विश्वगुरु राष्ट्र के नागरिकों का स्तर

किसी भी देश के उन्नत होने के, परिपक्व होने के और विश्व गुरु होने के लक्षणों में मुख्य है उसके नागरिकों की मानसिक दशा व बौद्धिक स्तर! भारत की क्या स्थिति थी? अभी क्या है?

बौद्धिक नागरिक किसी भी देश अथवा राज्य की सर्वाधिक मूल्यवान पूँजी होते हैं। केवल एक बौद्धिक वर्ग (think tank) नहीं, अपितु सभी गण\लोग जिन्हें हम ‘साधारण जन’ कहते हैं, उनकी बुद्धि का स्तर, विवेक और संतोष जब ऐसा हो कि वह जीवन दर्शन को जीते हुए निर्भीकता से राजा(सर्वोच्च पदाधिकारी) की त्रुटियों को भी इंगित कर सकें – ऐसी स्थिति, ऐसा वातावरण दर्शाता है कि एक राष्ट्र कितना सम्पन्न है,उन्नत है, विश्व गुरु है। 

ये विचार उस समय आया जब गुरुजी संस्कृत संभाषण का एक सत्र ले रहे थे। उस सत्र में उन्होंने राजा भोज की कथाओं से क्रिया का एक दृष्टांत प्रस्तुत किया। प्रायः हम राजा भोज की कथाएँ आनंद के लिए व उनके नैतिक संदेशों के कारण सुनते-सुनाते हैं। उनके राज्य की प्रजा कितनी विद्वान थी अथवा प्रजा के भाषाई बौद्धिक स्तर के बारे में कम ही चर्चा होती है।

  1. प्रजा प्रास अलंकार में बात करती है। राजा के समक्ष निर्भीकता से अपने विचार प्रकट करती है। अपने जीवन के नित्य कार्यों को संघर्ष न समझते हुए न तो अति संवेदनशील हैं, न दुखी है, न ही शारीरिक श्रम को कष्ट की संज्ञा देती हैं, अतः संतोष से जीवन-यापन करती है। इस प्रसंग से समझते हैं:

 राजा भोज ने देखा एक क्षीण सा व्यक्ति अपनी सर पर बड़ा सा और भारी गट्ठर रखे मंथर गति से जा रहा है। राजा ने संस्कृत में पूछा – “भारं न बाधति?” (भार बाधा नहीं दे रहा/नहीं लग रहा?) उस व्यक्ति ने संस्कृत में उत्तर दिया – “ भारं न बाधते राजन् यथा ‘बाधति’ बाधते।” (राजन, भार इतनी बाधा नहीं दे रहा जितना आपका ‘बाधते’ को ‘बाधति’कहना बाधा दे रहा है।)

इस प्रश्न में ‘बाध’ एक आत्मनेपदी* धातु है अतः उसका वर्तमान काल में प्रयोग करेंगे तो ‘बाधते’ कहा जाएगा। ‘बाधति’ कहने का अर्थ हुआ कि वक्ता उसे परस्मैपदी धातु समझ रहा है अतः वर्तमान काल में ‘अति’ प्रत्यय के साथ क्रियापद बना प्रयोग कर रहा है। 

*आत्मनेपदी वो धातु होती है जिसकी क्रिया का फल अपने को मिलता है और परस्मैपदी वो धातु होती है जिसकी क्रिया का फल दूसरे को मिलता है। यहाँ इस प्रश्न में उस भार की बाधा स्वयं उस व्यक्ति को मिल रही है अतः यहाँ आत्मनेपदी धातु के क्रियापद का प्रयोग होगा। 

राजा की इसी संस्कृत व्याकरण की त्रुटि को उस साधारण नागरिक ने इंगित किया। और साथ ही साथ अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करते हुए राजा को बड़ी सरलता से उत्तर दिया। अपने भार ढोने के काम से उसे कोई उलाहना नहीं थी, राजा के पूछने पर कुछ सहायता मिलने के अवसर का लाभ भी उसने कोई स्वार्थ व आलस्य जनित विचार कर नहीं लिया। प्रजा के संतोषजनक आदर्श जीवन-यापन का कितना सुंदर उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हुआ। 

