाहारविहारचेष्टितामिति यावत् प्रतिदिने यतकर्तव्यम्। (अष्टांग ह. सू 2|1) – चर्या का अर्थ है चरण (आचरण), प्रतिदिन करने योग्य, प्रतिदिने की चर्या का नाम दिनचर्या है। 

निशि स्वस्थ मनास्तिष्ठेन्मौनी दण्डी सहायवान्। एवं दिनानि मे यान्तु चिंतयेदिति सर्वदा। – रात्रि चर्या में शयन से पूर्व, ,मन को सभी चिंताओं से दूर रखते हुए स्वस्थ पुरुष (व्यक्ति) मौन धारण कर धर्म चिंतन करते हुए ध्यान करें कि शेष दिन भी इसी प्रकार सुखपूर्वक व्यतीत हों। 

उत्थायोत्थाय सततं स्वस्थेनारोग्यमिच्छिता। धीमता यदनुष्ठेयं तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यते।। (सु. चि. 23|3)

आरोग्य की कामना करने वाले धीमान् पुरुष (व्यक्ति) को दिनचर्या में वर्णित कार्यों को प्रतिदिन करना चाहिए।  

दिनचर्या में आने वाने कर्तव्य (कार्य जो नियमित रूप से करने चाहियें):

  1. ब्रह्मुहूर्त जागरण – सूर्योदय से 2 घड़ी पहले उठना। निष्कर्ष- सूर्योदय से पहले उठना।
  2. उषापान: सूर्योदय से पहले खाली पेट पानी पीना। ये पानी तब पीना जब पिछली रात्रि हल्का सात्विक खाना खाने के तीन घंटे बाद सोएँ हों।
  3. मलत्याग – पेट साफ करना
  4. आचमन : मुख प्रक्षालन, कुल्ला करना
  5. दंत धावन – दाँत साफ करना
  6. जिह्वनिर्लेखन – जीभ साफ करना
  7. मुख व नेत्र प्रक्षालन – आँखें और मुँह धोना
  8. अञ्जन कर्म – आँखों में अञ्जन
  9. नस्य कर्म: नाक में नस्य डालना/ नाक की सफाई करना
  10. कवल-गणडूष – औषधियुक्त द्रव्य से कुल्ला करना
  11. धूमपान – धूप के धुएँ का सेवन करना (सिगरेट पीना नहीं)
  12. ताम्बूल सेवन – नागरवेल के पत्ते पर औषधि के कुछ घटक डालकर पान खाना (तंबाकू वाला/ लज़ीज़ पान नहीं)
  13. अभ्यंग – तेल मालिश
  14. व्यायाम – अर्ध शक्ति व्यायाम करना। अति व्यायाम न करना
  15. उद्वर्तन – उबटन लगाना, कड़वे आदि रसयुक्त द्रव्यों के चूर्ण को शरीर पर रगड़ना
  16. स्नान – ऊपर से नीचे की ओर पानी डालकर नहाना (पहले सिर, फिर कंधे, अंत में पाँव, यथा)। सिर गरम पानी से न धोना और ज्वर एवं ऋतुचर्या (menstruation) में स्नान न करना।
  17. अनुलेपन – औषधीय द्रव्यों के चूर्ण का लेपन अर्थात आयुर्वेदिक पाउडर लगाना 🙂
  18. वस्त्रधारण – ऋतु के अनुकूल और स्वच्छ (नित्य धुले हुए) वस्त्र पहनना

नित्य 14 किलोमीटर साईकल चलाना (7 किलोमीटर के बाद अंतराल लेकर)- व्यायाम:मुराहू पण्डित की दिनचर्या का एक अभिन्न अंग हैं नित्य 14 किलोमीटर साईकल चलाना। आदर्श व्यायाम करते हैं उपाध्याय जी! सुश्रुत का कथन का अनुसरण करते दिखते हैं वह, बलार्द्ध तक व्यायाम करते हैं। व्यायाम के लिए बताया गया है : बलस्यार्धेन कर्तव्यो व्यायामो हंत्यतोSन्यथ। (सु. चि. 24|27)

हित चाहने वाले स्वस्थ व्यक्तियों को सभी ऋतुओं में व्यायाम अर्धशक्ति (बलार्द्ध तक) करने का निर्देश मिलता है। व्यायाम करते हुए मनुष्य के हृदय में स्थित वायु जब मुख में आने लगे, यह बलार्द्ध समझना चाहिए। सुश्रुत के अनुसार इसके लक्षण हैं माथे पर, नासिक छिद्र में, शरीर संधि (जोड़ों), हाथों पैरों के जोड़ों, बगल आदि स्थानों में पसीना आने लगे, मुख सूख जाए, ये सभी अर्ध शक्ति के लक्षण हैं। अति व्यायाम करने से अनेक दोष व रोग उत्पन्न होते हैं। 

साईकल चलाना, दौड़ने और gymming से कहीं अच्छा व्यायाम है।चक्रमण (घूमना) श्रेष्ठ व्यायाम है, कुछ योगासनों के साथ। आजकल cardio और weight training का जो चलन है और जिसे स्वास्थ्य बनाने की निशानी माना जाता है, आयुर्वेद की दृष्टि से अति व्यायाम की श्रेणी में आता है क्योंकि इसमें अर्ध-शक्ति या बलार्द्ध के लक्षण आने पर रुकने की बजाए, इनके अति होने तक यंत्र देखकर और समय देखकर व्यायाम किया जाता है।

कम खाना अर्थात सम्यक आहार: मुराहू पण्डित भोजन कम करने को दीर्घ जीवन का सूत्र बताते हैं। कहते हैं महीने में एक बार उपवास करिए। शर्बत, मट्ठा पीजिये, टेंशन मत रखिये।

कलियुग के वैद्य कहे जाने वाले वाग्भट्ट का भगवान धन्वंतरि को दिया गया यह उत्तर, सम्यक आहार का कुंजी सूत्र है – ‘हित भुक् मित भुक् अशाक् भुक्’ – अपने हित के लिए खाने वाला अर्थात जीभ के स्वाद के लिए नहीं शरीर की आवश्यकता और अवस्था के अनुसार खाने वाला, कम अर्थात सम्यक अथवा सही मात्रा में खाने वाला और बिना (कम) सब्जी खाने वाला अर्थात अन्न/कड़धान्य खाने वाला (निरोगी है)।

चरक आहार के हितकारी या अहितकारी होने के कारण इन आठ विधानों में बताते हैं:

तत्र खलविमान्यष्टाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति: तद्यथा – प्रकृतिकरणसंयोगराशिदेश कालोपयोग संस्थोपयोक्त्रष्टमानि। (च. वि. 1|2)

यहाँ वर्णित आठ विधान, आहार के हित या अहित होने के कारण बताते हैं। इन विधानों को सम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को लाभ मिलता है, वहीं असम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को हानि होती हैं। ये इस प्रकार हैं – प्रकृति (स्वभाव) ; करण (संस्कार); संयोग (जल सन्निकर्ष, अग्नि संयोग); राशि (मात्रा); देश; काल; उपयोक्त, उपयोग संस्था (rules of food consumption/dietetic rules)।

मुराहू पण्डित की 87 वर्ष की आयु, स्वस्थ शरीर, शिक्षित, सम्मानित, प्रसन्नचित्त, उदार, परोपकारी, निश्चिन्त, आर्थिक रूप से सुरक्षित, चिंतामुक्त नियमित जीवन – सब कुछ इस बात का सूचक है द्योतक है कि हमारे शास्त्रों में बताए गए सिद्धांत, निर्देश, युक्तियाँ और नियम, सभी अति सरलता से आचरण का भाग बनते हैं। कोई कठिन परिश्रम नहीं करना पड़ता। यही असाधारण साधारणता आदर्श भारतीय का लक्षण है। यह केवल मुराहू पण्डित द्वारा ही नहीं, हम सबके द्वारा प्राप्य है, achievable है। जैसे ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं – “आदर्श ढूंढने के लिए न तो कहीं दूर जाना होता है, न ही अति विशिष्ट कठिन तप करते व्यक्ति से कुछ करना होता है। अपने आस पास, गाँव देहात में आदर्श जीवन जीते अनेक व्यक्ति मिल जाते हैं।” भारतीयता उनमें ही जीवित है। शहर का भारतीय अब इंडियन हो गया है। प्रार्थना व निवेदन है कि पुनः भारतीय बनें।

मुराहू पण्डित सद्वृत्त में अर्थात satvik health circle में रहते हैं। सद्वृत्त आयुर्वेद का उत्कृष्ट विचार है। 

सतां सज्जनानां वृत्त व्यवहारजातं सदवृत्तम्। (च.सू. 8|17) – सदा सज्जनों के आचरणों का पालन करना, उनके बीच रहना ही सद्वृत्त है। 

सद्वृत्त पालन करने से मानसिक रोगों से बचा जाता है। सोशल मीडिया, आधुनिक धारावाहिक (हिंदी/अंग्रेजी), पिक्चर इन सभी को दुर्जनों की श्रेणी में रखा जा सकता है। 

आर्द्रसंतानता त्याग: कायवाक्चेतसां दम:। स्वार्थबुद्धि परार्थेषु पर्याप्तं इति सद्वृतम्।।

(अ.हृ.सू.2|46)

सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना (सुपात्र को), शरीर मन वाणी पर नियंत्रण रखना तथा दूसरे के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना (उन्हें अपने जैसा ही समझना) ही सद्वृत्त है।

मुराहू पण्डित को प्रणाम!

