वरदराज पेरूमाल कोविल मंदिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु

राजगोपुरम ! मुख्य द्वार

वरदराज पेरूमाल कोविल दिव्य देशम में से एक है, जो विष्णु के वह 108 मंदिर हैं जहाँ 12 आलवार संतों ने तीर्थ करा था और विष्णु स्तुति गायी थीं। यह मंदिर कुछ 1100 वर्ष पुराना है। इसे प्रसिद्ध चोल राजा राज राजा प्रथम ने बनवाया था। बाद के समय में चोल राजाओं कुलोत्तुंग प्रथम और विक्रम चोला ने इसमें विस्तार किए।

मंदिर के पीछे की ओर से मूलवर सन्निधि का शिखर (पुण्यकोटि विमानम)! इस शिखर पर नरसिंह शीर्ष दिखता है।
प्रवेशद्वार से भीतरी प्रांगण का दृश्य, जिसमें दो मण्डप और उसके पश्चात् ध्वज स्तंभ स्थित है।
ध्वज स्तंभ के दाईं ओर अन्न क्षेत्र और बाईं ओर पवित्र पुष्करणी स्थित है।
और यह है मंदिर की पुष्करणी जिसके कारण यह एक तीर्थस्थल कहलाता है।

वरदराज पेरूमल यानि वर देने वाले विष्णु ! जिनका नौ फ़ीट का अंजीर की लकड़ी का बना विग्रह इस पुष्करिणी में सदा जलमग्न विराजमान रहता है और हर 40 वर्ष में एक बार जल से बाहर आता है, भक्तों के दर्शन हेतु! इस मूर्ति का निर्माण स्वयं विश्व कर्मा द्वारा किया बताया जाता है।

इस स्थान में मूर्ति जलमग्न रहती है।

सोलहवीं शताब्दी तक यह गर्भग्रह में विद्यमान और पूजित थी। परंतु मुसलमान आक्रांताओं के बढ़ते हमलों के कारण अर्चकों ने उसे चांदी की पेटिका (casket) में सुरक्षित कर इस पुष्करणी में छिपा दिया और इसकी जानकारी गुप्त रखी। 1709 में पुष्करणी की सफाई में यह उद्घाटित हुआ। तब से यह परंपरा स्थापित हुई कि प्रत्येक चालीस वर्ष के बाद यह मूर्ति जल से निकाली जाती है और 48 दिनों तक भक्तों के दर्शन के लिए रखी जाती है। इसकी पौराणिक कथा गूगल पर सरलता से उपलब्ध है। कहते हैं कि ब्रह्मा जी द्वारा किये जा रहे यज्ञ की सरस्वती रूपी वेगवती नदी के जल प्रकोप से रक्षा के लिए स्वयं विष्णु यहां बाड़ की तरह लेट गये थे।

मुख्य दर्शन वीथिका

बारह स्तंभों की इस वीथिका की शोभा देखते ही बनती है। यहां विष्णु के उत्सव विग्रह श्री देवी तथा भू देवी के साथ विराजमान हैं। भारत भर से दर्शनार्थी यहां दर्शन के लिए आते हैं। किन्तु स्थानीय मूलनिवासी वैष्णव अपनी आभा और निष्ठा के कारण सहज ही पहचान में आ जाते हैं।

पेरूमाल(विष्णु) के उत्सव विग्रह के बायीं ओर ये छोटा आ प्रांगण है जिसके बायीं ओर तायार पेरुनदेवी की सन्निधि है।
ये मण्डप शायद तायार के उत्सव विग्रह के लिये हो!
जालीदार स्तंभ

इन जालीदार स्तंभों की शिल्पकारी चकित करती है। इतनी सूक्ष्मता से आकार और अनुपात का ध्यान रख, एक ही पत्थर को पूर्ण रूप से सही तराशा है।

अंदर की ओर से मण्डप की छत

केवल स्तंभ ही नहीं, इस मण्डप की छत भी विस्मित करती है। अच्छी बात यह है की जीर्णोद्धार के समय सामायिक चटक रंगों का प्रयोग ना करके प्राकृतिक रंगों की सहायता से इन्हें संरक्षित किया गया है।

तायार पेरून देवी की सन्निधि में उनके दर्शन में एक प्रकार की शीतलता का अनुभव होता है। परिक्रमा करते समय पीछे की ओर से शिखर का स्वर्ण आच्छादित शिखर बहुत सुन्दर दिखता है। तायार अर्थात् मां। मन्दिर के मुख्य देव की पत्नी का एक मां के रूप में स्वतंत्र सन्निधि रहती है। इस मंदिर में विष्णु पत्नी लक्ष्मी पेरुन देवी के रूप में विद्यमान हैं।
मूल विग्रह के बारे में पूछने पर मुख्य मण्डप वीथिका के पीछे की ओर स्थिति सन्निधि में जाने को कहा जाता है। मूलवर नरसिंह की सन्निधि में पंद्रह स्तंभों में से एक पर यह रूप उकेरा हुआ है। विग्रह का रूप कुछ इसी तरह है। यहां उग्र नरसिंह अथवा योगी नरसिंह का विग्रह स्थापित है।
और ये है प्रसिद्ध सौ स्तंभों वाला मण्डप!

चोल कला का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता यह शत -स्तंभ मण्डप पुष्करणी के बाईं ओर स्थित है। प्रत्येक स्तंभ एक भिन्न कथा और देव को प्रस्तुत करता है। भारतीय शिल्प जिज्ञासु और इतिहासकार यहां कितने ही दिन बिता सकते हैं। यह मण्डप विजय नगर के राजाओं द्वारा बनवाया बताया जाता है।

कठोर पाषाण में तराश कर बनाई इन कलाकृतियों की सूक्ष्मता और निपुणता देख बरबस ही शिल्प कार के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं। योद्धा के शस्त्र, घोड़े की लगाम, अश्व के पैरों के नीचे आए शत्रु की अवस्था, सह कुछ स्पष्ट है।

कल्याण मण्डप

इस मण्डप वेदी पर प्रति वर्ष वसंत के समय श्री विष्णु का विवाह पेरून देवी से होता है। सुनने में आया उत्सव भव्य होता है।

स्तंभ पर उकेरे आञ्जनेय (हनुमान)!
योगी नरसिंह

शत -स्तंभ मण्डप से दिख रही इस दिव्य पुष्करिणी की दिव्यता चित्र में नहीं बांधी जा सकती । श्री विष्णु से प्रार्थना है कि वह अपना वरदहस्त सदा भक्तों के शीश पर रखें और उन्हें दर्शनलाभ दें!

वर्षा ऋतु में आहार-विहार

जो व्यक्ति ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन के आदी होने के बारे में जानता है, ऐसी आदतों का समय पर अभ्यास करता है, उसका बल और ऊर्जा-आभा बढ़ जाती है, और वह एक स्वस्थ, लंबा जीवन जीता है।

वर्षा ऋतु का आगमन हो चुका है। आषाढ़  और सावन मास में वर्षा ऋतु का काल होता है। प्रत्येक ऋतु का काल अलग होता है, उस समय वातावरण की स्थिति अलग होती है और उसी प्रकार हमारे शरीर में त्रिदोष अर्थात वात-पित्त-कफ की स्थिति भी ऋतु के साथ बदलती है।  भाव प्रकाश में भाव मिश्र बताते हैं: 

क्षयकोपशमा यस्मिन्दोशाणां संभवन्ति हि । ऋतुशट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु संक्रमात् ।।

 – जिस समय दोषों की वृद्धि, कोप तथा शमन हुआ करता है, उस समय को ऋतु कहते हैं।

ऐसे में  सामान्य  प्रश्न उत्पन्न होते हैं कि इस ऋतु में  आहार विहार कैसा होना चाहिए? 

वर्षा ऋतु वात यानि वायु के प्रकोप का काल है। इस ऋतु में मंद अग्नि होती है जिसका हमारी पाचन क्रिया पर सीधा असर पड़ता है। यह ऋतु प्रजनन प्रक्रिया के आरंभ होने का भी काल है। जीवाणु, कीट सृष्टि की उत्पत्ति का काल है। यह एकमुख्य कारण है कि इस ऋतु में भारत में लोकाचार और परम्पराएं भी इस प्रकार से रची हैं कि सब ऋतु अनुकुल आहार विहार करें। जैसे –

मांस का सेवन करना – मांस के सेवन के लिए किसी पशु -पक्षी के जीवन का अंत किया जायेगा। क्योंकि प्राकृतिक रूप से यह पशु- सृष्टि की प्रजनन प्रक्रिया का काल है तो शिकार/आखेट से इस प्रक्रिया में, सृष्टि की उन्नति के कार्य में बाधा उत्पन्न होती है, अतः इस कार्य को ही इस ऋतु में निषिद्ध कर दिया जाता है।

हरी सब्जी, प्याज, फल विशेष का त्याग – वर्षा ऋतु में इनमें कीट-जीवाणु की उत्पत्ति अधिक होती है। ऐसा मुख्यतः वातावरण में अधिक नमी होने के कारण होता है। इन्हें त्यागने से इन्हें खाने की तथा इनके माध्यम से कीट-विषाणु खा लिए जाने की संभावना समाप्त हो जाती है तथा रोग होने से बच जाते हैं।

यात्रा करना और ग्रंथ अध्ययन करना – वर्षा होने के कारण और अधिकतर जगहों पर कच्चा जल उपलब्ध होने के कारण प्रवास यात्रा में कठिनाई होती है और जल के कारण उदर रोगों की संभावना बहुत बढ़ जाती है, अतः एक ही स्थान पर रहने का प्रावधान किया जाता है और समय का सदुपयोग हो इसलिए सम्यक वातावरण के तापमान में ग्रंथ अध्ययन का विधान रहता है।

इस ऋतु में कैसा आहार विहार करना चाहिए ?