  1. कवियों आदि द्वारा संस्कृत व संस्कृति प्रसार के लिए राजा भोज नाटकों का आयोजन करवाते थे। जिससे प्रजाजन सहजता से ही संस्कृत संभाषण और उसके साथ-साथ व्याकरण के नियम आदि भी सीख लेते थे। ऐसे ही एक बार वसंत ऋतु में नाटक हो रहा था। राजा भोज भी उस नाटक सभा में उपस्थित थे। वहाँ एक फटे-पुराने वस्त्र पहने, अति निर्धन दिखने वाला व्यक्ति भी नाटक देख रहा था।ठण्ड से बचने के लिए उसके पास कुछ नहीं था। उसे देख राजा को दया भी आयी और दुख भी हुआ तो उन्होंने उसकी सहायता करने के उद्देश्य से संवाद करना चाहा। राजा ने पूछा -“ शीतं कथं नीतम्?” (सर्दी कैसे जाती है/बीतती है?)

व्यक्ति ने उत्तर दिया – “रात्रौ जानु दिवा भानु कृशानु सन्ध्ययोर्भयो:। एवं शीतं मया नीतम् जानु भानु कृशानुभि:।।”  (रात में घुटने, दिन में सूर्य और दोनों संध्या समय अग्नि। ऐसे घुटनों, सूर्य और अग्नि से मेरी सर्दी बीतती है।)

यानी रात में घुटनों को छाती तक समेट कर गुमड़ी मार कर सो जाता हूँ, दिन में सूर्य की गर्मी से रक्षा होती है और दोनों संध्या काल अर्थात सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद, जिस समय सो नहीं रहे होते और सूर्य भी नहीं होता, तब आग/अलाव जलाकर सर्दी के दिन व्यतीत करता हूँ। ऐसा उस फटे कपड़े पहने व्यक्ति ने राजा को बताया।

एक प्रश्न के उत्तर में तुरंत एक अनुष्टुप छंद की रचना करी (अलंकार आप पहचानिये) और कितने संतोषजनक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए बताया की कोई कष्ट नहीं है, और ये उपाय करके उसकी शीत ऋतु व्यतीत हो जाती है। वह व्यक्ति इतना सुंदर उत्तर देकर अपने संतोष की स्थिति का व कष्ट में न होने की मनःस्थिति का सूचन राजा को देता है। राजा को समक्ष देख, उसके सहायता करने के संकेत को समझकर भी उस निर्धन व्यक्ति ने राजा से कुछ नहीं माँगा। राजा ने अवश्य यह सुनने के उपरांत उसकी साधन/दृव्य से सहायता करी। 

कोई ‘sense of entitlement’ नहीं कि मैं आपकी प्रजा हूँ और मेरी रक्षा व लालन-पालन आपका कर्तव्य/धर्म है- ऐसा कोई उलाहना राजा को नहीं दिया। कोई अपेक्षा नहीं करी क्योंकि अपने जीवन-यापन का दायित्व हर व्यक्ति पर स्वयं होता है। राजा, राज्य व समाज की परिकल्पना/ रचना अवश्य सभी व्यक्तियों के जीवन को सरल बनाने के उद्देश्य से की गयी है। परंतु वैदिक व वैज्ञानिक सिद्धांतों से स्थापित करी गयी संस्कृति में पला-बढ़ा व्यक्ति इतना सक्षम, स्वावलंबी व संतोषी (content) होता है कि अपने जीवन की परिस्थितियों में व्यग्र व उद्विग्न नहीं होता  और अपनी सहायता के लिए औरों से अपेक्षा नहीं रखता, राजा से भी नहीं। बौद्धिक स्तर पर परिपक्व होता है। और बड़ी बड़ी साहित्य की डिग्री न होने पर भी भाषा व व्याकरण (वो भी संस्कृत!) पर उसका पांडित्य अच्छा होता है। 