यात्रा जारी है……

विश्वगुरु राष्ट्र के नागरिकों का स्तर

किसी भी देश के उन्नत होने के, परिपक्व होने के और विश्व गुरु होने के लक्षणों में मुख्य है उसके नागरिकों की मानसिक दशा व बौद्धिक स्तर! भारत की क्या स्थिति थी? अभी क्या है?

बौद्धिक नागरिक किसी भी देश अथवा राज्य की सर्वाधिक मूल्यवान पूँजी होते हैं। केवल एक बौद्धिक वर्ग (think tank) नहीं, अपितु सभी गण\लोग जिन्हें हम ‘साधारण जन’ कहते हैं, उनकी बुद्धि का स्तर, विवेक और संतोष जब ऐसा हो कि वह जीवन दर्शन को जीते हुए निर्भीकता से राजा(सर्वोच्च पदाधिकारी) की त्रुटियों को भी इंगित कर सकें – ऐसी स्थिति, ऐसा वातावरण दर्शाता है कि एक राष्ट्र कितना सम्पन्न है,उन्नत है, विश्व गुरु है। 

ये विचार उस समय आया जब गुरुजी संस्कृत संभाषण का एक सत्र ले रहे थे। उस सत्र में उन्होंने राजा भोज की कथाओं से क्रिया का एक दृष्टांत प्रस्तुत किया। प्रायः हम राजा भोज की कथाएँ आनंद के लिए व उनके नैतिक संदेशों के कारण सुनते-सुनाते हैं। उनके राज्य की प्रजा कितनी विद्वान थी अथवा प्रजा के भाषाई बौद्धिक स्तर के बारे में कम ही चर्चा होती है।

  1. प्रजा प्रास अलंकार में बात करती है। राजा के समक्ष निर्भीकता से अपने विचार प्रकट करती है। अपने जीवन के नित्य कार्यों को संघर्ष न समझते हुए न तो अति संवेदनशील हैं, न दुखी है, न ही शारीरिक श्रम को कष्ट की संज्ञा देती हैं, अतः संतोष से जीवन-यापन करती है। इस प्रसंग से समझते हैं:

 राजा भोज ने देखा एक क्षीण सा व्यक्ति अपनी सर पर बड़ा सा और भारी गट्ठर रखे मंथर गति से जा रहा है। राजा ने संस्कृत में पूछा – “भारं न बाधति?” (भार बाधा नहीं दे रहा/नहीं लग रहा?) उस व्यक्ति ने संस्कृत में उत्तर दिया – “ भारं न बाधते राजन् यथा ‘बाधति’ बाधते।” (राजन, भार इतनी बाधा नहीं दे रहा जितना आपका ‘बाधते’ को ‘बाधति’कहना बाधा दे रहा है।)

इस प्रश्न में ‘बाध’ एक आत्मनेपदी* धातु है अतः उसका वर्तमान काल में प्रयोग करेंगे तो ‘बाधते’ कहा जाएगा। ‘बाधति’ कहने का अर्थ हुआ कि वक्ता उसे परस्मैपदी धातु समझ रहा है अतः वर्तमान काल में ‘अति’ प्रत्यय के साथ क्रियापद बना प्रयोग कर रहा है। 

*आत्मनेपदी वो धातु होती है जिसकी क्रिया का फल अपने को मिलता है और परस्मैपदी वो धातु होती है जिसकी क्रिया का फल दूसरे को मिलता है। यहाँ इस प्रश्न में उस भार की बाधा स्वयं उस व्यक्ति को मिल रही है अतः यहाँ आत्मनेपदी धातु के क्रियापद का प्रयोग होगा। 

राजा की इसी संस्कृत व्याकरण की त्रुटि को उस साधारण नागरिक ने इंगित किया। और साथ ही साथ अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करते हुए राजा को बड़ी सरलता से उत्तर दिया। अपने भार ढोने के काम से उसे कोई उलाहना नहीं थी, राजा के पूछने पर कुछ सहायता मिलने के अवसर का लाभ भी उसने कोई स्वार्थ व आलस्य जनित विचार कर नहीं लिया। प्रजा के संतोषजनक आदर्श जीवन-यापन का कितना सुंदर उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हुआ। 

  1. कवियों आदि द्वारा संस्कृत व संस्कृति प्रसार के लिए राजा भोज नाटकों का आयोजन करवाते थे। जिससे प्रजाजन सहजता से ही संस्कृत संभाषण और उसके साथ-साथ व्याकरण के नियम आदि भी सीख लेते थे। ऐसे ही एक बार वसंत ऋतु में नाटक हो रहा था। राजा भोज भी उस नाटक सभा में उपस्थित थे। वहाँ एक फटे-पुराने वस्त्र पहने, अति निर्धन दिखने वाला व्यक्ति भी नाटक देख रहा था।ठण्ड से बचने के लिए उसके पास कुछ नहीं था। उसे देख राजा को दया भी आयी और दुख भी हुआ तो उन्होंने उसकी सहायता करने के उद्देश्य से संवाद करना चाहा। राजा ने पूछा -“ शीतं कथं नीतम्?” (सर्दी कैसे जाती है/बीतती है?)

व्यक्ति ने उत्तर दिया – “रात्रौ जानु दिवा भानु कृशानु सन्ध्ययोर्भयो:। एवं शीतं मया नीतम् जानु भानु कृशानुभि:।।”  (रात में घुटने, दिन में सूर्य और दोनों संध्या समय अग्नि। ऐसे घुटनों, सूर्य और अग्नि से मेरी सर्दी बीतती है।)

यानी रात में घुटनों को छाती तक समेट कर गुमड़ी मार कर सो जाता हूँ, दिन में सूर्य की गर्मी से रक्षा होती है और दोनों संध्या काल अर्थात सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद, जिस समय सो नहीं रहे होते और सूर्य भी नहीं होता, तब आग/अलाव जलाकर सर्दी के दिन व्यतीत करता हूँ। ऐसा उस फटे कपड़े पहने व्यक्ति ने राजा को बताया।

एक प्रश्न के उत्तर में तुरंत एक अनुष्टुप छंद की रचना करी (अलंकार आप पहचानिये) और कितने संतोषजनक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए बताया की कोई कष्ट नहीं है, और ये उपाय करके उसकी शीत ऋतु व्यतीत हो जाती है। वह व्यक्ति इतना सुंदर उत्तर देकर अपने संतोष की स्थिति का व कष्ट में न होने की मनःस्थिति का सूचन राजा को देता है। राजा को समक्ष देख, उसके सहायता करने के संकेत को समझकर भी उस निर्धन व्यक्ति ने राजा से कुछ नहीं माँगा। राजा ने अवश्य यह सुनने के उपरांत उसकी साधन/दृव्य से सहायता करी। 

कोई ‘sense of entitlement’ नहीं कि मैं आपकी प्रजा हूँ और मेरी रक्षा व लालन-पालन आपका कर्तव्य/धर्म है- ऐसा कोई उलाहना राजा को नहीं दिया। कोई अपेक्षा नहीं करी क्योंकि अपने जीवन-यापन का दायित्व हर व्यक्ति पर स्वयं होता है। राजा, राज्य व समाज की परिकल्पना/ रचना अवश्य सभी व्यक्तियों के जीवन को सरल बनाने के उद्देश्य से की गयी है। परंतु वैदिक व वैज्ञानिक सिद्धांतों से स्थापित करी गयी संस्कृति में पला-बढ़ा व्यक्ति इतना सक्षम, स्वावलंबी व संतोषी (content) होता है कि अपने जीवन की परिस्थितियों में व्यग्र व उद्विग्न नहीं होता  और अपनी सहायता के लिए औरों से अपेक्षा नहीं रखता, राजा से भी नहीं। बौद्धिक स्तर पर परिपक्व होता है। और बड़ी बड़ी साहित्य की डिग्री न होने पर भी भाषा व व्याकरण (वो भी संस्कृत!) पर उसका पांडित्य अच्छा होता है। 