नमकीन, खट्टा/अम्ल रस वाला , चिकना, हल्का और मधुर आहार लें। कब्ज़ न होने दें। जठराग्नि का विशेष ध्यान रखें। नया पानी और नए साकभाजी त्याग दें और साधारण श्रम करें। संयमी रहें, विशेष व्यायाम न करें। वायुकारी आहार न लें।

गुरुजी (आचार्य मेहुल भाई) वर्षा ऋतु में आहार -विहार के  प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते हैं:

शरीर व आत्मा दोनों का आरोग्य अच्छा रहना चाहिए। दोनों की पुष्टि हो, शरीर आत्मा को ना भूले और आत्मा शरीर को ना भूले यानी ऐसे में हम शरीर व आत्मा दोनों का विचार करें। संस्कृति आर्य गुरुकुलम् एकमात्र ऐसी संस्था है जो दोनों को साथ में रखकर चलती है। यह एकमात्र ऐसा गुरुकुल है जिसने आयुर्वेद तथा आध्यात्म – दोनों क्षेत्रों में अग्रगण्य प्रदान किया है। वर्षा ऋतु में आहार इसके दूसरे छोर यानी शरीर के विषय का प्रश्न है।  आयुर्वेद आषाढ़ व श्रावण मास में विशेष जिन वस्तु के सेवन करने की बात बताता है वह इस प्रकार है :

) अदरक : आषाढ़ मास में अग्नि मंद होती है या मन्दाग्नि होती है। यानि मेटाबॉलिज्म तथा डाइजेस्टिव एसिड्स निम्न होते हैं। अदरक अग्नि को प्रदीप्त करता है इसलिए भोजन से पहले से अदरक खाने से मंद अग्नि बढ़ती है। अतः पूरे आषाढ़ में और सावन में अदरक का सेवन करें। यदि किसी प्रकार का धार्मिक परहेज है तो सौंठ का भी सेवन पर सकते हैं।

लाभ :

अदरक खाने से अग्नि मंद नहीं होगी,  प्रदीप्त रहेगी जिसके फलस्वरूप अच्छा पाचन होगा, भूख लगेगी।

वायु का अनुलोमन होगा। वायु का अनुलोमन करने से शरीर में वायु नहीं बढ़ेगा। वात संबंधी रोग नहीं होंगे।

अदरक पुराने आम यानी कच्चे रस का पाचन करता है।

अदरक या सौंठ सुबह या शाम, किसी भी समय ले सकते हैं।अदरक के टुकडे पानी में भिगो कर या नमक के साथ सेवन करें। यदि सोंठ ले रहे हैं तो आधा चम्मच सुबह या शाम किसी भी समय ले सकते हैं। 

२) एरंड का तेल ( कैस्टर ऑयल) : एरंड के तेल से वायु का अनुलोमन होता है और स्वास्थ्य अच्छा होता है।

३) तिल तेल: विशेषकर इस ऋतु में लोकाचार में बहुत तली चीजें खाने का प्रचलन है, जैसे पकोड़े भज्जी आदि। इस ऋतु में आप यदि तले पदार्थ खाते हैं तो अच्छा लगता है क्योंकि वर्षा के कारण शरीर रुक्ष हो जाता है और तेल खाने से शरीर को स्निग्धता मिलती है। इस ऋतु में वात बढ़ जाता है जिससे रुक्षता बढ़ जाती है। यदि आप तेल के व्यंजन खाते हैं तो याद रखें इस समय सबसे अच्छा तेल है तिल तेल! चरक सूत्र में बताया गया है “तिल तैलं स्थावरजातानां स्नेहानाम्”, सभी प्रकार के स्थावर स्नेह हैं, उनमें तिल तेल सबसे अच्छा है । अर्थात इस समय जो पूरे शरीर में स्नेहन या ऑइलिंग होनी चाहिए, वह तिल का तेल कर देगा। तो तिल के तेल में बनाई वस्तुओं का सेवन करें।

४) भारी वस्तुएं ना खाएं।

५) दूध का सेवन कम करें।

६)  सादा आहार करें।

७) बासी भोजन बिल्कुल ना करें। रात का सुबह दोपहर का रात को ना खाएं इससे पाचन शक्ति मंद हो जाएगी, अग्नि मंद हो जाएगी, ऐसा ना करें।

ऐसा करने से आपका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।

मानसिक स्वास्थ्य के लिए, अध्यात्म की साधना के लिए यह दो महीने बहुत ही अच्छे हैं। इस समय में एक ही स्थान पर रहे अर्थात् भ्रमण यात्रा ना करें।  सामान्य रूप से आहार-विहार करें और चिंतन, मनन, ग्रंथ-अध्ययन अधिक से अधिक करें। चातुर्मास आरंभ हो गया है, उसका पूरा लाभ उठाएं और अपना ध्यान रखें।

ऋतुसम्यक आहार-विहार

ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन का आदी होने को ऋतुसात्मय कहते हैं । यदि कोई बाहरी वातावरण में परिवर्तन के अनुसार आहार और जीवन शैली या गतिविधियों को संशोधित (adjust or modify) कर सकता है, तो वह अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण प्राप्त कर सकता है – ऐसा चरक बताते हैं ।

तस्याशिताद्यादाहाराद्बलं वर्णश्च वर्धते| यस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्||

जो व्यक्ति ऋतुसात्मय को, ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन के आदी होने के बारे में जानता है, ऐसी आदतों का समय पर अभ्यास करता है, और जिसके आहार में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ होते हैं, उसका बल और ऊर्जा-आभा बढ़ जाती है, और वह एक स्वस्थ, लंबा जीवन जीता है।

‘रामात् नास्ति श्रेष्ठ:’ ‘शक्तिक्रीडा जगत सर्वम्’ – संस्कृत भाषा का आध्यात्मिक संबंध

कल की राम मंदिर की सुंदर घटना के समय जो लेख मैं लिख रही थी, वह वैसे तो अपने लिए था, “नोट्स टू सेल्फ” की तरह किंतु मंदिर के अनुभव के बाद लगा कि सबसे साझा करूं। क्योंकि जो उन अम्मा ने अंत में कहा, एक तरह से वही तो विश्लेषण के रूप में मैं लिख रही थी, जब वो आयी थीं।

(सूचना: विचारों का तंतुजाल जटिल हो सकता है, किंतु इसे सरल शब्दों में परिवर्तित करने की कोई मंशा नहीं है ☺️।)

‘रामात् नास्ति श्रेष्ठ:’ तथा ‘शक्तिक्रीडा जगत सर्वम्’ इन दोनों वाक्यों का संस्कृत भाषा के सन्दर्भ मे एक विशेष आध्यात्मिक संबंध है।

संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है, ये तो हमने कई बार सुना है। इसका बंधारण (व्याकरण) विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, जिस कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में इसका जड़ों के स्तर पर प्रयोग हो रहा है। किन्तु इस वैज्ञानिकता के साथ-साथ संस्कृत के बंधारण में आध्यात्म और सृष्टि की रचना के चक्र का जो रहस्य बुना है, वह जैसे प्रकट हुआ मन में! उसे ही मैंने शब्द देने का प्रयास किया है।

संस्कृत की वैज्ञानिकता क्या है ?

पहला तो यह शब्दों या मंत्र के रूप में, ध्वनि तरंगों के द्वारा हमारे स्थूल शरीर में जैविक और रासायनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है, जो हमारे स्वास्थ्य से और मस्तिष्क की गतिविधि से सीधा सीधा संबंध रखती है। और दूसरा इस के पदों के अर्थ को समझकर उससे, मन में प्रस्तुत-परंतु-प्रायः-सुषुप्त अध्यात्म का विकास भी होता है। संस्कृत मनुष्य को अध्यात्म की ओर उसके जीवन चक्र के लक्ष्य की ओर ले जाती है।

संस्कृत की वैज्ञानिकता में अध्यात्म कैसे बुना है?

“रामात् नास्ति श्रेष्ठ:” इस वाक्य का प्रयोग तीन विषयों में उपमा-संकेत के लिए किया जाता है :

१) मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र और उनके कुशल राजतंत्र (रामराज्य) के कारण

२) आर्युवेद के अध्ययन मे

३) संस्कृत भाषा के अध्ययन , पाठन में

तकनीकी विश्लेषण:

संस्कृत में राम शब्द का परिचय “अकारांत पुल्लिंग राम शब्द” इस प्रकार से दिया जाता है। राम शब्द रम् धातु से बना है। रम् धातु का अर्थ है क्रीडा करना, उसमें घञ् प्रत्यय, उपधावृद्धि होकर- राम- यह कृदंत शब्द सिद्ध हुआ और कृदंत होने से प्रातिपदिक हुआ, अर्थात् अर्थवान हुआ, सार्थक हुआ। सुप् और तिङ् प्रत्याहार में आने वाले प्रत्ययों को विभक्ति कहते हैं। प्रातिपदिक (सार्थक शब्द) को विभक्ति की प्राप्ति होती है, इन दोनों के संयोग से जो परिणाम प्राप्त हुआ उसे पद कहते हैं।

विभक्तियाँ सात होती हैं जिन्हें हम क्रमशः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी (तथा संबोधन) कहते हैं। इनके नाम क्रमशः कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, संबंध अधिकरण तथा संबोधन हैं।

आध्यात्मिक विश्लेषण:

राम का अर्थ है “रमन्ते योगिनोऽस्मिन्” – योगी जिसने रमण करते हैं, यानि परम तत्व या ईश्वर। ‘शक्ति क्रीडा जगत् सर्वम्’ का अर्थ है यह सारा जगत शक्ति का खेल है अर्थात् माया चक्र है जिसमें सब जीव क्रीडा का भाग हैं। राम प्रातिपदिक अर्थात् सार्थक है, परम तत्व है जिसमें योगी रमण करते हैं। सार्थक को (परम तत्व को) शक्ति से विभक्ति की प्राप्ति हुई। विभक्ति अर्थात विभाजन। यह विभाजन शक्ति के द्वारा हुआ, शक्ति अर्थात् वह क्रीडा(माया) जिसमें योगी रमण करते हैं। तो राम शक्ति (प्रकृति) से विभक्त होकर सात रूपों में सिद्ध हैं, जो सात विभक्तियाँ हैं। राम ही कर्ता हैं; राम ही कर्म हैं; राम ही करण हैं साधन हैं, उनके ही द्वारा सब कुछ है; राम संप्रदान हैं अर्थात् सब कुछ राम के लिए है; राम से अलग होकर, अपादान कर; राम के ही सम्बन्ध से सब पुनः राम के अधिकरण में, उसके अधिकार में आ जाते हैं और शक्ति क्रीडा का चक्र पूर्ण होता है। जिस नाम को एक बार (एक वचन), एक बार और (द्विवचन), बहुत बार (बहुवचन) पुकारने की इच्छा होती है, संबोधन की विवक्षा होती है, वह है = राम!

सार्थक प्रातिपदिक राम की अर्थात् परम अणु की, शक्ति से कई अणुओं में विभक्ति हुई, किंतु परमाणु फिर भी पूर्ण ही रहा।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

यह, वह सब पूर्ण है, पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है। पूर्ण में से पूर्ण लेकर भी पूर्ण ही शेष रहता है।

और अंत में, रामरक्षा स्तोत्र के इस छंद में राम के सारे रूप (विभक्तियाँ) एक साथ उपस्थित हैं। विद्यार्थियों, विशेषकर बाल विद्यार्थियों के लिये एक साथ सरलता से सारी विभक्तियाँ स्मरण करने के लिये ये श्लोक स्मरण कर लेना सर्वोत्तम युक्ति है :

“रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥”

यात्रा जारी है….