एक निर्धन व्यक्ति की,एक अति साधारण काम करने वाले व्यक्ति की इस परिस्थिति की आज के समय के निर्धन या ‘शोषित’ व्यक्तियों की परिस्थिति से तुलना करिये। निर्धन व्यक्ति (below poverty line) की सहायता न करने पर सरकार को निकम्मा बताया जाता है। उस व्यक्ति/व्यक्तियों से अपने पुरुषार्थ द्वारा अपनी निर्धनता को दूर करने की अपेक्षा नहीं रखी जाती। एक तरह से उन्हें दया का पात्र बनाकर पहले तो उनके आत्मसम्मान को नीचे धकेलने में हम अपना योगदान देते हैं और दूसरा अकर्मठता को बढ़ावा देते हैं। 

जीविका उपार्जन और विद्या ग्रहण में योग्यता को ताक पर रखते हुए जातिगत व सम्प्रदायगत आरक्षण के अपना अधिकार मानते हैं। वर्ण व जाति प्रथा को discriminatory बताते हैं पर जीविका उपार्जन के विभिन्न कार्यों की जातियाँ बना रखी हैं। ये काम छोटा है, नीचा है -ये काम ऊँचा है, खेती करे तो बेचारा, मज़दूरी करे तो बेचारा और ऑफिस में बैठ कर काम करे तो अच्छा। धन के आधार पर परिवहन में, brandvalue के अस्तित्व के आधार पर class की रचना तो सामाजिक कार्यसमता व योग्यतासमता के लिए बनाई गयी जाति व्यवस्था से कहीं भिन्न है और वास्तव में अति तुच्छ है। यह वाला आधुनिक caste-system हम सब के अंतर्मन और मस्तिष्क में चिन्हित हो चुका है और हम सब वैसे ही व्यवहार करते हैं। 

राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने के लिए स्वावलंबी, योग्य व बुद्धि से परिपक्व नागरिक सबके आवश्यक घटक (component) है। 

राजा भोज की अति साधारण प्रजा के यह दृष्टांत, उस समय के राष्ट्र के उन्नत स्तर, व्यक्ति की मनः स्थिति व भाषा की संपन्नता को दर्शाते हैं। उस भारत को मेरा प्रणाम!  वैसी ही सशक्त प्रजा का पुनः निर्माण हो इसके लिए हम भारतीय जीवन शैली, दृष्टिकोण, सिद्धांतों, विचार, विद्या व शिक्षा पर पूर्ण रूप से वापस आएँ ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है !!

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते।।

चाणक्यनीतिदर्पण:

जीव स्वयं ही कर्म करता है, स्वयं ही उन कर्मों के फल सुख-दुख को भोगता है, जीवन स्वयं संसार में नाना योनियों में जन्म लेता है और स्वयं पुरुषार्थ करके संसारबन्धन से छूट कर मुक्त हो जाता है।

यात्रा जारी है….

अहिल्या की कथा और उसके सत्य के रूप!

प्राचीन अहल्या महर्षि गौतम की पत्नी थीं. इनके पिता का नाम वृद्धाश्व था। अहिल्या अत्यंत रूपवती थी। देवराज इंद्र ने गौतम का रूप धार का इनका धर्म नष्ट करना चाहा। गौतम के शाप से इंद्रा नपुंसक हो गए थे, परंतु देवताओं ने बड़े परिश्रम से मेष का पुरुषत्व ले कर इंद्रा को प्रदान किया, तभी से इंद्र का एक नाम मेशवृषण हुआ। गौतम ने अहिल्या को भी श्राप दिया। गौतम के श्राप से अहिल्या निराहार केवल वायु के आधार पर रहने लगी, सर्वदा वह पश्चात्ताप करती रहती थीं, उसका शरीर भस्म से पूर्ण था और वह समस्त प्राणियों से अदृश्य हो गयी।