एक निर्धन व्यक्ति की,एक अति साधारण काम करने वाले व्यक्ति की इस परिस्थिति की आज के समय के निर्धन या ‘शोषित’ व्यक्तियों की परिस्थिति से तुलना करिये। निर्धन व्यक्ति (below poverty line) की सहायता न करने पर सरकार को निकम्मा बताया जाता है। उस व्यक्ति/व्यक्तियों से अपने पुरुषार्थ द्वारा अपनी निर्धनता को दूर करने की अपेक्षा नहीं रखी जाती। एक तरह से उन्हें दया का पात्र बनाकर पहले तो उनके आत्मसम्मान को नीचे धकेलने में हम अपना योगदान देते हैं और दूसरा अकर्मठता को बढ़ावा देते हैं। 

जीविका उपार्जन और विद्या ग्रहण में योग्यता को ताक पर रखते हुए जातिगत व सम्प्रदायगत आरक्षण के अपना अधिकार मानते हैं। वर्ण व जाति प्रथा को discriminatory बताते हैं पर जीविका उपार्जन के विभिन्न कार्यों की जातियाँ बना रखी हैं। ये काम छोटा है, नीचा है -ये काम ऊँचा है, खेती करे तो बेचारा, मज़दूरी करे तो बेचारा और ऑफिस में बैठ कर काम करे तो अच्छा। धन के आधार पर परिवहन में, brandvalue के अस्तित्व के आधार पर class की रचना तो सामाजिक कार्यसमता व योग्यतासमता के लिए बनाई गयी जाति व्यवस्था से कहीं भिन्न है और वास्तव में अति तुच्छ है। यह वाला आधुनिक caste-system हम सब के अंतर्मन और मस्तिष्क में चिन्हित हो चुका है और हम सब वैसे ही व्यवहार करते हैं। 

राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने के लिए स्वावलंबी, योग्य व बुद्धि से परिपक्व नागरिक सबके आवश्यक घटक (component) है। 

राजा भोज की अति साधारण प्रजा के यह दृष्टांत, उस समय के राष्ट्र के उन्नत स्तर, व्यक्ति की मनः स्थिति व भाषा की संपन्नता को दर्शाते हैं। उस भारत को मेरा प्रणाम!  वैसी ही सशक्त प्रजा का पुनः निर्माण हो इसके लिए हम भारतीय जीवन शैली, दृष्टिकोण, सिद्धांतों, विचार, विद्या व शिक्षा पर पूर्ण रूप से वापस आएँ ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है !!

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते।।

चाणक्यनीतिदर्पण:

जीव स्वयं ही कर्म करता है, स्वयं ही उन कर्मों के फल सुख-दुख को भोगता है, जीवन स्वयं संसार में नाना योनियों में जन्म लेता है और स्वयं पुरुषार्थ करके संसारबन्धन से छूट कर मुक्त हो जाता है।

यात्रा जारी है….

अहिल्या की कथा और उसके सत्य के रूप!

प्राचीन अहल्या महर्षि गौतम की पत्नी थीं. इनके पिता का नाम वृद्धाश्व था। अहिल्या अत्यंत रूपवती थी। देवराज इंद्र ने गौतम का रूप धार का इनका धर्म नष्ट करना चाहा। गौतम के शाप से इंद्रा नपुंसक हो गए थे, परंतु देवताओं ने बड़े परिश्रम से मेष का पुरुषत्व ले कर इंद्रा को प्रदान किया, तभी से इंद्र का एक नाम मेशवृषण हुआ। गौतम ने अहिल्या को भी श्राप दिया। गौतम के श्राप से अहिल्या निराहार केवल वायु के आधार पर रहने लगी, सर्वदा वह पश्चात्ताप करती रहती थीं, उसका शरीर भस्म से पूर्ण था और वह समस्त प्राणियों से अदृश्य हो गयी।

 “वातभक्षा निराहारा, तपंती भस्मशायिनी। अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि।।” (रामायण)

पुनः अहल्या के प्रार्थना करने पर गौतम प्रसन्न होकर बोले, “हमारा शाप व्यर्थ नहीं हो सकता, किन्तु विष्णुरूपी रामचंद्र जब इस आश्रम में आवेंगे, तब तुम उनके चरण वंदन कर, मुक्त हो सकोगी।” विश्वामित्र के साथ जब रामचंद्र आये, तब उन लोगों ने भी अहल्या को तपस्विनी के रूप में देखा था। राम और लक्ष्मण दोनों भाइयों ने अहल्या को प्रणाम किया था और अहल्या ने भी अपने पति गौतम का वचन स्मरण कर के रामचंद्रजी का चरण वंदन किया।

“राघवौ तु तदा तस्या: पादौ जागृहतुर्मुदा। स्मरन्ती गौतमवच: प्रतिजग्राह सा हि ” (रामायण)

पद्मपुराण में लिखा है की गौतम के श्राप से अहल्या पत्थर हो गयी थीं और इंद्रा के शरीर में अनंत भाग के चिह्न हो गए थे। कुमारिल भट्ट के मत से अहल्या और इंद्रा विषयक उपाख्यान केवल रूपक हैं। अहल्या शब्द का अर्थ रात्रि हैं और इंद्र का अर्थ है सूर्य। दिन में सूर्योदय होने से रात्रि नष्ट होती है इसी घटना को ले कर उक्त उपाख्यान कल्पित हुआ है।

आज के समय में अधिकतर लोगों को जिस रूप में ये कथा या घटना ज्ञात है, वह अहल्या के पत्थर (एक वास्तविक पत्थर की शिला) होने की है। मेरी अपनी अनुभूति यह कहती है कि इसी तरह की क्षति पुराणों ने हमारे इतिहास को अनजाने में पहुँचाई है। अलंकारों व अतिशियोक्ति भरी भाषा का प्रयोग करके! पुराणों की रचना जनमानस तक ज्ञान को सुलभ रूप से पहुँचाने के लिए करी गयी थी, उसका अक्षरशः अर्थ बहुत हानि करता है।

आज जब information overload के समय में पुराण की कथा को केवल पढ़ा जाता है, उसके अर्थ, उसकी सत्यता को पूर्ण रूप से आत्मसात करने का अवकाश किसी के पास नहीं है, तो इतिहास का ऐसा ही हश्र होता है। इसका दोष क्या हम रोमिला थापर को दे सकते हैं ?

मेरी अनुभूति और समझ से अहल्या की कथा का पहला रूप या पक्ष :

जैसा की रामायण के श्लोकों से भी स्पस्ट है, अहल्या जड़ (पत्थर) नहीं हुयी थीं, वह केवल वायु के आधार पर रहने लगी थीं (पत्थर या खनिज की भाँति)। उनका शरीर भस्म से परिपूर्ण था और वह सदा पश्चाताप करती रहती थीं, तपस्विनी हो गयी थीं अर्थात संसार से पूर्णतया विमुख साधनावत् जीवन जीने लगी थीं। ये उस परिस्थिति में जब वह गौतम मुनि के गुरुकुल की गुरुमाँ थीं और उनके अचार्यपत्नी के रूप में कई दायित्व थे, जिन्हें प्रायः उन्होंने त्याग दिया था अतः वह उपस्थित सभी प्राणियों से अदृश्य हो गयी थीं। अथवा तप/योग की शक्ति से उन्होंने या गौतम मुनि ने उनके रूप का आभामंडल ऐसा कर दिया कि उनकी उपस्थिति की अनुभूति किसी को नहीं होती थी। राम-लक्ष्मण के आने पर उन्हें सुध आयी (क्योंकि वह ईश्वर का अवतार थे), गौतम मुनि आदि के साथ विमर्श हुआ और अहल्या पूर्ववत् हो गयीं।

मेरी अनुभूति और समझ से अहल्या की कथा का दूसरा पक्ष :

गौतम मुनि भारतीय न्याय शास्त्र के सर्जक हैं। वह चिंतन में इतने अधिक मग्न रहते थे कि चलते चलते गिर पड़ते थे। उनके शिष्यों की प्रार्थना पर महादेव शिव ने गौतम ऋषि के पैर में एक नेत्र दे दिया, जिसे अपने कार्य के लिए मन (इन्द्रिय संचालक) की आवश्यकता नहीं थी, इसीलिए उनका एक नाम अक्षपाद भी है।

अब इतने मग्न रहने वाले ऋषि ने जब इंद्र को अपनी पत्नी के साथ देखा तो क्या ये संभव नहीं की उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया की इंद्र मुनि रूप धर जल-पान के लिए बैठे थे अथवा उनकी पत्नी पर उनका ही रूप धरकर चेष्टाएँ कर रहे थे। न्याय शास्त्र के द्वारा सृष्टि के सूक्ष्मतम तत्वों को परिभाषित व विस्तृत करने वाले मुनि अपनी पत्नी को एक सती और पवित्र नारी के रूप में नहीं जानते होंगे?