मास्टरस्ट्रोक ! पर किसका..?

सावधान ! कृपया पहचानें कि किसका मास्टरस्ट्रोक आज सोशल मीडिया पर बड़ी अच्छी तरह चल रहा है।
मुँह नीचे करके तितर बितर हो जाएँ या एकजुट खड़े रहें?

आज का मूडी जी का मास्टरस्ट्रोक : जागो हिन्दू जागो

हैश्टैग “टेक द फ़ाइट टू द स्ट्रीट्स”

👆गहन चिंतन करें और समझें।

आज की नूपुर शर्मा की घटना अप्रत्याशित है। क्षुब्ध नहीं हूँ क्योंकि एक सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी को सनातन का न तो रक्षक मानती हूँ न ही तारनहार।

किसी से उसकी क्षमता से अधिक आशा बांधेंगे तो ठेस अधिक लगेगी ही।

सावधान ! कृपया पहचानें कि किसका मास्टरस्ट्रोक आज सोशल मीडिया पर बड़ी अच्छी तरह चल रहा है – जो सामान्य जन का एकजुट होना शुरू होता दिख रहा था (आभासी दुनिया में ही सही) वो आज ही छिन्न भिन्न हो रहा है। अधिकतर कह रहे हैं कि अपने आप और केवल अपने जीवन-जीविका पर ध्यान दो, हिंदू राष्ट्र के आशावाद ने अचानक मुँह फेर लिया आज। राष्ट्रत्व और अपने सामूहिक अस्तित्व के प्रति उदासीन और बँटा हुआ हिंदू ही उन राक्षसों को शक्ति है।

इस एक ही पासे से लकड़ी खाने वाले मकड़े ने रत्ती रत्ती लकड़ा खाते हुए आज उस भाग को खा डाला जी जगह से एक सशक्त शाखा निकली हुई थी।

इस गणित की पहेली जो आज की घटना के, हिन्दू राष्ट्र के संदर्भ में सुलझाइए और पहचानिये कि लकड़ी कौन है, मकड़ा कौन, रत्ती रत्ती खाई जाने वाला पदार्थ क्या है और कितने दिन लगेंगे लकड़े को समाप्त होने मेंः

अस्सी मन का लकड़ा, उस पर बैठा मकड़ा, रत्ती रत्ती खाये तो कितने दिन में खाये।

राष्ट्रवादी उपभोक्ता बनेंगे ?

राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में समर्थ होना चाहेंगे या असमर्थ रहना चाहेंगे ?

आपने शायद वो विडिओ देखा होगा चीन का मनी ट्रैप – यानि उसके पैसे के जाल के बारे में। कैसे चीन पहले सहायता के लिये लोन देता है और देशों के वापस ना चुकाने पर धीरे धीरे उस देश के संसाधनों और स्थानों तक पर अपना कानूनी रूप से वैध अधिकार कर लेता है। धीरे-धीरे कई देशों में ऐसा कर रहा है और अपने सिल्क-रूट पर कार्य कर रहा है। हम ये सोच कर खुश हो जाते हैं कि भारत की ऐसी स्थिति नहीं है तो हम सुरक्षित हैं । क्योंकि मोदी जी अन्य देशों के साथ सफल सामरिक व कूटनैतिक संबंधों के द्वारा सिल्क-रूट के षड्यन्त्र से भली-भाँति निबट रहे हैं, हम सुरक्षित हैं । बड़े बड़े सुरक्षा और आधारभूत इन्फ्रस्ट्रक्चर की वस्तुओं के भारत में निर्माण से हमें बल मिलता है, उसकी ओर सकारात्मक कदम बढ़ रहे हैं, इसलिए हम सुरक्षित हैं।
केवल इतना ही सोचकर निश्चिंत ना हो जाईये ! हम में से प्रत्येक का जो दायित्व है, राष्ट्रधर्म है उसका हम सबको अपने अपने स्तर पर ही पालन करना है। आप और हम उसमें कहाँ आते हैं, ये समझना चाहिए।
क्योंकि भारत बाकी देशों जैसा नहीं है, इसीलिए भारत के लिये चीन की रणनीति भी बाकी देशों जैसी नहीं है । उसका एक पक्ष ये है कि उसे भारत का आर्थिक नियंत्रण नहीं प्राप्त करना बल्कि उसे आर्थिक रूप से दुर्बल करना है, अस्थिर करना है, आर्थिक अराजकता फैलानी है।
यहाँ आर्थिक निर्भरता बनाने के लिये उसकी भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या पर निवेश का रास्ता लिया है। भारत के बाजार कर दोधारी निशाना है – एक फुटकर बाजार जिसे आप और हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं और दूसरा स्टार्ट-अप में निवेश । दोनों जगह दृष्टि में आए ऐसे बड़े बड़े नाम उसका लक्ष्य नहीं है, अपितु उसका लक्ष्य है साधारण उपभोक्ता-आप और हम! उपभोक्ता बाजार में ‘मेड इन चाइना’ को तो हम जानते ही हैं। बीच-बीच में ‘स्वदेशी ही लो’ की हवा चलती है किन्तु अंततः साधारण भारतीय उपभोक्ता सस्ता होने के कारण और सुलभता से उपलब्ध होने के कारण अभी भी अधिकतर चीन का बना सामान ही प्रयोग कर रहा है। ट्विटर की जागरूकता बहुत ही छोटे स्तर की होती है, उसे पूरे भारत का व्यवहार और उत्तर समझने की भूल हम ना करें तो अच्छा। फुटकर व्यापारी चीन के बने उत्पाद बहुत सरलता से, अत्यधिक उधार पर प्राप्त कर सकते हैं अतः धीरे-धीरे गोली-टॉफी तक यहाँ बनाना छोड़कर वही से आयात करने लगे हैं । हम सबको अपने परफेक्ट घर के परफेक्ट मंदिर में परफेक्ट मूर्ति चाहिए तो दीपावली पर एकदम समकोणीय सुंदर दिखने वाली लक्ष्मी-गणेश ही आते हैं जो पास के बाजार में मिल जाए। ट्विटर के फोटो-ओप में मिट्टी का सामान बनाने वाले या बेचने वाले से ही अंततः विसर्जन करने के लिये लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं लेने के आह्वान सीमित होते हैं; व्यापक स्तर पर बाजार में क्या उपलब्ध है और लोग क्या ले रहे हैं, एक दृष्टि डालने पर दिख जाता है। ये तो हमारी संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव की बात है, साधारण जीवन की मूल आवश्यकताओं के साधनों और उत्पादों के तो असंख्य उदाहरण हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार-नियमों के चलते सरकार एक सीमा के बाद इस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, लेकिन चीन को रोकने की पूरी आशा हम केवल सरकार/शासन से रखते हैं । फुटकर व्यापारी थोक विक्रेता का ग्राहक है और थोक विक्रेता चीन की महा-थोक, सस्ती और निरंतर आपूर्ति का। फुटकर और थोक व्यापारी की अधिक से अधिक लाभ कमाने की मूलभूल अपेक्षा है। वो अपना लाभ की मात्रा में कोई कमी नहीं चाहते और उपभोक्ता के रूप में हमें सबसे सस्ता और घर के बगल वाली दुकान में मिलने वाला सामान ही चाहिए।
उसी प्रकार वैसे तो स्टार्ट-अप के जगत में बहुत सारा विदेशी निवेश लगता है और चीन के निवेश की पूँजी छोटी लगती है – कुछ ६-७ बिलियन अमरीकी डॉलर ! कहा जाता है कि सरकार के लगाए प्रतिबंधों के बाद तो इस निवेश में और भी कमी आई है क्योंकि स्टार्ट-अप अन्य विदेशी निवेशकों से और भारत में से ही बहुत धन इकट्ठा कर ले रहे हैं। केवल बड़े-बड़े कुछ स्टार्ट-अप में चीन का पैसा लगा है (2020 में भारत के 24 में से 17 यूनीकॉर्न्स में चीन का प्रत्यक्ष निवेश था जिसमें अलीबाबा और टेनसेंट मुख्य थे, एन्ट फाइनैन्शल अलीबाबा की ही सहबद्ध कंपनी है)। आज byju, zomato जैसे कुछ का उदाहरण दे कर बताया जाता है कि चीन का निवेश भ्रम है, इन्होंने कितनी तेजी से चीन के निवेश से अपनी निर्भरता हटा ली और हम मान लेते हैं कि ऐसा ही है । जिन जिन प्रकाशन समूहों में ये बताते हुए आलेख-आर्टिकल आते हैं उनके नाम देखिएगा कभी। भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भ्रष्टाचार से ग्रसित है, ये हम केवल राजनैतिक चर्चाएं करते समय ध्यान में रखते हैं लेकिन ऐसे बिजनस आर्टिकल पढ़ते समय भूल जाते हैं। लेकिन छोटे-छोटे कितने ही स्टार्ट-अप की निवेश की पहली पसंद या विकल्प कोई चीनी निवेशक या निवेश कंपनी ही होती है। बहुत से ऐसे लोगों को निजी रूप से जानती हूँ।
परोक्ष रूप से चीन क्या कर रहा है और किस प्रकार अमेरिका में वेन्चर केपिटल कंपनियाँ बना के छद्म वेश में निवेश कर रहा है, ये भी कम ही लोग जानते हैं। ट्रम्प के शासन तंत्र ने बहुत सी ऐसी कंपनियों को बंद किया, उन के दाँत कुंद किये, तो व्यापार जगत ने बहुत भर्त्सना करी (र.र. शब्द का प्रयोग करने का बड़ा मन है यहाँ!) । वहाँ भी ‘करेला, वो भी नीम चढ़ा’ तब हो जाता है जब सारी व्यापारी दुनिया कहती है (भारत की विशेष रूप से) कि राजनीति और व्यापार को अलग रखना चाहिए। कदाचित उसका निहित आर्थिक स्वार्थ इतना अधिक है कि ये समझ नहीं पाती कि चीन का हर कदम वैश्विक राजनीति से प्रेरित है। जैक मा (की कंपनी अलीबाबा) ने भारत में निवेश को केवल व्यापारिक दृष्टि से नाप-तोल कर विवेकपूर्ण व्यवहार करना शुरू किया और अपने देश में भी शासन से अलग आर्थिक स्वावलंबन की राह पर चलने का प्रयास किया तो, एक दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी कंपनी को रातों-रात क्या बना दिया गया !और जैक मा ऐसे अंतर्ध्यान हुये कि कभी-कभी ही कहीं-कहीं ही दिखते हैं अब!
पेटीएम का उदाहरण देखिए। एक भारतीय के विचार और प्रयास पर चीन ने भरपूर पैसा लगाया । सबसे अधिक प्रचलित हुआ, उपभोक्ता ने हाथोंहाथ लिया । सरकार ने भी विमुद्रीकरण लागू होने पर उसका लाभ लिया और जनता ने भी । धीरे-धीरे प्रकल्प सफेद हाथी बन गया । अब चंद्रशेखर जी का राष्ट्रीय स्वावलंबन जागा या आत्मनिर्भरता का भाव अथवा कोश के खाली होने और निवेशकों के हाथ खींचने की स्थिति बन गई – जिस भी वजह से, आईपीओ आया… और लगभग मुँह के बल ही गिरा। भारत के फुटकर उपभोक्ता ने जरूरत के समय उसका बहुत लाभ लिया पर जब निवेशक के रूप में आया तो बोला “ नहीं भाई, ओवरप्राइस्ड है, कोई फायदा नहीं, मत-लो/बेचो !” भारत में ही बने, भारतीयों के लिये ही बने एक उत्पाद को बनाए रखने के लिये भी राष्ट्रीयता नहीं, निजी लाभ ही मुख्य बन गया । ये केवल एक उदाहरण दिया यहाँ !
ऐसे ही अवसर चीन पूरी मेहनत से, समय लगा के, बुन-बुनकर आपके सामने परोसता रहा है और रहेगा। और हम जब तक हमारी अपनी निजता को बहुत छोटा और प्रभावहीन मानते हुए, अपने नित्य जीवन और राष्ट्रीयता को दो अलग अलग पदार्थ मानते रहेंगे, सुख और हित में से सुख को चुनते रहेंगे, तब तक ठगे जाते रहेंगे और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में असमर्थ रहेंगे।