 “वातभक्षा निराहारा, तपंती भस्मशायिनी। अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि।।” (रामायण)

पुनः अहल्या के प्रार्थना करने पर गौतम प्रसन्न होकर बोले, “हमारा शाप व्यर्थ नहीं हो सकता, किन्तु विष्णुरूपी रामचंद्र जब इस आश्रम में आवेंगे, तब तुम उनके चरण वंदन कर, मुक्त हो सकोगी।” विश्वामित्र के साथ जब रामचंद्र आये, तब उन लोगों ने भी अहल्या को तपस्विनी के रूप में देखा था। राम और लक्ष्मण दोनों भाइयों ने अहल्या को प्रणाम किया था और अहल्या ने भी अपने पति गौतम का वचन स्मरण कर के रामचंद्रजी का चरण वंदन किया।

“राघवौ तु तदा तस्या: पादौ जागृहतुर्मुदा। स्मरन्ती गौतमवच: प्रतिजग्राह सा हि ” (रामायण)

पद्मपुराण में लिखा है की गौतम के श्राप से अहल्या पत्थर हो गयी थीं और इंद्रा के शरीर में अनंत भाग के चिह्न हो गए थे। कुमारिल भट्ट के मत से अहल्या और इंद्रा विषयक उपाख्यान केवल रूपक हैं। अहल्या शब्द का अर्थ रात्रि हैं और इंद्र का अर्थ है सूर्य। दिन में सूर्योदय होने से रात्रि नष्ट होती है इसी घटना को ले कर उक्त उपाख्यान कल्पित हुआ है।

आज के समय में अधिकतर लोगों को जिस रूप में ये कथा या घटना ज्ञात है, वह अहल्या के पत्थर (एक वास्तविक पत्थर की शिला) होने की है। मेरी अपनी अनुभूति यह कहती है कि इसी तरह की क्षति पुराणों ने हमारे इतिहास को अनजाने में पहुँचाई है। अलंकारों व अतिशियोक्ति भरी भाषा का प्रयोग करके! पुराणों की रचना जनमानस तक ज्ञान को सुलभ रूप से पहुँचाने के लिए करी गयी थी, उसका अक्षरशः अर्थ बहुत हानि करता है।

आज जब information overload के समय में पुराण की कथा को केवल पढ़ा जाता है, उसके अर्थ, उसकी सत्यता को पूर्ण रूप से आत्मसात करने का अवकाश किसी के पास नहीं है, तो इतिहास का ऐसा ही हश्र होता है। इसका दोष क्या हम रोमिला थापर को दे सकते हैं ?

मेरी अनुभूति और समझ से अहल्या की कथा का पहला रूप या पक्ष :

जैसा की रामायण के श्लोकों से भी स्पस्ट है, अहल्या जड़ (पत्थर) नहीं हुयी थीं, वह केवल वायु के आधार पर रहने लगी थीं (पत्थर या खनिज की भाँति)। उनका शरीर भस्म से परिपूर्ण था और वह सदा पश्चाताप करती रहती थीं, तपस्विनी हो गयी थीं अर्थात संसार से पूर्णतया विमुख साधनावत् जीवन जीने लगी थीं। ये उस परिस्थिति में जब वह गौतम मुनि के गुरुकुल की गुरुमाँ थीं और उनके अचार्यपत्नी के रूप में कई दायित्व थे, जिन्हें प्रायः उन्होंने त्याग दिया था अतः वह उपस्थित सभी प्राणियों से अदृश्य हो गयी थीं। अथवा तप/योग की शक्ति से उन्होंने या गौतम मुनि ने उनके रूप का आभामंडल ऐसा कर दिया कि उनकी उपस्थिति की अनुभूति किसी को नहीं होती थी। राम-लक्ष्मण के आने पर उन्हें सुध आयी (क्योंकि वह ईश्वर का अवतार थे), गौतम मुनि आदि के साथ विमर्श हुआ और अहल्या पूर्ववत् हो गयीं।