अपने महान दार्शनिक ऋषि पति से ऐसे वचन सुनकर अहल्या जड़वत हो गयी, जबकि वह ऐसा कोई आचरण कर भी नहीं रहीं थीं। अतः उन्हें अपने ऋषि पति के शब्दों (श्राप, कठोर वचन) से इतना आघात पहुँचा कि वह फिर शिला समान हो गयीं। कुछ खाती पीती नहीं थीं। अंतःपुर में ही वास करती थीं इसलिए प्राणियों के लिए अदृश्य हो गयीं थीं। गुरुमाँ के अपने सभी धर्म और कर्म व दायित्व त्याग दिए क्योंकि वह इतनी आहत हो गयीं के एकांतवास में चली गयीं। गुरुकुल में शिष्यों की शिक्षा जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े इसलिए गौतम मुनि ने हिमालय में आश्रम स्थानांतरित कर लिया। यह कहकर की अब तो ईश्वर ही आकर अहल्या का उद्धार करेंगे। अंतर्मुखी अहल्या की तपस्या व साधना जारी रही। अंततः जब राम-लक्ष्मण वहाँ आये तो अहल्या ने उनका सावधानीपूर्वक (?) सत्कार किया, ज्ञान का आदान-प्रदान हुआ जिससे सब संतुष्ट हुये। जिसके पश्चात अहल्या अपने पूर्ववत जीवन में आयीं, गौतम मुनि ने भी इसी आश्रम में पुनः गुरुकुल स्थापित कर आगे का जीवन व्यतीत किया। 

स्मरण रहे, अहल्या के स्थान पर आने से कुछ समय पहले ही विश्वामित्र के अयोध्या आगमन पर श्रीराम के साथ वसिष्ठ व विश्वामित्र जी का जीवन विज्ञान व दर्शन का इतना विकसित प्रश्नोत्तर हुआ था की योग-वशिष्ठ की रचना हुई, जिसे महारामायण कहा जाता है। राम की जीवन दर्शन की दृष्टि अति सूक्ष्म थी।

महाभारत शांतिपर्व, अध्याय 265 में भी गौतम के पत्नी के मर्यादा-अतिक्रमण का विचार कर उस समय से तपस्या में अवस्थित होने का विवरण है। उसके पश्चात न्याय शास्त्र की रचना हुई (मेधातिथि = गौतम)

“ मेधातिथिमहाप्राज्ञो गोतमस्तपसि स्थितः। विमृश्य तेन कालेन पत्नया: सस्थाव्यतिक्रमम्।।”  

इस प्रसंग के उपरांत तपस्यारत दोनों पति-पत्नी हुये थे, किन्तु अलग अलग स्थानों पर और प्रायः भिन्न कारणों के लिए! 

कुछ विचारणीय बिंदु:

इंद्र देवों के प्रतिनिधि और वेदों में एक प्रमुख आराध्य शक्ति हैं (या कहें थे ?)। इंद्र एक पद है, एक व्यक्ति नहीं। सूक्ष्म योनि के देवों के प्रतिनिधि की अधिकतर पौराणिक कथाएँ उन्हें शक्ति भीरु (highly insecure), स्त्री लोलुप और व्याभिचारी ही प्रदर्शित करती हैं। कृष्ण ने इंद्र की अति स्तुति और उनकी निर्भरता को कम करने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला करी। परंतु उत्तरोत्तर इंद्र का रूप चित्रण सदैव पदच्युत ही दिखता है। क्या कालांतर में इस पद की अवमानना आरंभ हुई?

अहल्या को पंच कन्या (उदाहरणीय पवित्र नारियाँ) में माना जाता है –

 “अहल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा । पंचकन्या स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ॥”

इतनी पवित्र नारी क्या जानते बूझते व्याभिचार करेगी ? उन्हें रामायण के श्लोक के अनुवाद में दुर्बुद्धि नारि और गौतम ऋषि द्वारा दुराचारिणी कहा गया लिखा जाता है, जबकि मूल श्लोक में ये शब्द नहीं प्रतीत होते। और वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, 49वाँ सर्ग के 4-5 श्लोक ऐसे हैं जिन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ने पर कई सूत्र अपने आप खुल जाते हैं।

 परंतु निम्न श्लोक ( बालकाण्ड। 49।19)

“मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन। मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्।।”

इसमें ‘मतिं चकार दुर्मेधा’  का वास्तविक अर्थ क्या है ? 

इंद्र का नाम सहस्त्राक्ष (हज़ार आँखों वाला) तब पड़ा बताया जाता है जब उन्होंने तिलोत्तमा को नृत्य करते देखा, उनकी दृष्टि इतनी कामप्रभावित थी के उनके सारे शरीर पर आँखें उग आयीं। इस श्लोक में उसका प्रयोग प्रसंग की दृष्टि से उपयुक्त लगता है। परंतु इसी प्रसंग में गौतम मुनि के श्राप के कारण इंद्र के अंडकोषों की कथा कुछ अविश्वसनीय सी लगती है, क्या मूल रामायण में यह किसी तरह का कालांतर में किया गया दूषण तो नहीं?

यहाँ अहल्या की कथा तथा इसके दो प्रकार के पक्षों को प्रस्तुत करने का तात्पर्य था कि किसी भी पक्ष में और वाल्मीकि रामायण के श्लोकों में अहल्या पत्थर की शिला नहीं हुई थीं, शिलावत हो गयी थीं।

स्वयं विचार करिये, पौराणिक कथाओं ने क्या कुछ क्षति करी है ?

यात्रा जारी है….

आयुर्वेद की कथा – भाग 2 – चरक संहिता

चरक को भारतीय चिकित्सा विज्ञान का जनक माना जाता है।
आयुर्वेद को जानने के लिए वृद्ध-त्रयी का अभ्यास अनिवार्य है – चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम्। इस भाग में जानिए चरक संहिता के बारे में।

आयुर्वेद को जानने के लिए वृद्ध-त्रयी का अभ्यास अनिवार्य है – चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम्। वृद्ध त्रयी अर्थात वह तीन ग्रंथ जो प्राचीन ऋषि-मुनियों ने लिखे हैं। इसी प्रकार से लघु-त्रयी है, जो बाद के काल के ग्रंथ हैं – शारंगधर संहिता, माधव निदान तथा भावप्रकाश!

चरक संहिता

चरक को भारतीय चिकित्सा विज्ञान का जनक माना जाता है। पहले भाग में हमने चरक द्वारा अग्निवेश तंत्र के पुनर्गठन और सम्पादन (compilation) के बारे में बात करी थी। जिसके फलस्वरूप चरक संहिता का निर्माण हुआ। उस काल में चरक ने इतने सुव्यस्थित ग्रंथ की रचना करी।

अग्निवेशे कृते तन्त्रे, चरक: प्रति संस्कृते । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्। (च.सि.१२) अग्निवेश ने तंत्र की रचना करी परंतु चरक ने उसका प्रति संस्कार किया। यहाँ (चरक संहिता में) है तो अन्य कहीं हो सकता है, जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं मिलेगा

चरक दो प्रकार के हैं: एक परंपरा का नाम है और दूसरा ऋषि प्रकति का । उत्तम ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति भी चरक है,  उन्होंने प्रज्ञा व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया, उसका नाम भी चरक है (जैसे शंकराचार्य एक परंपरा का भी नाम है जो उनकी पीठ से चलता है और समकालीन शंकराचार्य गुरु व्यक्ति रूप भी हैं) । क्योंकि ‘चरैवेति चरैवेति’, वे अनेक स्थानों पर जाते थे, सदा चलायमान रहते थे इसलिए उनका नाम चरक पड़ा । कई जगह वर्णन है की चरक और पतंजलि, दोनों एक ही हैं। जिन्होंने योगसूत्र लिखा है, उन्होंने ही अपना एक उपनाम चरक रखा है। चरक संहिता में उनके व्यक्ति विशेष पहचान के लिए कुछ नहीं मिलता है। किन्तु  इतिहास के अनेक ग्रंथ देखे जाएँ तो ये भी पता चलता है कि वह राजा कनिष्क के यहां राजवैद्य थे। 

ये भारत की विशेषता रही है कि जो भी ग्रंथ लिखे गए वह ज्ञान को उपलब्ध ऋषियों द्वारा लिखे गए । चरक मुनि एक पारगामी बुद्धि के मुनि थे। इसीलिए चरक संहिता भी ‘अथ भूतो दयां प्रति’ अर्थात् सभी प्राणियों के प्रति दयाभाव से संकलित करी गयी।