अम्मा

माँ

नोवेम्बर 1938 – अगस्त 2020

अम्मा चली गयीं। उनकी आत्मा अब दिवंगत हो गई। ईश्वर की शरण में है। जीवन चक्र का एक वृत्त पूर्ण हुआ।

ये अच्छी तरह पता है, लेकिन माँ का रूप तो वही देखा जाना, जो इस जीवनमें था। आत्मा की यात्रा की जानकारी उनके अब अचानक से न होने दुख, ख़ालीपन, कष्ट और अवसाद को कम नहीं कर पा रही। धीरे धीरे उनके जाने के दिन के एक-एक दिन पीछे होते जाने से ये अनुभव स्मृति में परिवर्तित होना आरंभ हुआ है पर यही जीवन भर की स्मृतियाँ एक विद्युत तरंग की तरह आती हैं और हाथ पैर सुन्न कर जाती हैं, एक ही जगह पर जड़ खड़े कर जाती हैं।

ईश्वर की कृपा से आपस में प्रेम से जुड़े घर परिवार की ‘जगत मामी’ ने प्रत्येक व्यक्ति जीवन को छुआ है। कोरोना के समय में भी जो अपने को उनके अंतिम दर्शन लेने से नहीं रोक पाए, उन सभी व्यक्तियों में एक भी, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसने उनसे कुछ सीखा ना हो, उनके हाथ का बना कुछ फ़ेवरेट खाया हो या उनके हाथ से बना कुछ पहना न हो। अनगिनत स्मृतियाँ..सबकी..

कोई शोक के आता है तो कभी बात कर पाती हूँ, कभी नहीं कर पाती। लगा था, लिख कर मन का सार शब्दों में आ पाएगा। पर यह असीम ईश्वर का अंश, जिसे हम माँ के रूप में जानते हैं, शब्दों से बहुत परे है।

कितने रूप मन में, मस्तिष्क में एक साथ घूम रहे हैं।

वो वाली अम्मा, जिसकी पहली लिखाई उनकी काली डायरी में देखी जो वो बच्चों की तोते भाई वाली कविता थी, या वो वाली जिनकी आख़िरी लिखाई स्वस्तिक के आकार में लिखा राम-नाम था।

वो वाली माँ जो एकता कपूर के अधिकतर धारावाहिक बड़े रस से देखती थीं, या वो वाली जो एक बार में विस्तृत श्रीमद्भागवतम पढ़ गईं थीं।

वो वाली माँ जो हाथ के पंखे, झाड़ू से पिटाई करती थीं, या वो वाली माँ जिसने अपनी बेटी की नाक इसलिए नहीं छिदाई थी क्योंकि उससे दर्द बहुत होता है।

वो वाली माँ जो सारे स्कूल जीवन में बेटी को अकेले पैदल आने-जाने की आदत डालती थीं या वो वाली जो ऑफ़िस की कैब से भी घर पहुँचने तक गेट पर ही टहलती रहती थीं।

वो वाली माँ जो परिवार की सभी बहुओं को सूने हाथ रखने पर बहुत डाँटती थीं, या वो वाली जो पापा के जाने के बाद कभी पिक्चर देखने हॉल में नहीं गयीं।

वो वाली माँ जिसे सारा जीवन स्वावलंबी व दौड़ता फिरता देखा, जिन्हें नानाजी उनसे 8 साल बड़े मामाजी के पीछे भगाते थे, या वो वाली जो ICU की मशीनों के तारों, अपने अंदर गयीं नलियों में घिरी, धीरे धीरे शारीरिक कष्ट से अचेतन होती इसलिए भावशून्य मुख लिए थी कि उनके चेहरे पर कष्ट देखकर उनके बेटे को असह्य कष्ट हो रहा था।

वो वाली माँ जिसकी कभी कभी चिंता होती थी कि कैसे अपनी गृहस्थी का,पुत्र का मोह छोड़ सकेंगी, या वो वाली जिन्होंने तीन दिन में अपनी जिजीविषा समेट ली और वेंटिलेटर पर भी अपनी हृदय गति रोक कर, बाहर के बल से एक श्वास भी स्वीकार नहीं करी।

उनके जाने के दुःख को बता नहीं सकती लेकिन अम्बे माँ ने उन्हें अपनी शरण में लिया और उनका ध्यान करने पर गले तक भरी हुई संतुष्टि का आभास देकर जो ममता भरी सांत्वना दी, वही आगे जीवन का संबल है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

मेरा गीता पथ

गीता जयंती के अवसर पर अनेक गहन लेख, विश्लेषण कई विद्वानों ने आज साझा किये। मेरा तो साधारण सा लगने वाला मेरा असाधारण अनुभव, साझा कर रही हूँ।

गीता विश्व की सर्वाधिक अनुवादित पुस्तक है। गीता प्रेस, गोरखपुर का गीता की प्रतियाँ छापने का विश्व रिकॉर्ड है। सबसे प्रिय व प्रचलित ग्रंथों में से एक है भगवद्गीता! आज गीता-जयंती है, मोक्षा एकादशी – मार्ग शीष शुक्ल एकादशी!

अनेक गहन लेख, विश्लेषण आज देखने और पढ़ने को मिले। 

दो वर्ष पहले तक मुझे कुछ नहीं पता था गीता जयंती के बारे में और गीता की बारे में केवल जानकारी थी। कितने योग हैं, प्रत्येक का क्या संदेश है, भीम के शंख का नाम क्या है, ईश्वर को कौन प्रिय है, निष्काम कर्म के सोपान क्या हैं – कुछ नहीं पता था।

घर में चार या पाँच गीता, अलग अलग रूपों में होने पर भी, पूरी एक बार भी पढ़ी नहीं थी। अनुवाद तो बाद की बात है, मूल संस्कृत के श्लोक भी गिने-चुने थे जो पता थे या कंठस्थ थे ( बी आर चोपड़ा का धन्यवाद)। जर्मनी, ब्लैक फारेस्ट घूमने गयी थी और वहां के एक छोटे से गाँव जैसी जगह में मुझे एक इस्कॉन के जर्मन व्यक्ति ने भगवद्गीता की अंग्रेजी अनुवाद की प्रति पकड़ाई थी और कहा था कि वह वृंदावन जाने के लिए प्रतीक्षारत है। उस दिन अपने आप को पहली बार गीता न पढ़ी होने के लिए धिक्कारा था।

उसके बाद घर आ कर कितनी बार नियम बनाने का प्रयत्न किया कि नित्य एक श्लोक पढ़ने से तो आरम्भ करें पर हुआ ही नहीं। बस एक इंग्लिश अनुवाद वाली और एक गीता प्रेस की छोटी गुटका living room में रखी रहती थीं। उसे पूजा के समय नित्य पढ़ने का प्रयास किया, ‘कॉफ़ी टेबल बुक’ की तरह पढ़ने का प्रयास किया, ऑफिस आते-जाते पढ़ने का नियम बनाने का प्रयास किया पर प्रथम अध्याय के 8-10 श्लोकों से आगे किसी अवस्था में आगे नहीं बढ़ पाई। फिर सोचा पहले अच्छे से संस्कृत का पुनरावर्तन (revision) कर लूँ फिर गति से और सरलता से पढ़ ली जाएगी। पुस्तक से स्वयं पढ़ना आरम्भ किया क्योंकि लगता था दसवीं तक पढ़ी है तो उतना तक पहुँचे आगे की पास की एक वेद शाला में पढ़ लेंगे (पुणे में घर के पास मठ है वहाँ वेद शाला चलती है)। स्कूल वाला पुनरावर्तन भी न हो पाया, वेद शाला तो क्या ही जाते। इन सब में कुछ दो साल निकल गये।

पिछले वर्ष मैं गुरकुल में अंतः वासी बनने के बाद से चौथा गेयर लग गया! प्रतिदिन पहले शिक्षा सत्र में बच्चे गीता के दो अध्याय अवश्य पढ़ते हैं और एक संध्या समय। जिस समय मैं आयी तो तीसरा और पंद्रहवाँ प्रातः और पहला अध्याय संध्या समय चल रहा था। इतनी संस्कृत तो पढ़नी आती थी कि क्या लिखा है पढ़ लेते थे और बच्चों के साथ साथ गुरूमाँ से सुनकर उच्चारण की अशुद्धियाँ भी ठीक कर लीं। आते जाते गुरु जी कुछ त्रुटि ठीक कराते रहते थे। एक मास में बच्चों को तो तीनों पाठ कंठस्थ हो गए और मुझे त्रुटि रहित पढ़ने का अभ्यास हो गया। मोबाइल से अधिक गीता कहाँ रखी है इसका ध्यान होता था (सबकी अपनी अपनी प्रति है यहाँ)। अनुभव तो कर लिया पर एक बार किसी अतिथि से गुरुमाँ को कहते सुना तो आभास हुआ की गीता तो गुरुकुल में एक विषय है, नियम से नित्य व पूरी गंभीरता से पढ़ा जाने वाला और जीवन शैली भी।