मेरी अनुभूति और समझ से अहल्या की कथा का दूसरा पक्ष :

गौतम मुनि भारतीय न्याय शास्त्र के सर्जक हैं। वह चिंतन में इतने अधिक मग्न रहते थे कि चलते चलते गिर पड़ते थे। उनके शिष्यों की प्रार्थना पर महादेव शिव ने गौतम ऋषि के पैर में एक नेत्र दे दिया, जिसे अपने कार्य के लिए मन (इन्द्रिय संचालक) की आवश्यकता नहीं थी, इसीलिए उनका एक नाम अक्षपाद भी है।

अब इतने मग्न रहने वाले ऋषि ने जब इंद्र को अपनी पत्नी के साथ देखा तो क्या ये संभव नहीं की उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया की इंद्र मुनि रूप धर जल-पान के लिए बैठे थे अथवा उनकी पत्नी पर उनका ही रूप धरकर चेष्टाएँ कर रहे थे। न्याय शास्त्र के द्वारा सृष्टि के सूक्ष्मतम तत्वों को परिभाषित व विस्तृत करने वाले मुनि अपनी पत्नी को एक सती और पवित्र नारी के रूप में नहीं जानते होंगे?

अपने महान दार्शनिक ऋषि पति से ऐसे वचन सुनकर अहल्या जड़वत हो गयी, जबकि वह ऐसा कोई आचरण कर भी नहीं रहीं थीं। अतः उन्हें अपने ऋषि पति के शब्दों (श्राप, कठोर वचन) से इतना आघात पहुँचा कि वह फिर शिला समान हो गयीं। कुछ खाती पीती नहीं थीं। अंतःपुर में ही वास करती थीं इसलिए प्राणियों के लिए अदृश्य हो गयीं थीं। गुरुमाँ के अपने सभी धर्म और कर्म व दायित्व त्याग दिए क्योंकि वह इतनी आहत हो गयीं के एकांतवास में चली गयीं। गुरुकुल में शिष्यों की शिक्षा जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े इसलिए गौतम मुनि ने हिमालय में आश्रम स्थानांतरित कर लिया। यह कहकर की अब तो ईश्वर ही आकर अहल्या का उद्धार करेंगे। अंतर्मुखी अहल्या की तपस्या व साधना जारी रही। अंततः जब राम-लक्ष्मण वहाँ आये तो अहल्या ने उनका सावधानीपूर्वक (?) सत्कार किया, ज्ञान का आदान-प्रदान हुआ जिससे सब संतुष्ट हुये। जिसके पश्चात अहल्या अपने पूर्ववत जीवन में आयीं, गौतम मुनि ने भी इसी आश्रम में पुनः गुरुकुल स्थापित कर आगे का जीवन व्यतीत किया। 

स्मरण रहे, अहल्या के स्थान पर आने से कुछ समय पहले ही विश्वामित्र के अयोध्या आगमन पर श्रीराम के साथ वसिष्ठ व विश्वामित्र जी का जीवन विज्ञान व दर्शन का इतना विकसित प्रश्नोत्तर हुआ था की योग-वशिष्ठ की रचना हुई, जिसे महारामायण कहा जाता है। राम की जीवन दर्शन की दृष्टि अति सूक्ष्म थी।

महाभारत शांतिपर्व, अध्याय 265 में भी गौतम के पत्नी के मर्यादा-अतिक्रमण का विचार कर उस समय से तपस्या में अवस्थित होने का विवरण है। उसके पश्चात न्याय शास्त्र की रचना हुई (मेधातिथि = गौतम)

“ मेधातिथिमहाप्राज्ञो गोतमस्तपसि स्थितः। विमृश्य तेन कालेन पत्नया: सस्थाव्यतिक्रमम्।।”  

इस प्रसंग के उपरांत तपस्यारत दोनों पति-पत्नी हुये थे, किन्तु अलग अलग स्थानों पर और प्रायः भिन्न कारणों के लिए! 