चरक संहिता की रचना के कुछ एक हज़ार साल बाद ऋषि दृढ़वल ने उसका प्रतिसंस्कार किया । उन्होंने इसके 141 अध्याय किये। चरक पर कई विद्वानों ने, मनीषियों ने कार्य किया है। कई व्याख्याएँ जैसे चरक न्यास, जल कल्पतरु, चक्रपाणि रचित आयुर्वेददीपिका आदि बहुचर्चित हैं। प्रायः चरक संहिता पर 44 व्याख्याओं का वर्णन प्राप्त है।

ग्यारहवीं शताब्दी में चरक संहिता की सबसे प्रसिद्ध व्याख्या – आयुर्वेददीपिका – चक्रपाणि जी ने लिखी। उसी के आधार पर उन्हें चरक चतुरानन कहा जाता है। उन्होंने चरक संहिता की व्याख्या के लिए चक्रदत्त नामक ग्रंथ भी लिखा है। चक्रदत्त में आयुर्वेद का आपातकाल में (इमरजेंसी में) कैसे उपयोग हो सकता है, उसके प्रयोग बताये गये हैं। आयुर्वेद के तुरंत परिणाम देने के विवरण हैं।

इस संहिता से ज्ञान ग्रहण करने के लिए, सर्वप्रथम एक प्रज्ञावान मनीषी वैद्य के सानिध्य की, उनकी शरण की आवश्यकता होती है, जो चरक को समझा पाएँ। ग्रंथ, टीका व सम्बद्ध पुस्तकों का पठन व प्रवचन (वैद्य गुरु द्वारा) और पढ़ने की रीति – इन सबको समझने की आवश्यकता होती है।

चरक संहिता आठ स्थानों में विभक्त है: सूत्रस्थान; निदानस्थान; विमानस्थान; चिकित्सास्थान; शारीरस्थान; इन्द्रियस्थान; कल्पस्थान; और सिद्धिस्थान ।

इन स्थानों में 120 अध्याय हैं – सूत्रस्थान-30, निदानस्थान-8, विमानस्थान-8, शारीरस्थान-8, इन्द्रियस्थान-12, चिकित्सास्थान-30, कल्पस्थान-12 एवं सिद्धिस्थान-12 अध्याय।

यह संख्या 120 इसलिए है क्योंकि मनुष्य जीवन के भी 12 सोपान हैं जो उसके उत्तरोत्तर क्रम हैं।

चरक, सुश्रुत, काश्यप,हारित, भेल इन सभी संहिताओं में 120 अध्याय हैं। 120 अध्याय क्योंकि मनुष्य का आयुष्य 120 वर्ष का (या कहीं-कहीं 100 वर्ष का) माना गया है, जिसे 10-10 वर्षों के बाँटा गया है। क्रमश: प्रत्येक 10 वर्ष में एक एक गुण कम होता जाता है। मनुष्य के जीवन में से एक एक कलाएं नष्ट होती हैं। जैसे चंद्र की षोडश यानी सोलह कलाएँ होती हैं जो कृष्ण पक्ष में एक-एक करके कम होती हैं, उसी प्रकार मनुष्य शरीर से प्रत्येक 10 वर्ष में एक एक कला नष्ट/क्षरित होती है और 120 वर्ष तक शरीर के स्तर पर मनुष्य का जीवन पूर्ण हो जाता है ।

बाल्यं वृद्धि छवि मेधा तददृष्टि शुक्रविक्रमो । बुद्धि कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं दशतो रसे ।।

शारंगधर मुनि ने जीवन के 12 पड़ाव बताये हैं । प्रयेक पड़ाव 10 वर्ष का होता है। प्रत्येक 10 वर्ष में शरीर में परिवर्तन घटित होता है। इसीलिए रसायन प्रयोग का, औषधियों का बहुत महत्व बताया गया है क्योंकि उन परिवर्तनों के होने पर हम अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं, अंत समय तक टिका सकते हैं। (इस पर पंडित विश्वनाथ दातार शास्त्री जी ने गहन शोध कार्य किया है)। इसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र की विशोंतरी दशा, आयुष्य की 120 वर्ष की गणना करती है।

चरक संहिता के 120 अध्यायों में शरीर की रचना, मनो-मस्तिष्क की रचना, बुद्धि की रचना समझाने का बहुत सारा कार्य चरक मुनि ने कर दिया है जो निर्देशन केवल बुद्धत्व को प्राप्त ज्ञानी ही कर सकता है। चरकसंहिता में विषयों का यथास्थान सन्निवेश होने के कारण ही यह संहिता चिकित्साजगत में महत्त्वपूर्ण स्थान को प्राप्त है और चरक मुनि भारतीय चिकित्सा के जनक कहे जाते हैं।

चरक ने मुख्यतः काय चिकित्सा के ऊपर कार्य किया है। “काय इत्याग्निभिधीयते” – काय अर्थात शरीर की अग्नि ! आयुर्वेद का सिद्धांत है – अग्नि रक्षति रक्षितः – जो व्यक्ति अपने अंदर की अग्नि की रक्षा करता है, अग्नि उसकी रक्षा करती है। वह दीर्घायु होता है।

चरक संहिता में कहा गया है – “सर्वेपि रोगा: जायन्ते मंदे अग्नो” – सब रोग मंदाग्नि के कारण की होते हैं। पाचन की खराबी के कारण होते हैं। इसलिए अंदर की अग्नि का रक्षण करना चाहिये, उसका जतन करना चाहिये। दीपन, पाचन, अजीर्ण पर बहुत विस्तार से लिखा गया है।

चरक संहिता के आठ स्थानों में तीन स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – सूत्रस्थान, निदानस्थान और चिकित्सास्थान

सर्वप्रथम सूत्रस्थान है। सूत्र किसे कहते हैं ? ‘अल्पाक्षरं असंदिगधं सूत्रं सूत्र विदो विदु’ ये सूत्र की व्याकरण में परिभाषा है। अर्थात अक्षर थोड़े हों और अर्थ बहुत गहरे व बहुत व्यापक हों। यदि चरक संहिता के अंग्रेज़ी में अनुवाद का प्रयास करें तो कई पुस्तकें लिखी जायेंगीं क्योंकि पूरी संहिता सूत्र में लिखी गयी है। संस्कृत की किसी भी गहन बात को भी सूत्र में बताने की परंपरा रही है । अनेक प्रकार का विचार करके, संदेह न हो ऐसी असंदिग्ध रीति से बताना सूत्र का लक्षण होता है।

सूत्रस्थान में विभिन्न अध्यायों में विभक्त, आहार-विहार का, सृष्टि का, जीवन का वर्णन है। वैसे तो चरक के सूत्र इतने अमूल्य हैं कि प्रत्येक सूत्र को रत्न की तुलना दी जाती है, फिर भी पचीसवाँ और छबीसवाँ अध्याय पूर्ण रूप से जानने और पालन करने योग्य है । पचीसवाँ अध्याय यज्जःपुरुषीयोऽध्याय है। उस काल में आयुर्वेद प्राज्ञ पारगामी बुद्धि वाले साधनारत जनों की परिषद हुई, इसीलिए इसका नाम यजः पुरुषीय अध्याय है। उस परिषद में जो भी मुख्य यज्ञ पुरुष थे, उन सबके पक्ष के सूत्र उनके नाम से इस अध्याय में संग्रहित हैं। उस परिषद में मंथन हुआ, चिंतन हुआ और परिणाम स्वरूप पचीसवें और छबीसवें अध्याय के सूत्रों का गठन हुआ। इस अध्याय के सूत्रों में एक-एक द्रव्य के महत्व को बताया गया है। उदाहरण के लिए सबसे अच्छा, श्रेष्ठ धान्य कौन सा है, सबसे कनिष्ठ धान्य कौन से है, श्रेष्ठ और कनिष्ठ दूध कौन से है, आदि । उदाहरण के लिए – “लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति” अर्थात सूखे धान्यों में लाल चावल श्रेष्ठ होते हैं । सूत्रस्थान में 152 वस्तुओं की सूची दी गयी है । खाद्य और पेय अर्थात खाने और पीने वाली इन वस्तुओं की प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ कौन से है और कनिष्ठ कौन से है, ये स्पष्ट रूप से बताया गया है।