गुरु माँ को 13 वर्ष की आयु से पूरी गीता कंठस्थ है। किसी भी अध्याय से कोई भी श्लोक, उसका कोई भी पद (एक अनुष्टुप छंद श्लोक में चार पद होते हैं) कभी भी पूछ लीजिये। उससे भी अधिक उसका दिनचर्या में कभी भी प्रयोग दृष्टांत के रूप में, कभी बच्चों से उनकी स्मृति परखने के बहाने, जो बच्चों ने याद कर लिया है उसमें से, कुछ भी पूछ लेना – बहुत सहजता से आता है उनके व्यक्तित्व में। उन्हें याद कराने के लिए तरह तरह से श्लोकों को लिखने का ग्रह कार्य मिलता है, जैसे प्रत्येक अध्याय का तीसरा श्लोक लिखो। मैंने भी बच्चों के साथ ऐसा करना आरम्भ कर दिया। फिर कभी शाम को हमने गाँव वाली गीता सुनी। गाँव की गुजराती में सुनाई गीता (कुछ ही श्लोक) सुनकर, उसकी शैली और शब्द चुनाव से हँस हँस के पेट में दर्द हो गया। सच में ROFL, साँस अटकने तक हँसे थे। संजय – हनजड़ेया, धृतराष्ट्र – धरतड़या और कृष्ण – कनहड़िया थे उसमें। ये भी गुरुमाँ ने सुनाया और कुछ महीनों में जैसे जैसे समय मिला उन्होंने गीता के प्रत्येक श्लोक पर एक गुजराती गीत लिखा, बात करते करते लिखती रहती थीं वो! 700 श्लोक हैं गीता में!

गुरुजी तो गीता-दर्शन के विशारद हैं। यहाँ उनसे गीता पढ़ने कितने लोग आते हैं, सभी वर्गों से। कई जैन गुरु मुनि आदि भी आते हैं उनसे गीता व दर्शन के विशेष प्रश्नों के लिए। तब मैंने जाना कि कितने लोग कितने स्तर पर गीता को अपने जीवन से जोड़ने के लिए प्रयासरत हैं। गीता के लिए क्या-2 करते हैं। अविश्वसनीय सा था।

अब गीता नित्य जीवन में है। प्रतिदिन एक अध्याय का सस्वर वाचन करना अत्यंत सहज है अब। कितने वर्तन पूरे हो चुकें हैं एक साल में। बच्चों के साथ बदल बदलकर नित्य के तीन अध्याय पढ़ते हुए; उच्चारण की अशुद्धि सुधारते हुए; कभी शब्दों से, कभी अंतः प्रेरणा से, कभी अनुभव कर, कभी गुरुजी को सुनकर श्लोकों को समझते हुए, कब भगवद्गीता जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई है, पता नहीं चला।

पहला पड़ाव

पिछले वर्ष गीता जयंती पर युवाओं (कॉलेज के बच्चों) के लिए आयोजित गीता निबंध प्रतियोगिता के आयोजको में सम्मिलित हुई तो वो भी अविश्वसनीय सा ही था कि एक वर्ष पहले तक गीता जयंती का ही पता नहीं था और अगले वर्ष में गीता निबंध प्रतियोगिता के निबंध जांच रही थी। 800-900 निबंध आये थे और मुझे इंग्लिश के और कुछ हिंदी के निबंध जांचने थे। संस्कृत में केवल एक निबंध आया था। बच्चे अंक तालिका बनाते थे। गुजराती निबंधों की वर्तनी त्रुटि और व्याकरण त्रुटि पर दबे दबे हँसते थे कि कॉलेज के भैया-दीदी इतनी ग़लतियाँ करते हैं। पहली परीक्षा थी मेरी, गुरुजी से मैंने कहा कि मुझे तो गीता का कुछ ज्ञान नहीं है, मैं कैसे जाँच सकूँगी? वे बोले थे- “मुझे पता है आपको सही संदेश ही समझेंगे, गीता को समझने के लिए उसके एक एक श्लोक का ज्ञात होना आवश्यक नहीं है।” तार्किक बुद्धि से सोचें तो ऐसे में मुझे अहंकार आना चाहिए था, पर नहीं आया, कृतज्ञता का भाव आया। ये मेरे लिए विलक्षण अनुभव था। आत्म शुद्धि आरम्भ हो गयी थी, भगवद्गीता के कारण!

हर वर्ष यह प्रतियोगिता आयोजित करना गुरुकुल की एक परंपरा सी है। युवा गीता पढ़ें, गीता से जुड़ें इसलिए आयोजित करी जाती है। इसी बहाने हाथ में तो उठाएंगे, कुछ पृष्ठ तो पलटेंगे। 900 में से 10 तो गीता को लेकर जिज्ञासु बनेंगे। निष्काम कर्म का बहुत ही सुंदर प्रत्यक्ष उदाहरण देखा। और बच्चों ने जो लिखा था वो एक अलग ही लघु यात्रा थी, विषय था – ‘अपने अपने जीवन में गीता के कौन से संदेश, उसके किन सिद्धान्तों का पालन उन्हें सफलता दिलाएगा और कैसे’। मेरा उन सब में से प्रिय वाक्य था – “गीता मा तो बद्धू खुल्लु छे!”-गीता में तो सब कुछ खुला है :)। उस किशोरी के कहने का अर्थ था कि सभी रहस्य ईश्वर ने सरलता से उजागर कर दिए हैं गीता में।

(बड़े गुरुजी पंडित विश्वनाथ दातार शास्त्री जी ने गुरुजी मेहुलभाई आचार्य को भी गीता निबंध प्रतियोगिता द्वारा ही प्राप्त किया था। उस समय डाक से भेजे गए उनके निबंध को पढ़कर फ़ोन कर बड़े गुरुजी ने गुरुजी के पिताजी से उन्हें लेकर वाराणसी आने को कहा था और उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया था। कोई निवेदन नहीं, कोई एडमिशन की प्रक्रिया नहीं, कोई बैकग्राउंड चेक नहीं, कोई आधुनिक स्कूलों के प्रपंच नहीं! बड़े गुरुजी के बाद मेहुलभाई आचार्य अब गुरुकुल के मुख्य आचार्य हैं, विषय विशारद है। गीता, आयुर्वेद, दर्शन के सभी मुख्य ग्रंथ, उपनिषद आदि उन्हें कंठस्थ हैं और सही समय और अवसर पर उसका उपयोग उद्धरण बहुत ही सहज है उनके लिए। केवल कंठस्थ ही नहीं, आत्मसात हैं ,उसमें से सब कुछ प्रत्येक बिंदु वह समझा सकते हैं फिर भी बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं। गुरुकुल में (दो तीन स्थानों में विभक्त) 30,000 पुस्तकें/ग्रंथ शोध पत्रादि हैं। )

दूसरा पड़ाव

चार महीने पहले, अचेत अम्मा को उनके अंतिम क्षणों में पंद्रहवाँ अध्याय जब पढ़ कर सुना रही थी तो वह सुन रही थीं। ICU में तीन पेशेंट चिंताजनक स्थिति में थे परंतु डॉक्टर ने अंदर रहकर अम्मा को गीता सुनाने की अनुमति दे दी थी। अम्मा के साथ साथ वो तीनों भी पूरी सभानता से सुन रहे थे। सभी नर्सिंग स्टाफ भी काम करते हुये सुन रहा था, दोनों सीनियर डॉक्टर भी। दूसरी बार बिना एक-एक श्लोक का अर्थ जाने अनुभव हुआ कर्मयोगी की परिभाषा का। अम्मा के साथ वाले बेड पर से मुझे निर्निमेष देखती और सुनती एक युवती के आर्त भाव से रहित उसकी विवश स्थिति में श्रवण क्षमता का – जैसे गुडाकेश की रही होगी कदाचित! और अम्मा के जीवन भर के सकाम और निष्काम कर्म का आभास और उसके अंतर का विवेक अपने आप प्रकट हुआ मन में। उस दिन तीन जीवों ने ICU में देह छोड़ा था। अम्मा की स्मृति के साथ एक श्लोक अब अंकित है मानस पटल पर:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

गीता कंठस्थ अभी भी नहीं है क्योंकि स्मृति की दृढ़ता बहुत क्षीर्ण है, उसका पिछले बीस साल में बहुत ह्रास किया है। जीवन शैली, दूषित भोजन, दवाओं का प्रयोग, रोग, बहुत सारे कारण हैं। श्लोकों का शब्दार्थ से भावार्थ व अंत में निहित अर्थ और उसकी आत्मिक धारणा अभी तक पूरी नहीं है, बल्कि लगता है अभी भी शून्य ही है। किन्तु गीता की पूर्ण अनुपस्थिति से सदैव उपस्थिति में ये स्थानांतरण कैसे हुआ, सच में पता नहीं चला। और यात्रा….जारी है।

अट्ठारह पुराण – उनके नाम

अट्ठारह पुराणों के नाम कैसे याद करें?