कुछ विचारणीय बिंदु:

इंद्र देवों के प्रतिनिधि और वेदों में एक प्रमुख आराध्य शक्ति हैं (या कहें थे ?)। इंद्र एक पद है, एक व्यक्ति नहीं। सूक्ष्म योनि के देवों के प्रतिनिधि की अधिकतर पौराणिक कथाएँ उन्हें शक्ति भीरु (highly insecure), स्त्री लोलुप और व्याभिचारी ही प्रदर्शित करती हैं। कृष्ण ने इंद्र की अति स्तुति और उनकी निर्भरता को कम करने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला करी। परंतु उत्तरोत्तर इंद्र का रूप चित्रण सदैव पदच्युत ही दिखता है। क्या कालांतर में इस पद की अवमानना आरंभ हुई?

अहल्या को पंच कन्या (उदाहरणीय पवित्र नारियाँ) में माना जाता है –

 “अहल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा । पंचकन्या स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ॥”

इतनी पवित्र नारी क्या जानते बूझते व्याभिचार करेगी ? उन्हें रामायण के श्लोक के अनुवाद में दुर्बुद्धि नारि और गौतम ऋषि द्वारा दुराचारिणी कहा गया लिखा जाता है, जबकि मूल श्लोक में ये शब्द नहीं प्रतीत होते। और वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, 49वाँ सर्ग के 4-5 श्लोक ऐसे हैं जिन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ने पर कई सूत्र अपने आप खुल जाते हैं।

 परंतु निम्न श्लोक ( बालकाण्ड। 49।19)

“मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनन्दन। मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात्।।”

इसमें ‘मतिं चकार दुर्मेधा’  का वास्तविक अर्थ क्या है ? 

इंद्र का नाम सहस्त्राक्ष (हज़ार आँखों वाला) तब पड़ा बताया जाता है जब उन्होंने तिलोत्तमा को नृत्य करते देखा, उनकी दृष्टि इतनी कामप्रभावित थी के उनके सारे शरीर पर आँखें उग आयीं। इस श्लोक में उसका प्रयोग प्रसंग की दृष्टि से उपयुक्त लगता है। परंतु इसी प्रसंग में गौतम मुनि के श्राप के कारण इंद्र के अंडकोषों की कथा कुछ अविश्वसनीय सी लगती है, क्या मूल रामायण में यह किसी तरह का कालांतर में किया गया दूषण तो नहीं?

यहाँ अहल्या की कथा तथा इसके दो प्रकार के पक्षों को प्रस्तुत करने का तात्पर्य था कि किसी भी पक्ष में और वाल्मीकि रामायण के श्लोकों में अहल्या पत्थर की शिला नहीं हुई थीं, शिलावत हो गयी थीं।

स्वयं विचार करिये, पौराणिक कथाओं ने क्या कुछ क्षति करी है ?

यात्रा जारी है….

आयुर्वेद की कथा – भाग 2 – चरक संहिता

चरक को भारतीय चिकित्सा विज्ञान का जनक माना जाता है।
आयुर्वेद को जानने के लिए वृद्ध-त्रयी का अभ्यास अनिवार्य है – चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम्। इस भाग में जानिए चरक संहिता के बारे में।

आयुर्वेद को जानने के लिए वृद्ध-त्रयी का अभ्यास अनिवार्य है – चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम्। वृद्ध त्रयी अर्थात वह तीन ग्रंथ जो प्राचीन ऋषि-मुनियों ने लिखे हैं। इसी प्रकार से लघु-त्रयी है, जो बाद के काल के ग्रंथ हैं – शारंगधर संहिता, माधव निदान तथा भावप्रकाश!