दूसरा उल्लेखनीय स्थान निदानस्थान है। जहाँ रोगों के कारण का विवरण है । निदान अर्थात रोगों के कारण ! रोगों के कारण  ज्ञात व  अज्ञात दोनों होते हैं और दृष्ट व  अदृष्ट भी । रोग की उत्पत्ति कैसे होती है? मनुष्य शरीर में रोग कैसे हो जाता है ? आदि । “अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोग:पश्चात् प्रवर्तते” – जो रोग आरम्भ में अणु के समान होता है, उसी में बाद में बहुत वर्धन हो जाता है । इसलिए विवेकशील व्यक्ति को पहले ही अपना ध्यान रख कर, रोग ही न हो ऐसी जीवन शैली अपनानी चाहिये। चरक मुनि ने ऐसी जीवन शैली का दिग्दर्शन किया है। केवल दिनचर्या, ऋतुचर्या कैसी हो यही नहीं, अपितु मान्यता कैसी हो; बुद्धि कैसी हो – सत्व प्रधान, रजस प्रधान अथवा तमस प्रधान; जीवन कैसा हो, इन सब पर चरक मुनि ने बहुत विवरण दिया । व्यक्ति जितना रोगों के कारण को जानेगा उतनी अच्छी चिकित्सा कर पायेगा। रोगों का कोई एक कारण नहीं होता, अनेक कारण होते हैं इसीलिए चिकित्सा भी बहुत सी होती है। प्रत्येक रोग की केवल एक चिकित्सा नहीं है जो एक ही औषधि से ठीक हो जाए (उदाहरण के लिए ज्वर, जो एक लक्षण है, उसकी दवाई देने से ज्वर लाने वाला कारण समाप्त नहीं होता)।

चिकित्सास्थान में सर्वप्रथम रोगप्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि करके शरीर और मन को बल प्रदान करने वाली रसायन और वाजीकरण विधाओं को दो पृथक्-पृथक् अध्यायों में वर्णित करके तत्पश्चात् ज्वर आदि अन्य रोगों का निदान-चिकित्सा और पथ्यापथ्य सहित विस्तृत वर्णन किया गया है।

चिकित्सा तीन प्रकार की होती है – तत्व  चिकित्सा, देव विपाश्रय चिकित्सा और युक्ति विपाश्रय चिकित्सा ।

रोग व्याधि के कारण से आते हैं जिसमें पूर्व जन्म के कर्म व्याधि के रूप में आना भी एक कारण है – “पूर्वजन्म भूतं पापं, व्याधिरूपेण बाधते” । इसलिए आयुर्वेद में इतने प्रकार से चिकित्सा बताई गयी है, नक्षत्र से भी कैसे चिकित्सा करनी है, ये बताया गया है। सूक्ति रत्नाकर  व्याधि के निराकरण के लिए बताता है –  “तत्शान्ति: औषधे दाने जपे होमे अर्चनादिर्भि:”, इसलिए आयुर्वेद में होम, मंत्र, औषधि, मणि सभी का चिकित्सा रूप में वर्णन है।

चरक में बताया गया है कि किसकी चिकित्सा करनी है और किसकी चिकित्सा नहीं करनी है। सात्विक लोगों की चिकित्सा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि वह उत्तम कार्य करते हैं। उनका शरीर अच्छा होगा तो वह अच्छे कार्यों में उसे लगाएंगे।

डॉक्टरों द्वारा ली जाने वाली hypocritic oath जो अंतिम साल में ली जाती है, ऐसी शपथ का वर्णन पहली बार चरक ने किया था व उसका क्रियान्वन किया था । चरक संहिताओं में यह शपथ उपदेश अंकित है कि अंत में जब विद्यार्थी पढ़ कर जाता है तो उसे किस तरह से रहना है, चिकित्सा के चार पाद क्या हैं, वैद्य के चार गुण क्या है, औषधि के चार गुण क्या हैं, परिचारक के चार गुण क्या हैं!( सूत्रस्थान, खुड्डाकचतुष्पादोऽध्यायः)

चिकित्सा के संबंध में चरक में सूत्र है की चिकित्सा के समान कोई पुण्य नहीं क्योंकि एक व्यक्ति को आप यदि निरोगी कर देते हैं तो उसे एक नया जीवन दे देते हैं और नये जीवन के दान से बड़ा कौन से दान है? वैद्य ये दान देता है, इसलिए वैद्य से बहुत बड़ी अपेक्षा होती है, उससे एक उत्तम जीवन की आकांक्षा होती है। चिकित्सा करने का ये अवसर कभी-कभी किसी-किसी को ही मिलता है और जो इस अवसर को छोड़ देता है, वह रत्न को छोड़कर पत्थर उठा लेने वाले के समान है। चरक संहिता इतना ज्ञान घटित करने वाला शास्त्र है।

आयुर्वेद में चरक संहिता को पवित्र व अति वंदनीय ग्रंथ माना जाता है। वैद्य उसकी परंपरा के पालन का जतन करते हैं। किन्तु भारत में भी अब चरक को जानने वाले कम ही हैं क्योंकि वह इसके महत्व से अनजान हैं। ऋषि मुनियों से मिले इस अभूतपूर्व ज्ञान को केवल उपदेश व ऐतिहासिक मान कर ही रह जाते हैं।

सुश्रुतो न श्रुतो येन, वाग्भटो येन वाग्भट: | नाधितश्च चरक येन, स वैद्यो यम किंकर:||

सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसे वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।

आगे हम वृद्ध-त्रयी के सुश्रुत और वाग्भट्ट की बात करेंगे।  

आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा की शृंखला का ये  दूसरा भाग इंडिक टुडे (indictoday.com) में प्रकाशित हुआ है।
लिंक: https://www.indictoday.com/long-reads/ayurveda-katha-ii/

आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा!

आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।

धन्वंतरि समारम्भां, जीवकाचार्य मध्यमाम् । अस्मद् आचार्यपर्यन्ताम् , वन्दे गुरु परम्पराम् ॥

विभिन्न संहिताओं, ऐतिहासिक ग्रंथों, संस्कृत के ग्रंथों में आयुर्वेदिक की उत्पत्ति का विवरण उपलब्ध है। आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।चरक मुनि ने ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ कहकर आयुर्वेद को शाश्वत बताया है। आयुर्वेद अविरत चलायमान है और इसकी रक्षा अविरत होती रहती है।

 संहिताओं में निहित ज्ञान के आधार पर सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने करी। सहस्त्रों-सहस्त्रों वर्षों पहले सृष्टि की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद व अथर्वेद में उसका वर्णन है। विशेषकर तैत्तिरीय उपनिषद में बताया गया है:

“तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूत: | आकाशाद्वायु:| वायोरग्नि: | अग्नेराप: |अद्भ्य: पृथिवी | पृथिव्या औषधय: | औषदिभ्यो S न्नम् | अन्नात्पुरुष: ||

उस एक तत्व से आकाश की उत्पत्ति हुई, उसके बाद पंचभूतों की और फिर अनेक प्रकार के महाभूतों की क्रम से उत्पत्ति हुई, अंत में अन्न से मनुष्य की उत्पत्ति हुई। समस्त ब्रह्मांड की रचना की बात बहुत जगह पर आयी है। उन सबके पश्चात एक शास्त्र की रचना हुई।

जैसे कोई व्यक्ति एक यंत्र बनाता है, तो उसे बनाने के बाद उसकी एक अनुदेश पुस्तिका (user manual) निर्मित होती है, जिसमें उससे संबंधित सभी दिशा निर्देश होते हैं, बताया जाता है की उसकी विशेषता क्या है, उसे किस तरह से उपयोग करें, किस तरह से उपयोग न करें – यह सब संकलित कर वह निर्देश पुस्तिका यंत्र के साथ दी जाती है।  सृष्टि के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसकी रचना के बाद एक शास्त्र की रचना हुई जो मानव जीवन की एक प्रकार की निर्देश पुस्तिका है। इस शास्त्र को केवल मानव जीवन का नहीं, सर्व भूतों के जीवन की निर्देश पुस्तिका कहा जा सकता है। 

जिस शास्त्र की रचना हुई वह जीवन से जुड़ा हुआ था, इसीलिए उसका नाम आयुर्वेद रखा गया। आयु अर्थात जीवन, वेद अर्थात ज्ञान। जबसे सृष्टि का आरम्भ हुआ, तबसे अनेक प्रकार की बाधाओं से बचने के लिए, मनुष्य के शरीर को, मन को, आत्मा को, बुद्धि को, व्यवहार को समझने के लिए आयुर्वेद की रचना करी गयी। कोई भी परंपरा इतनी पुरानी नहीं होगी, जितना पुराना आयुर्वेद है। 