हमारे अट्ठारह पुराण मुख्य हैं, जो हमारे इतिहास की श्रेणी में आते हैं (रामायण व महाभारत हमारे अन्य दो मुख्य ऐतिहासिक ग्रंथ हैं)।

यदि उनके नामों को जानकर ही अपने इतिहास की जानकारी को आरंभ करना चाहें और विशेषकर बच्चों को बताना चाहें तो सबसे बड़ी कठिनाई उनके नाम याद करने या रखने में आती है। अट्ठारह नाम रटने का बड़ा प्रयत्न करते हैं, पर फिर भी कोई न कोई भूल ही जाते हैं।

इन्हें सूत्र रूप में याद रखना बड़ा ही सरल है इस अनुष्टुप छंद के माध्यम से:

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।

अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्

इसे गाकर याद करेंगे तो और भी सरल होगा। गीता के (अधिकतर) श्लोकों की गायन शैली में ही इन्हें भी गाया जाता है।

मद्वयं अर्थात् दो म (से) १. मत्स्य पुराण २. मार्कण्डेय पुराण

भद्वयं अर्थात् दो भ (से) ३. भागवत् पुराण ४. भविष्य पुराण

ब्रत्रयं अर्थात् तीन ब्र (से) ५. ब्रह्म पुराण ६. ब्रह्माण्ड पुराण ७. ब्रह्मवैवर्त पुराण

वचतुष्टयम् अर्थात् चार व (से) ८. विष्णु पुराण ९. वराह पुराण १०. वामन पुराण ११. वायु पुराण (जो विष्णुपुराण के अनुसार शैव पुराण है)

से एक १२. अग्नि पुराण

ना से एक १३. नारद पुराण

से एक १४. पद्म पुराण

लिं से एक १५. लिङ्ग पुराण

से एक १६. गरुड़ पुराण

कू से एक १७. कूर्म पुराण

स्क से एक १८. स्कन्द पुराण

और अंत में इन पुराणों के सार स्वरूप ये सुभाषित है:

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी — पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

तो यदि न किया हो तो स्वयं भी याद करें और बच्चों को भी याद कराएँ। प्रतिदिन एक काम ऐसा करें जो आपके बच्चों को, चाहे वो किसी भी आयु के हों, आपके इतिहास व संस्कृति से अवगत कराए और उनके निकट ले जाए। जिस भारत को इतने गर्व से Indic civilisation कहते हैं, उसके इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम से इतर और उससे पहले बहुत बहुत कुछ है और सही अर्थ में वही हमारे भविष्य की सफलता की कुंजी है।

यात्रा जारी है….

मुराहू पण्डित का गंगा स्नान

मुराहू जी की जीवनचर्या से प्रतिचित्रण (map) कर यहाँ ये बताने का प्रयास है कि जो कुछ हम भारतीय ग्रंथों-शास्त्रों में पढ़ते हैं वह पूर्णतया प्रायोगिक है, समकालीन-अद्यतन है और उसे अपने जीवन में उतारकर कैसे व्यक्ति सुखी और स्वस्थ रह सकता है।

अभी कुछ दिन पहले @GYANDUTT ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने मुराहू पण्डित से एक लघु भेंट का ट्वीट किया। रोचक लगा! पाण्डेय जी से निवेदन किया कि उनकी जीवन व दिनचर्या की कुछ और जानकारी बटोरें। आदरणीय पाण्डेय जी ने ऐसा शीघ्र किया। उन्हें बहुत धन्यवाद! उन्होंने podcast और blog दोनों में उनसे दीर्घ जीवन के सूत्रों पर हुई चर्चा को सबसे साझा किया।

https://gyandutt.com/2021/06/18/murahu-pandit-and-longevity/ 

ये कौतूहल क्यों जागा? मैं प्रायः आयुर्वेद भारतीय शास्त्रीय जीवन, ज्ञान व दृष्टिकोण के बारे में ट्वीट करती हूँ। वो सब, जो अपने परिवर्तित जीवन मैं गुरु सानिध्य में ज्ञान पाकर, अनुभव से और प्रत्यक्ष प्रमाण से जी रही हूँ और साझा करती हूँ, उस पर, शायद उसे एक अच्छी ट्वीट/quote आदि से अधिक कुछ न समझ कर, पढ़ने/सुनने वाले विश्वास नहीं करते। और करते भी हों तो उसमें प्रस्तुत शास्त्रीय ज्ञान को अपने जीवन में उतारते हों, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। It is just good reading material ! आत्ममुग्धता के इस सामाजिक काल में, कोई निरपेक्ष होकर या तटस्थ होकर, गुरु प्राप्त व मनन किया ज्ञान, शिक्षा या जानकारी साझा करे तो उस पर विश्वास कम होता है। मुझे तो अहंकारी, opinionated, higher mortal आदि की उपाधियाँ भी मिलती रहती हैं। 

तो मुराहू उपाध्याय जी के उस संक्षित उल्लेख से भी मुझे समझ आ गया कि ये पथ्यापथ्य व आहार-विहार के सरल सिद्धातों का पालन करने वाले शुद्ध भारतीय हैं जिन तक आधुनिकता के साधनों और जीवन के नाम पर प्रचलित आलस्य, दूषण और वैचारिक भ्रष्टाचार नहीं पहुँचा है। मुराहू जी की जीवनचर्या से प्रतिचित्रण (map) कर यहाँ ये बताने का प्रयास है कि जो कुछ हम भारतीय ग्रंथों-शास्त्रों में पढ़ते हैं वह पूर्णतया प्रायोगिक है, समकालीन-अद्यतन है और उसे अपने जीवन में उतारकर कैसे व्यक्ति सुखी और स्वस्थ रह सकता है, वृद्धावस्था में भी! आधुनिक अध्ययन की तरह कुछ भी केवल जानकारी के लिए शास्त्रादि में नहीं बताया जाता है, उसे जीवन में उतारकर सीधे सीधे उससे स्वास्थ्य और आयु लाभ लिया जाता है। तो प्रस्तुत है मुराहू उपाध्याय का शास्त्रीय चित्रण:

अपनी वाणी से ही पुराहू जी बताते हैं की वह – 23 साल से रिटायर्ड हैं, सात विषय से M.A.हैं, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं, DM की बैठक में बैठते हैं और आयुर्वेदाचार्य, योगाचार्य हैं। उनके आधुनिक शिक्षा प्रणाली से प्राप्त प्रमाणपत्र तो आपको मिलेंगे, परंतु उनके आयुर्वेदाचार्य होने के नहीं। क्योंकि, उन्होंने आयुष मंत्रालय के बहुत ही उथले BAMS से नहीं अपितु किसी योग्य वैद्य अथवा गुरु से यह शिक्षा ली है, ऐसा उनके व्यक्तित्व, ज्ञान और शब्दों से प्रतीत होता है।

दुःखं समग्रं आयातं अविज्ञाने द्वयाश्रये। सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम्।। (भाव प्रकाश)

इसका अर्थ है – सारे दुख का कारण अवैज्ञानिकता का आश्रय है और सभी सुखों का कारण है विमल विज्ञान में प्रतिष्ठा। 

मुराहू पंडित का विमल विज्ञान में अपने विश्वास को प्रतिष्ठित करने का कितना सुखी परिणाम है। उनको, जो 87 वर्ष की आयु में भी 50 वालों को पानी पिला दें। वैसे भावमिश्र लिखित भाव प्रकाश का ये श्लोक आयुर्वेद का सिद्धांत कहा जाता है। और कितने की जन, विशेषकर अलोपथी डॉक्टर, आयुर्वेद को घरेलू नुस्खे और नीम-हकीमी, आधुनिक समय में प्रयोग की अनुपस्थिति आदि कह कर अपने ही अवैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। 

मुराहू जी अपने दीर्घ जीवन का सूत्र बताते हैं – भोजन कम करना, परिश्रम, व्यायाम, नियमित दिनचर्या और तनावमुक्त जीवन जीना। प्रतिदिन प्रातः साईकल से 7 किलोमीटर दूर गंगा स्नान को जाते हैं और सात किलोमीटर लौटते हैं। 

यहाँ मुराहू पण्डित आयुर्वेद के कई मुख्य/विशेष सूत्रों का क्या ही अच्छा अनुसरण करते दिखते हैं:

ब्रह्मुहूर्त जागरण: ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेत्स्वस्थो रक्षार्थमायुष:। – ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला स्वस्थ होता है, उसकी आयु की रक्षा होती है अर्थात वह दीर्घायु होता है।

गंगा स्नान: गंगाजल की महत्ता और विशेषता से अधिकतर जन परिचित हैं। एक सुभाषित इस प्रकार कहता हैं:

असारे खलु संसारे सारमेतत् चतुष्टयम्। काश्यां वासः सतांसंगः गंगास्नानं शिवार्चनम्।। – असार से इस पूरे संसार का सार इन चारों में हैं – काशी में वास, सज्जन लोगों का संग, गंगा स्नान और शिव की अर्चना!

और स्नान के योग्य स्थान के लिए मनुस्मृति बताती है: 

नदीषु देवस्थानेषु तडागेषु सर: सु च। स्नानं समाचरेनित्यं गर्त प्रस्रवणेषु च।

नदी, देवता का स्थान (तीर्थ), तालाब, सर: सु अर्थात नदी के समान जल प्रवाह, झरना, इनमें नित्य स्नान करना चाहिए। 

मुराहू जी नित्य स्नान करते हैं, गंगाजल से करते हैं और नदी पर जा कर करते हैं। सभी दिनचर्या के बताए गए आदर्शों का पालन कितनी सरलता से करते हैं और नियमित हैं। 

दिनचर्या

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी उन्हें अपने घर में अरहर के डंठल के बण्डल से झाड़ू लगाते देख उनकी ऊर्जा और जवानी (वस्तुतः उत्तम स्वास्थ्य) के कायल हो गए थे। अट्ठासी की उम्र में फिट – ऐसा स्वास्थ्य कौन नहीं चाहेगा?

अब देखिए:

समः दोष समाग्निच समधातु मलक्रिय:  प्रसन्नात्मेंद्रियमना: स्वस्थ इत्यामिधियते।। (सुश्रुत स. 15|41) 

दोषों की समता (वात, पित्त और कफ,शरीर में ये तीन दोष होते हैं), समस्त तेरह अग्नियों का समान रहना (पञ्चमहाभूताग्नि + रस रक्तादि सप्त धातु अग्नि + जठराग्नि) तथा रस रक्तादि धातुओं और विण्मूत्रस्वेदादि मलों का पोषण, धारण और निर्गमन आदि क्रियाओं का समान होना एवं आत्मा, इन्द्रिय और मन की प्रसन्नता जिसमें विद्यमान हों, उसे स्वस्थ कहा जाता है। 

मुराहू पण्डित गंगास्नान से लौटते समय गंगाजल का जरीकेन साईकल पर लटकाए लौटते हैं। रास्ते में जो भी मिलता है उसे गंगाजल का प्रसाद देते चलते हैं। रास्ते में कोई रोग ग्रस्त या अस्वस्थ व्यक्ति मिलता है तो उसे प्राकृतिक, सुलभ औषधि भी देते/बताते चलते हैं (podcast में उन्होंने रास्ते में एक महिला को अल्सर की औषधि देने की बात बताई) और कुछ दिन बीते हाल-चाल भी पूछते हैं कि व्यक्ति ठीक हुआ के नहीं!

नित्यं हिताहार विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेश्वसक्तः। दाता समः सत्यपर: क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः।।   

यही शास्त्रीय या आयुर्वेद वर्णित स्वस्थता मुराहू पण्डित में विद्यमान है। जो दीर्घ जीवन के सूत्र मुराहू जी ने बताए, वो आयुर्वेद के ग्रंथों में वस्तुतः स्वस्थ रहने की मैनुअल के रूप में वर्णित हैं!