चरक संहिता

चरक को भारतीय चिकित्सा विज्ञान का जनक माना जाता है। पहले भाग में हमने चरक द्वारा अग्निवेश तंत्र के पुनर्गठन और सम्पादन (compilation) के बारे में बात करी थी। जिसके फलस्वरूप चरक संहिता का निर्माण हुआ। उस काल में चरक ने इतने सुव्यस्थित ग्रंथ की रचना करी।

अग्निवेशे कृते तन्त्रे, चरक: प्रति संस्कृते । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्। (च.सि.१२) अग्निवेश ने तंत्र की रचना करी परंतु चरक ने उसका प्रति संस्कार किया। यहाँ (चरक संहिता में) है तो अन्य कहीं हो सकता है, जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं मिलेगा

चरक दो प्रकार के हैं: एक परंपरा का नाम है और दूसरा ऋषि प्रकति का । उत्तम ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति भी चरक है,  उन्होंने प्रज्ञा व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया, उसका नाम भी चरक है (जैसे शंकराचार्य एक परंपरा का भी नाम है जो उनकी पीठ से चलता है और समकालीन शंकराचार्य गुरु व्यक्ति रूप भी हैं) । क्योंकि ‘चरैवेति चरैवेति’, वे अनेक स्थानों पर जाते थे, सदा चलायमान रहते थे इसलिए उनका नाम चरक पड़ा । कई जगह वर्णन है की चरक और पतंजलि, दोनों एक ही हैं। जिन्होंने योगसूत्र लिखा है, उन्होंने ही अपना एक उपनाम चरक रखा है। चरक संहिता में उनके व्यक्ति विशेष पहचान के लिए कुछ नहीं मिलता है। किन्तु  इतिहास के अनेक ग्रंथ देखे जाएँ तो ये भी पता चलता है कि वह राजा कनिष्क के यहां राजवैद्य थे। 

ये भारत की विशेषता रही है कि जो भी ग्रंथ लिखे गए वह ज्ञान को उपलब्ध ऋषियों द्वारा लिखे गए । चरक मुनि एक पारगामी बुद्धि के मुनि थे। इसीलिए चरक संहिता भी ‘अथ भूतो दयां प्रति’ अर्थात् सभी प्राणियों के प्रति दयाभाव से संकलित करी गयी।

चरक संहिता की रचना के कुछ एक हज़ार साल बाद ऋषि दृढ़वल ने उसका प्रतिसंस्कार किया । उन्होंने इसके 141 अध्याय किये। चरक पर कई विद्वानों ने, मनीषियों ने कार्य किया है। कई व्याख्याएँ जैसे चरक न्यास, जल कल्पतरु, चक्रपाणि रचित आयुर्वेददीपिका आदि बहुचर्चित हैं। प्रायः चरक संहिता पर 44 व्याख्याओं का वर्णन प्राप्त है।

ग्यारहवीं शताब्दी में चरक संहिता की सबसे प्रसिद्ध व्याख्या – आयुर्वेददीपिका – चक्रपाणि जी ने लिखी। उसी के आधार पर उन्हें चरक चतुरानन कहा जाता है। उन्होंने चरक संहिता की व्याख्या के लिए चक्रदत्त नामक ग्रंथ भी लिखा है। चक्रदत्त में आयुर्वेद का आपातकाल में (इमरजेंसी में) कैसे उपयोग हो सकता है, उसके प्रयोग बताये गये हैं। आयुर्वेद के तुरंत परिणाम देने के विवरण हैं।

इस संहिता से ज्ञान ग्रहण करने के लिए, सर्वप्रथम एक प्रज्ञावान मनीषी वैद्य के सानिध्य की, उनकी शरण की आवश्यकता होती है, जो चरक को समझा पाएँ। ग्रंथ, टीका व सम्बद्ध पुस्तकों का पठन व प्रवचन (वैद्य गुरु द्वारा) और पढ़ने की रीति – इन सबको समझने की आवश्यकता होती है।

चरक संहिता आठ स्थानों में विभक्त है: सूत्रस्थान; निदानस्थान; विमानस्थान; चिकित्सास्थान; शारीरस्थान; इन्द्रियस्थान; कल्पस्थान; और सिद्धिस्थान ।