आयुर्वेद के सबसे पहले उपदेशक ब्रह्मा थे। वहाँ से आयुर्वेद की परंपरा का आरम्भ हुआ। ब्रह्मा अर्थात सर्जक! जो व्यक्ति सर्जन करता है वह उस कोटि का व्यक्ति है जो ईश्वरीय रूप है, जो पूर्णता की ओर है। वह ईश्वर वो नहीं जिसे हम मानते हैं, परंतु ईश्वरीय अर्थात जिसकी चेतना पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध है, ऐसे ब्रह्मा हैं। दो प्रकार की परम्पराओं का वर्णन, चरक संहिता में व सुश्रुत संहिता में आता है, दोनों ने ब्रह्मा जी को आयुर्वेद का प्रथम सर्जक बताया गया है। 

ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया। दक्ष प्रजापति अर्थात जो दक्ष है, कार्यकुशल है तथा प्रजापति अर्थात जो प्रजा को पालने वाले हैं, प्रजा की रक्षण की जिसकी बुद्धि है। ये नाम गुण को परिभाषित करता है, इन गुणों से युक्त व्यक्ति दक्ष प्रजापति है।  जो बौद्धिक हो और भौतिक न हो, अर्थात अंदर से तो वह बुद्धता को, आत्मा की चेतना को प्राप्त हो, परंतु बाहर से (प्रजा के)शरीर की रक्षा को प्रतिबद्ध हो। क्योंकि वह जानता है कि आत्मा तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम जो सीढ़ी है वो शरीर से आरम्भ होती है। इसलिए ये चिकित्सा के उद्भव का श्रेय ब्रह्मा, उसके बाद दक्ष प्रजापति को जाता है।

दक्ष प्रजापति से ये ज्ञान अश्विनी कुमार को मिला है। अश्विनी कुमार दो हैं। हमारे यहां 33 कोटि (यानी प्रकार) के देवी देवता हैं। उन 33 में से यह दो अश्विनी कुमार युग्म के रूप में मिलते हैं [अश्विनी कुमारों के बारे में बहुत सारी लक्षणा है, इतिहास है, सत्य है, तथ्य है जिनकी चर्चा किसी अन्य अवसर पर करी जाएगी ]।  देवों के वैद्य के रूप में जो ख्यात हैं, वह  दक्ष प्रजापति से ज्ञान प्राप्त अश्विनी कुमार हैं। 

अश्विनी कुमारों से यह ज्ञान देवराज इंद्र ने लिया। देवराज इंद्र एक ऐतिहासिक व पौराणिक पात्र हैं। मनुष्यलोक के सामान एक देवलोक है, देव सृष्टि है  जिसके प्रतिनिधि इंद्र हैं। 

पशुओं की और मनुष्यों की भिन्न सृष्टि है और न दिखने वाली भी पशु सृष्टि हैं – एक वायरस (विषाणु) की सृष्टि है, एक बैक्टीरिया (कीट) की सृष्टि है। ये सूक्ष्म ऊत सृष्टि धीरे धीरे आज भैतिक साधनों के कारण ज्ञात होती जा रही है, दिखाई देती जा रही है। आज सूक्ष्मतम यंत्र से सूक्ष्मतम जीवाणु दिखाई देते हैं। साधन की सहायता से उसका अनुभव किया जा सकता है। किंतु आत्मा की चेतना जब ऊपर जाती है, तो वो कोई साधन की सहायता से नहीं, अपितु साधना के बल पर जाती है, ऐसी ही उत्तम चेतना से परिपूर्ण देवलोक की पूरी सृष्टि है। जैसे एक वायरस की या बैक्टीरिया की अज्ञात सृष्टि है, उसी तरह देवलोक की भी एक अज्ञात सृष्टि है। वो भी दिखाई पड़ती है, उसका भी अनुभव होता है। उसके लिए आत्मा की चेतना की अवस्था उत्तम होनी चाहिए। 

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥  

ब्रह्मा ने ऐसा कल्प के आदि में उत्पन्न प्रजाओं से कहा। इसलिए देवराज इंद्र, जो देव सृष्टि के प्रतिनिधि हैं, उन्हें आयुर्वेद का ज्ञान मिला।  यहाँ तक आयुर्वेद की अलौकिक परंपरा पूरी होती है। जहाँ पर देव सृष्टि है – जहाँ पर चेतना को उपलब्ध हुए जीवों को जो अनुभव होता है, उसे अलौकिक परंपरा कहते हैं जिसमें सर्वप्रथम ब्रह्मा हैं और अंत में इंद्र हैं। इसके बाद लौकिक परंपरा आरंभ होती है। 

देवों को जब कुछ परिवर्तन करना होता है, कुछ परिणत करना होता है तो वह मनुष्यों को खोजते हैं।  जिसके पास उत्तम वस्तुएँ होंगी और वह व्यक्ति यदि उत्तम चेतना वाला होगा – मनुष्य जीवन में देखें तो सात्विक चेतना वाला होगा – तो देव उसे उत्तर में अधिकारी के रूप में देखेंगे। देव सबसे योग्य व्यक्ति को ढूँढता ही रहता है। इंद्र ने भी आयुर्वेद के लिए ऐसा व्यक्ति खोजा और उन्हें वह भारद्वाज ऋषि के रूप में मिल गया।

इंद्र ने एक परंपरा के अनुसार आयुर्वेद का ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया। यहाँ से आयुर्वेद की लौकिक परंपरा आरम्भ हुई। ‘इमं द्विज भार’ ऐसा भारद्वाज शब्द की व्युत्पत्ति बताई है। जिसे संभालने की बुद्धि है, वह भारद्वाज, उन्हें इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान दिया।

इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान मिलने के बाद भारद्वाज ने ऋषि परिषद करी [पहले के ऋषि-मुनि उत्तम चेतना को उपलब्ध थे इसलिए जो ज्ञान मिला उसे वो वितरित करना चाहते थे। ज्ञान की ऐसी अदभुत परंपरा रही जिसमें न कोई प्रमाण पत्र देना था, न ही कोई पैसा लेना था और न ही अन्य कोई बातें थीं]। उस ऋषि परिषद में अत्रि मुनि ने भी भाग लिया। अत्रि मुनि का बहुत जगह पर वेदों में भी वर्णन है। ‘त्रिगुणात अतीत: अति अत्रि’, अर्थात  तीनों गुणों से पर जो व्यक्ति हो गया वह अत्रि। 

उस ऋषि परिषद के पश्चात आयुर्वेद के ज्ञान की परंपरा को अत्रि मुनि ने आगे बढ़ाया। अत्रि मुनि से आयुर्वेद की वास्तविक परंपरा आरम्भ होती है। अत्रि तक ये आयुर्वेद ज्ञान परंपरा श्रुति रूप में थी। 

अत्रि ने इस आयुर्वेद की परंपरा का अपने शिष्य व पुत्र आत्रेय को ज्ञान दिया। अब तक ये उपदेश मौखिक थे। क्योंकि पहले की वैदिक परंपरा श्रुत परंपरा थी यानी सुना हुआ याद रखना। इसलिए वेद भी श्रुति कहे जाते हैं। क्योंकि सुना हुआ बहुत महत्व का होता है। संस्कृत में विद्वान को ‘well read’ नहीं कहते, ‘बहु श्रुत’ कहते हैं। सुना हुआ, पढ़े हुए से बहुत गहरा होता है। 

पुनर्वसु आत्रेय का उपदेश, चरक संहिता ग्रंथ में पाया जाता है। चतकर्ण, पाराशर, भेल इन ऋषि मुनियों का भी वर्णन चरक संहिता में दिया गया है। 

आत्रेय ने आयुर्वेद के ज्ञान से आगे छह शिष्यों को तैयार किया, उनमें से एक अग्निवेश थे। अग्निवेश, भेल, चतकर्ण, पाराशर, क्षिप्रणि, हर्षता वह छह शिष्य थे। अनेक लोगों की संहिताएँ हैं, इन सभी ऋषियों के नाम से भी संहिता लिखी गयी हैं। ये छह शिष्य श्रोता थे। उन्होंने पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश को ग्रहण किया। उसके बाद अग्निवेश के पारगामी बुध्दि रचित तंत्र की रचना हुई [तंत्र की शास्त्रीय, दार्शनिक परिभाषा, संहिता की रचना किस प्रकार होती है, आदि किसी अन्य समय। यह एक कोर्स बनाने जितना सरल नहीं है], जो सबसे बड़ा कार्य हुआ। अग्निवेश के बाद ये तंत्र कालक्रम से चलता रहा। मूल उपदेश का तंत्र बनाया गया था, उसमें कालानुक्रम में कुछ मिश्रित होता गया और कुछ निकलता गया।  मूल आयुर्वेद के उपदेश से कुछ न कुछ अलग होता गया, कुछ दूषित भी हुआ।