दिनचर्यां निशाचर्यां ऋतुचर्यां यथोदितम्। आचारान् पुरुषः स्वस्थ: सदा तिष्ठति नान्यथा।। (भाव प्र. 5|13)

स्वस्थ व्यक्ति दिनचर्या रात्रिचर्या तथा ऋतुचर्या का उसी प्रकार पालन करें जिस प्रकार शास्त्रों में वर्णित किया गया है। इसका आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रहता है, उसके विपरीत आचरण करने से रोग से ग्रस्त हो जाता है। 

दिने, दिने चर्या, दिनस्य वा चर्या। दिनचर्या चरणम् चर्या। 

उभयलोकहितमाहारविहारचेष्टितामिति यावत् प्रतिदिने यतकर्तव्यम्। (अष्टांग ह. सू 2|1) – चर्या का अर्थ है चरण (आचरण), प्रतिदिन करने योग्य, प्रतिदिने की चर्या का नाम दिनचर्या है। 

निशि स्वस्थ मनास्तिष्ठेन्मौनी दण्डी सहायवान्। एवं दिनानि मे यान्तु चिंतयेदिति सर्वदा। – रात्रि चर्या में शयन से पूर्व, ,मन को सभी चिंताओं से दूर रखते हुए स्वस्थ पुरुष (व्यक्ति) मौन धारण कर धर्म चिंतन करते हुए ध्यान करें कि शेष दिन भी इसी प्रकार सुखपूर्वक व्यतीत हों। 

उत्थायोत्थाय सततं स्वस्थेनारोग्यमिच्छिता। धीमता यदनुष्ठेयं तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यते।। (सु. चि. 23|3)

आरोग्य की कामना करने वाले धीमान् पुरुष (व्यक्ति) को दिनचर्या में वर्णित कार्यों को प्रतिदिन करना चाहिए।  

दिनचर्या में आने वाने कर्तव्य (कार्य जो नियमित रूप से करने चाहियें):

  1. ब्रह्मुहूर्त जागरण – सूर्योदय से 2 घड़ी पहले उठना। निष्कर्ष- सूर्योदय से पहले उठना।
  2. उषापान: सूर्योदय से पहले खाली पेट पानी पीना। ये पानी तब पीना जब पिछली रात्रि हल्का सात्विक खाना खाने के तीन घंटे बाद सोएँ हों।
  3. मलत्याग – पेट साफ करना
  4. आचमन : मुख प्रक्षालन, कुल्ला करना
  5. दंत धावन – दाँत साफ करना
  6. जिह्वनिर्लेखन – जीभ साफ करना
  7. मुख व नेत्र प्रक्षालन – आँखें और मुँह धोना
  8. अञ्जन कर्म – आँखों में अञ्जन
  9. नस्य कर्म: नाक में नस्य डालना/ नाक की सफाई करना
  10. कवल-गणडूष – औषधियुक्त द्रव्य से कुल्ला करना
  11. धूमपान – धूप के धुएँ का सेवन करना (सिगरेट पीना नहीं)
  12. ताम्बूल सेवन – नागरवेल के पत्ते पर औषधि के कुछ घटक डालकर पान खाना (तंबाकू वाला/ लज़ीज़ पान नहीं)
  13. अभ्यंग – तेल मालिश
  14. व्यायाम – अर्ध शक्ति व्यायाम करना। अति व्यायाम न करना
  15. उद्वर्तन – उबटन लगाना, कड़वे आदि रसयुक्त द्रव्यों के चूर्ण को शरीर पर रगड़ना
  16. स्नान – ऊपर से नीचे की ओर पानी डालकर नहाना (पहले सिर, फिर कंधे, अंत में पाँव, यथा)। सिर गरम पानी से न धोना और ज्वर एवं ऋतुचर्या (menstruation) में स्नान न करना।
  17. अनुलेपन – औषधीय द्रव्यों के चूर्ण का लेपन अर्थात आयुर्वेदिक पाउडर लगाना 🙂
  18. वस्त्रधारण – ऋतु के अनुकूल और स्वच्छ (नित्य धुले हुए) वस्त्र पहनना

नित्य 14 किलोमीटर साईकल चलाना (7 किलोमीटर के बाद अंतराल लेकर)- व्यायाम:मुराहू पण्डित की दिनचर्या का एक अभिन्न अंग हैं नित्य 14 किलोमीटर साईकल चलाना। आदर्श व्यायाम करते हैं उपाध्याय जी! सुश्रुत का कथन का अनुसरण करते दिखते हैं वह, बलार्द्ध तक व्यायाम करते हैं। व्यायाम के लिए बताया गया है : बलस्यार्धेन कर्तव्यो व्यायामो हंत्यतोSन्यथ। (सु. चि. 24|27)

हित चाहने वाले स्वस्थ व्यक्तियों को सभी ऋतुओं में व्यायाम अर्धशक्ति (बलार्द्ध तक) करने का निर्देश मिलता है। व्यायाम करते हुए मनुष्य के हृदय में स्थित वायु जब मुख में आने लगे, यह बलार्द्ध समझना चाहिए। सुश्रुत के अनुसार इसके लक्षण हैं माथे पर, नासिक छिद्र में, शरीर संधि (जोड़ों), हाथों पैरों के जोड़ों, बगल आदि स्थानों में पसीना आने लगे, मुख सूख जाए, ये सभी अर्ध शक्ति के लक्षण हैं। अति व्यायाम करने से अनेक दोष व रोग उत्पन्न होते हैं। 

साईकल चलाना, दौड़ने और gymming से कहीं अच्छा व्यायाम है।चक्रमण (घूमना) श्रेष्ठ व्यायाम है, कुछ योगासनों के साथ। आजकल cardio और weight training का जो चलन है और जिसे स्वास्थ्य बनाने की निशानी माना जाता है, आयुर्वेद की दृष्टि से अति व्यायाम की श्रेणी में आता है क्योंकि इसमें अर्ध-शक्ति या बलार्द्ध के लक्षण आने पर रुकने की बजाए, इनके अति होने तक यंत्र देखकर और समय देखकर व्यायाम किया जाता है।

कम खाना अर्थात सम्यक आहार: मुराहू पण्डित भोजन कम करने को दीर्घ जीवन का सूत्र बताते हैं। कहते हैं महीने में एक बार उपवास करिए। शर्बत, मट्ठा पीजिये, टेंशन मत रखिये।

कलियुग के वैद्य कहे जाने वाले वाग्भट्ट का भगवान धन्वंतरि को दिया गया यह उत्तर, सम्यक आहार का कुंजी सूत्र है – ‘हित भुक् मित भुक् अशाक् भुक्’ – अपने हित के लिए खाने वाला अर्थात जीभ के स्वाद के लिए नहीं शरीर की आवश्यकता और अवस्था के अनुसार खाने वाला, कम अर्थात सम्यक अथवा सही मात्रा में खाने वाला और बिना (कम) सब्जी खाने वाला अर्थात अन्न/कड़धान्य खाने वाला (निरोगी है)।

चरक आहार के हितकारी या अहितकारी होने के कारण इन आठ विधानों में बताते हैं:

तत्र खलविमान्यष्टाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति: तद्यथा – प्रकृतिकरणसंयोगराशिदेश कालोपयोग संस्थोपयोक्त्रष्टमानि। (च. वि. 1|2)

यहाँ वर्णित आठ विधान, आहार के हित या अहित होने के कारण बताते हैं। इन विधानों को सम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को लाभ मिलता है, वहीं असम्यक रूप से पालन करने पर शरीर को हानि होती हैं। ये इस प्रकार हैं – प्रकृति (स्वभाव) ; करण (संस्कार); संयोग (जल सन्निकर्ष, अग्नि संयोग); राशि (मात्रा); देश; काल; उपयोक्त, उपयोग संस्था (rules of food consumption/dietetic rules)।

मुराहू पण्डित की 87 वर्ष की आयु, स्वस्थ शरीर, शिक्षित, सम्मानित, प्रसन्नचित्त, उदार, परोपकारी, निश्चिन्त, आर्थिक रूप से सुरक्षित, चिंतामुक्त नियमित जीवन – सब कुछ इस बात का सूचक है द्योतक है कि हमारे शास्त्रों में बताए गए सिद्धांत, निर्देश, युक्तियाँ और नियम, सभी अति सरलता से आचरण का भाग बनते हैं। कोई कठिन परिश्रम नहीं करना पड़ता। यही असाधारण साधारणता आदर्श भारतीय का लक्षण है। यह केवल मुराहू पण्डित द्वारा ही नहीं, हम सबके द्वारा प्राप्य है, achievable है। जैसे ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं – “आदर्श ढूंढने के लिए न तो कहीं दूर जाना होता है, न ही अति विशिष्ट कठिन तप करते व्यक्ति से कुछ करना होता है। अपने आस पास, गाँव देहात में आदर्श जीवन जीते अनेक व्यक्ति मिल जाते हैं।” भारतीयता उनमें ही जीवित है। शहर का भारतीय अब इंडियन हो गया है। प्रार्थना व निवेदन है कि पुनः भारतीय बनें।

मुराहू पण्डित सद्वृत्त में अर्थात satvik health circle में रहते हैं। सद्वृत्त आयुर्वेद का उत्कृष्ट विचार है। 

सतां सज्जनानां वृत्त व्यवहारजातं सदवृत्तम्। (च.सू. 8|17) – सदा सज्जनों के आचरणों का पालन करना, उनके बीच रहना ही सद्वृत्त है। 

सद्वृत्त पालन करने से मानसिक रोगों से बचा जाता है। सोशल मीडिया, आधुनिक धारावाहिक (हिंदी/अंग्रेजी), पिक्चर इन सभी को दुर्जनों की श्रेणी में रखा जा सकता है। 

आर्द्रसंतानता त्याग: कायवाक्चेतसां दम:। स्वार्थबुद्धि परार्थेषु पर्याप्तं इति सद्वृतम्।।

(अ.हृ.सू.2|46)

सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना (सुपात्र को), शरीर मन वाणी पर नियंत्रण रखना तथा दूसरे के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना (उन्हें अपने जैसा ही समझना) ही सद्वृत्त है।

मुराहू पण्डित को प्रणाम!

यात्रा जारी है……

विश्वगुरु राष्ट्र के नागरिकों का स्तर

किसी भी देश के उन्नत होने के, परिपक्व होने के और विश्व गुरु होने के लक्षणों में मुख्य है उसके नागरिकों की मानसिक दशा व बौद्धिक स्तर! भारत की क्या स्थिति थी? अभी क्या है?