चाणक्य ने बताया है कि अन्य किसी क्षेत्र में भ्रष्टाचार सह्य हो सकता है परंतु चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में, उनकी व्यवस्था में लेश मात्र भी यदि भ्रष्टाचार हो तो कोई भी व्यवस्था सही नहीं बचेगी और समाज की बहुत हानि होगी। चिकित्सा के क्षेत्र में यदि भ्रष्टाचार हुआ तो वह कभी सह्य नहीं होगा, ये चुकाना पड़ेगा। आयुर्वेद में लोभ एक तरह से वर्जित है, अगले जन्म में, इस जन्म में बहुत भोगना पड़ता है। कुवैद्य की निंदा करी गयी है और सुवैद्य की प्रशंसा करी गयी है। 

अग्निवेश के तंत्र के बाद एक ऋषि आये जिन्हें हम चरक कहते हैं। चरक पारगामी बुद्धि के ऋषि थे, उन्होंने अग्निवेश तंत्र का परिमार्जन, पुनर्गठन किया। उन्होंने देखा की अग्निवेश तंत्र में क्या दूषित हुआ है और उसके लिये क्या किया जा सकता है, ये उन्होंने एक बहुत बड़ी क्रांति रूपक बात आरम्भ करी और चरक संहिता की रचना करी।  इसलिए कहा जाता है की अग्निवेश ने तंत्र लिखा, उसका प्रतिसंस्कार चरक ने किया। वह संहिता इतनी ख्यात हुई की चरक को ‘father of indian medicine’ कहा जाता है। 

चरक दो प्रकार के हैं: एक परंपरा का नाम है चरक (जैसे शंकराचार्य एक परंपरा का भी नाम है जो उनकी पीठ से चलता है और समकालीन शंकराचार्य गुरु व्यक्ति रूप भी हैं)और दूसरा ऋषि प्रकति का, उत्तम ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति भी चरक है । उन्होंने प्रज्ञा व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया, उसका भी नाम चरक हो गया। क्योंकि ‘चरैवेति चरैवेति’, वे अनेक स्थानों पर जाते थे, सदा चलायमान रहते थे इसलिए उनका नाम चरक पड़ा। कई जगह वर्णन है की चरक और पतंजलि, दोनों एक ही हैं। जिन्होंने योगसूत्र लिखा है, उन्होंने ही अपना एक उपनाम चरक रखा है। चरक संहिता में उनके व्यक्ति विशेष पहचान के लिए कुछ नहीं मिलता है। किन्तु  इतिहास के अनेक ग्रंथ देखे जाएँ तो ये भी पता चलता है कि वह राजा तनिष्क के यहां राजवैद्य थे। 

चरक मुनि ने अग्निवेश तंत्र का सुव्यवस्थित रूप से गठन किया। वो गठन करने के बाद, जिसे आज हम संपादन (compilation) कहते हैं, उससे भी बड़ा काम चरक मुनि ने किया। चरक संहिता कोई छोटी मोटी संहिता नहीं है, आठ स्थान में विभक्त है जिसमें 140 अध्याय हैं। यह सब उस समय किया गया जब कागज़, कलम नहीं थे और बहुत सारी टेक्नोलॉजी नहीं थी। उस समय उन्होंने बहुत ही मेहनत से इस ग्रंथ को बनाया। 

परंपरा को बचाने के लक्ष्य को निर्धारित करके उन्होंने एकनिष्ठ होकर यह कार्य किया जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं था। और उन्होंने इतने विषय चरक संहिता में ले लिए कि कहा जाता है, जो यहाँ मिलेगा, वह दूसरे स्थान में होगा, ऐसा नहीं कह सकते, किन्तु दूसरे स्थान में होगा तो चरक संहिता में होगा ही!

युग व प्रमुख वैद्य

काल के अनुसार आयुर्वेद के अनेक ऋषियों की महत्ता बतायी गयी है। उसके अनुसार अत्रि की कृतयुग/सतयुग में बहुत महत्ता है। सतयुग के वैद्य के रूप में अत्रि प्रमुख हैं। अत्रि ने अपनी स्मृति में सात्विक लोगों की चिकित्सा कैसे करी जाए, उसपर कार्य किया। उस युग में सत्त्वप्रधान व्यक्ति हुआ करते थे तो रोग भी उस प्रकार के होते थे, चिकित्सा भी उसी प्रकार की करनी होती थी। सतयुग के रोग ऐसे थे की अधिक तप करने से, अधिक सहन करने से, अधिक शरीर को कष्ट देने से होते थे तो उसी प्रकार की चिकित्सा अत्रि मुनि ने स्थापित करी।

द्वापर युग में बहुत युद्ध घटित हुये, सुश्रुत द्वापर के वैद्य थे। द्वापर में युद्ध बहुत हुये, उसके लिए शल्य की आवश्यकता रही। ऋषि-मुनि परंपरा से बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति को समाज कल्याण की चिंता रहती ही है, इसलिए सुश्रुत( जो विश्वामित्र के पुत्र थे) के रूप में वह दिवोदास धन्वंतरि की परंपरा में आये। धन्वंतरि की परंपरा में आकर उन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी, उन्हें शल्य चिकित्सा (surgery) का जनक माना जाता है। 

कलियुग में वाग्भट्ट प्रमुख वैद्य हुये। कलियुग में सत्व के लिए अधिक तप के कारण, शरीर के कष्टों के कारण रोग नहीं होते, युद्ध के कारण भी नहीं होते, अपितु अधिकतर आहार विहार के नियमों का पालन न करने के कारण होते हैं, इसलिए वाग्भट्ट का नाम कलियुग में गौरवपूर्ण हुआ, क्योंकि उन्होंने आहार-विहार से संबंधित अति विस्तृत चिकित्सा स्थापित करी (अष्टांग हृदय, अष्टांग संग्रह ग्रंथ)। 

चरक संहिता की रचना के 1000 साल बाद, दृढ़वल ने उसका प्रतिसंस्कार किया, उसमें 141 अध्याय किये। आधुनिक समय में भी बहुत विद्वानों ने चरक पर काम किया है, जैसे चरक विन्यास, जल कल्पतरु, चक्रपाणि आदि के व्याख्याएँ चरक पर मिलती हैं। प्राय: 44 व्याख्याओं का वर्णन चरक के ऊपर प्राप्त हैं।

आधुनिक चिकित्सा जगत की बात करें तो एलोपैथी के लिए हैप्पोक्रिटिस का नाम आता है, होमियोपैथी को देखें तो  हैनिमैन, सुशलर  का नाम आता है, ऐसे ही अन्य पथियों के लिए विभिन्न चिकित्सकों का, लेखकों का नाम आता है, जिन्होंने वो पद्धति/पथी आरम्भ करी। आयुर्वेद को किसी व्यक्ति विशेष ने आरम्भ नहीं किया। ये ज्ञान अनादि से प्रवाहित है। 

 ‘आयुर्वेद: पंचमो वेद:’ आयुर्वेद को पाँचवे वेद का स्थान दिया गया है। आयुर्वेद एक काढ़ा,दवाई अथवा केवल वटी-गुटी का शास्त्र नहीं है। ये जीवन से जुड़ा हुआ, सूक्ष्मतम ज्ञान से निहित शास्त्र है। इसमें जीवन की प्रत्येक पक्ष को सूक्ष्मता से देखा गया है, प्रत्येक व्याधि का समाधान दिया गया है। चाहे प्रमाणिकता हो, चाहे जीवन के अछूते पक्ष हों, सबकी बात आयुर्वेद में करी गयी है, इसीलिए चरक मुनि ने कहा है ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ |

शायद ही किसी अन्य चिकित्सा पथी की पुस्तकें पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद कही गयीं। इसलिए आयुर्वेद में बताया :

‘न कामर्थं न अर्थार्थं, अथ भूत दयां प्रति’ ये शास्त्र भूतानुकंपया है, ये शास्त्र धन कमाने के लिए नहीं है, किसी कामार्थ नहीं है, ये पेट भरने के लिए भी नहीं है। इसका हेतु है कि ये अनेक प्रकार के जीव जंतु का कल्याण हो जाए, मनुष्य स्वस्थ रह सके, रोगों से बच सके और जो रोग हो गए हैं उनका निदान कर सके। इसलिए रोगों से बचने के लिए क्या क्या आवश्यक है, ये सारा ज्ञान आयुर्वेद में हैं, इसलिए उसकी रचना हुई। 

आयुर्वेद में चरक संहिता को पवित्र ग्रंथ व अति वंदनीय माना जाता है। वैद्य उसकी उसकी परंपरा के पालन का जतन करते हैं। 

सुश्रुतो न श्रुतो येन, वाग्भटो येन वाग्भट: | नाधितश्च चरक येन, स वैद्यो यम किंकर:||

सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसको वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।

यात्रा जारी है……