बौद्धिक नागरिक किसी भी देश अथवा राज्य की सर्वाधिक मूल्यवान पूँजी होते हैं। केवल एक बौद्धिक वर्ग (think tank) नहीं, अपितु सभी गण\लोग जिन्हें हम ‘साधारण जन’ कहते हैं, उनकी बुद्धि का स्तर, विवेक और संतोष जब ऐसा हो कि वह जीवन दर्शन को जीते हुए निर्भीकता से राजा(सर्वोच्च पदाधिकारी) की त्रुटियों को भी इंगित कर सकें – ऐसी स्थिति, ऐसा वातावरण दर्शाता है कि एक राष्ट्र कितना सम्पन्न है,उन्नत है, विश्व गुरु है। 

ये विचार उस समय आया जब गुरुजी संस्कृत संभाषण का एक सत्र ले रहे थे। उस सत्र में उन्होंने राजा भोज की कथाओं से क्रिया का एक दृष्टांत प्रस्तुत किया। प्रायः हम राजा भोज की कथाएँ आनंद के लिए व उनके नैतिक संदेशों के कारण सुनते-सुनाते हैं। उनके राज्य की प्रजा कितनी विद्वान थी अथवा प्रजा के भाषाई बौद्धिक स्तर के बारे में कम ही चर्चा होती है।

  1. प्रजा प्रास अलंकार में बात करती है। राजा के समक्ष निर्भीकता से अपने विचार प्रकट करती है। अपने जीवन के नित्य कार्यों को संघर्ष न समझते हुए न तो अति संवेदनशील हैं, न दुखी है, न ही शारीरिक श्रम को कष्ट की संज्ञा देती हैं, अतः संतोष से जीवन-यापन करती है। इस प्रसंग से समझते हैं:

 राजा भोज ने देखा एक क्षीण सा व्यक्ति अपनी सर पर बड़ा सा और भारी गट्ठर रखे मंथर गति से जा रहा है। राजा ने संस्कृत में पूछा – “भारं न बाधति?” (भार बाधा नहीं दे रहा/नहीं लग रहा?) उस व्यक्ति ने संस्कृत में उत्तर दिया – “ भारं न बाधते राजन् यथा ‘बाधति’ बाधते।” (राजन, भार इतनी बाधा नहीं दे रहा जितना आपका ‘बाधते’ को ‘बाधति’कहना बाधा दे रहा है।)

इस प्रश्न में ‘बाध’ एक आत्मनेपदी* धातु है अतः उसका वर्तमान काल में प्रयोग करेंगे तो ‘बाधते’ कहा जाएगा। ‘बाधति’ कहने का अर्थ हुआ कि वक्ता उसे परस्मैपदी धातु समझ रहा है अतः वर्तमान काल में ‘अति’ प्रत्यय के साथ क्रियापद बना प्रयोग कर रहा है। 

*आत्मनेपदी वो धातु होती है जिसकी क्रिया का फल अपने को मिलता है और परस्मैपदी वो धातु होती है जिसकी क्रिया का फल दूसरे को मिलता है। यहाँ इस प्रश्न में उस भार की बाधा स्वयं उस व्यक्ति को मिल रही है अतः यहाँ आत्मनेपदी धातु के क्रियापद का प्रयोग होगा। 

राजा की इसी संस्कृत व्याकरण की त्रुटि को उस साधारण नागरिक ने इंगित किया। और साथ ही साथ अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करते हुए राजा को बड़ी सरलता से उत्तर दिया। अपने भार ढोने के काम से उसे कोई उलाहना नहीं थी, राजा के पूछने पर कुछ सहायता मिलने के अवसर का लाभ भी उसने कोई स्वार्थ व आलस्य जनित विचार कर नहीं लिया। प्रजा के संतोषजनक आदर्श जीवन-यापन का कितना सुंदर उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हुआ। 

  1. कवियों आदि द्वारा संस्कृत व संस्कृति प्रसार के लिए राजा भोज नाटकों का आयोजन करवाते थे। जिससे प्रजाजन सहजता से ही संस्कृत संभाषण और उसके साथ-साथ व्याकरण के नियम आदि भी सीख लेते थे। ऐसे ही एक बार वसंत ऋतु में नाटक हो रहा था। राजा भोज भी उस नाटक सभा में उपस्थित थे। वहाँ एक फटे-पुराने वस्त्र पहने, अति निर्धन दिखने वाला व्यक्ति भी नाटक देख रहा था।ठण्ड से बचने के लिए उसके पास कुछ नहीं था। उसे देख राजा को दया भी आयी और दुख भी हुआ तो उन्होंने उसकी सहायता करने के उद्देश्य से संवाद करना चाहा। राजा ने पूछा -“ शीतं कथं नीतम्?” (सर्दी कैसे जाती है/बीतती है?)

व्यक्ति ने उत्तर दिया – “रात्रौ जानु दिवा भानु कृशानु सन्ध्ययोर्भयो:। एवं शीतं मया नीतम् जानु भानु कृशानुभि:।।”  (रात में घुटने, दिन में सूर्य और दोनों संध्या समय अग्नि। ऐसे घुटनों, सूर्य और अग्नि से मेरी सर्दी बीतती है।)

यानी रात में घुटनों को छाती तक समेट कर गुमड़ी मार कर सो जाता हूँ, दिन में सूर्य की गर्मी से रक्षा होती है और दोनों संध्या काल अर्थात सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद, जिस समय सो नहीं रहे होते और सूर्य भी नहीं होता, तब आग/अलाव जलाकर सर्दी के दिन व्यतीत करता हूँ। ऐसा उस फटे कपड़े पहने व्यक्ति ने राजा को बताया।

एक प्रश्न के उत्तर में तुरंत एक अनुष्टुप छंद की रचना करी (अलंकार आप पहचानिये) और कितने संतोषजनक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए बताया की कोई कष्ट नहीं है, और ये उपाय करके उसकी शीत ऋतु व्यतीत हो जाती है। वह व्यक्ति इतना सुंदर उत्तर देकर अपने संतोष की स्थिति का व कष्ट में न होने की मनःस्थिति का सूचन राजा को देता है। राजा को समक्ष देख, उसके सहायता करने के संकेत को समझकर भी उस निर्धन व्यक्ति ने राजा से कुछ नहीं माँगा। राजा ने अवश्य यह सुनने के उपरांत उसकी साधन/दृव्य से सहायता करी। 

कोई ‘sense of entitlement’ नहीं कि मैं आपकी प्रजा हूँ और मेरी रक्षा व लालन-पालन आपका कर्तव्य/धर्म है- ऐसा कोई उलाहना राजा को नहीं दिया। कोई अपेक्षा नहीं करी क्योंकि अपने जीवन-यापन का दायित्व हर व्यक्ति पर स्वयं होता है। राजा, राज्य व समाज की परिकल्पना/ रचना अवश्य सभी व्यक्तियों के जीवन को सरल बनाने के उद्देश्य से की गयी है। परंतु वैदिक व वैज्ञानिक सिद्धांतों से स्थापित करी गयी संस्कृति में पला-बढ़ा व्यक्ति इतना सक्षम, स्वावलंबी व संतोषी (content) होता है कि अपने जीवन की परिस्थितियों में व्यग्र व उद्विग्न नहीं होता  और अपनी सहायता के लिए औरों से अपेक्षा नहीं रखता, राजा से भी नहीं। बौद्धिक स्तर पर परिपक्व होता है। और बड़ी बड़ी साहित्य की डिग्री न होने पर भी भाषा व व्याकरण (वो भी संस्कृत!) पर उसका पांडित्य अच्छा होता है। 

एक निर्धन व्यक्ति की,एक अति साधारण काम करने वाले व्यक्ति की इस परिस्थिति की आज के समय के निर्धन या ‘शोषित’ व्यक्तियों की परिस्थिति से तुलना करिये। निर्धन व्यक्ति (below poverty line) की सहायता न करने पर सरकार को निकम्मा बताया जाता है। उस व्यक्ति/व्यक्तियों से अपने पुरुषार्थ द्वारा अपनी निर्धनता को दूर करने की अपेक्षा नहीं रखी जाती। एक तरह से उन्हें दया का पात्र बनाकर पहले तो उनके आत्मसम्मान को नीचे धकेलने में हम अपना योगदान देते हैं और दूसरा अकर्मठता को बढ़ावा देते हैं। 

जीविका उपार्जन और विद्या ग्रहण में योग्यता को ताक पर रखते हुए जातिगत व सम्प्रदायगत आरक्षण के अपना अधिकार मानते हैं। वर्ण व जाति प्रथा को discriminatory बताते हैं पर जीविका उपार्जन के विभिन्न कार्यों की जातियाँ बना रखी हैं। ये काम छोटा है, नीचा है -ये काम ऊँचा है, खेती करे तो बेचारा, मज़दूरी करे तो बेचारा और ऑफिस में बैठ कर काम करे तो अच्छा। धन के आधार पर परिवहन में, brandvalue के अस्तित्व के आधार पर class की रचना तो सामाजिक कार्यसमता व योग्यतासमता के लिए बनाई गयी जाति व्यवस्था से कहीं भिन्न है और वास्तव में अति तुच्छ है। यह वाला आधुनिक caste-system हम सब के अंतर्मन और मस्तिष्क में चिन्हित हो चुका है और हम सब वैसे ही व्यवहार करते हैं। 

राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने के लिए स्वावलंबी, योग्य व बुद्धि से परिपक्व नागरिक सबके आवश्यक घटक (component) है। 

राजा भोज की अति साधारण प्रजा के यह दृष्टांत, उस समय के राष्ट्र के उन्नत स्तर, व्यक्ति की मनः स्थिति व भाषा की संपन्नता को दर्शाते हैं। उस भारत को मेरा प्रणाम!  वैसी ही सशक्त प्रजा का पुनः निर्माण हो इसके लिए हम भारतीय जीवन शैली, दृष्टिकोण, सिद्धांतों, विचार, विद्या व शिक्षा पर पूर्ण रूप से वापस आएँ ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है !!

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते।।

चाणक्यनीतिदर्पण:

जीव स्वयं ही कर्म करता है, स्वयं ही उन कर्मों के फल सुख-दुख को भोगता है, जीवन स्वयं संसार में नाना योनियों में जन्म लेता है और स्वयं पुरुषार्थ करके संसारबन्धन से छूट कर मुक्त हो जाता है।

यात्रा जारी है….