इन स्थानों में 120 अध्याय हैं – सूत्रस्थान-30, निदानस्थान-8, विमानस्थान-8, शारीरस्थान-8, इन्द्रियस्थान-12, चिकित्सास्थान-30, कल्पस्थान-12 एवं सिद्धिस्थान-12 अध्याय।

यह संख्या 120 इसलिए है क्योंकि मनुष्य जीवन के भी 12 सोपान हैं जो उसके उत्तरोत्तर क्रम हैं।

चरक, सुश्रुत, काश्यप,हारित, भेल इन सभी संहिताओं में 120 अध्याय हैं। 120 अध्याय क्योंकि मनुष्य का आयुष्य 120 वर्ष का (या कहीं-कहीं 100 वर्ष का) माना गया है, जिसे 10-10 वर्षों के बाँटा गया है। क्रमश: प्रत्येक 10 वर्ष में एक एक गुण कम होता जाता है। मनुष्य के जीवन में से एक एक कलाएं नष्ट होती हैं। जैसे चंद्र की षोडश यानी सोलह कलाएँ होती हैं जो कृष्ण पक्ष में एक-एक करके कम होती हैं, उसी प्रकार मनुष्य शरीर से प्रत्येक 10 वर्ष में एक एक कला नष्ट/क्षरित होती है और 120 वर्ष तक शरीर के स्तर पर मनुष्य का जीवन पूर्ण हो जाता है ।

बाल्यं वृद्धि छवि मेधा तददृष्टि शुक्रविक्रमो । बुद्धि कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं दशतो रसे ।।

शारंगधर मुनि ने जीवन के 12 पड़ाव बताये हैं । प्रयेक पड़ाव 10 वर्ष का होता है। प्रत्येक 10 वर्ष में शरीर में परिवर्तन घटित होता है। इसीलिए रसायन प्रयोग का, औषधियों का बहुत महत्व बताया गया है क्योंकि उन परिवर्तनों के होने पर हम अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं, अंत समय तक टिका सकते हैं। (इस पर पंडित विश्वनाथ दातार शास्त्री जी ने गहन शोध कार्य किया है)। इसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र की विशोंतरी दशा, आयुष्य की 120 वर्ष की गणना करती है।

चरक संहिता के 120 अध्यायों में शरीर की रचना, मनो-मस्तिष्क की रचना, बुद्धि की रचना समझाने का बहुत सारा कार्य चरक मुनि ने कर दिया है जो निर्देशन केवल बुद्धत्व को प्राप्त ज्ञानी ही कर सकता है। चरकसंहिता में विषयों का यथास्थान सन्निवेश होने के कारण ही यह संहिता चिकित्साजगत में महत्त्वपूर्ण स्थान को प्राप्त है और चरक मुनि भारतीय चिकित्सा के जनक कहे जाते हैं।

चरक ने मुख्यतः काय चिकित्सा के ऊपर कार्य किया है। “काय इत्याग्निभिधीयते” – काय अर्थात शरीर की अग्नि ! आयुर्वेद का सिद्धांत है – अग्नि रक्षति रक्षितः – जो व्यक्ति अपने अंदर की अग्नि की रक्षा करता है, अग्नि उसकी रक्षा करती है। वह दीर्घायु होता है।

चरक संहिता में कहा गया है – “सर्वेपि रोगा: जायन्ते मंदे अग्नो” – सब रोग मंदाग्नि के कारण की होते हैं। पाचन की खराबी के कारण होते हैं। इसलिए अंदर की अग्नि का रक्षण करना चाहिये, उसका जतन करना चाहिये। दीपन, पाचन, अजीर्ण पर बहुत विस्तार से लिखा गया है।

चरक संहिता के आठ स्थानों में तीन स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – सूत्रस्थान, निदानस्थान और चिकित्सास्थान

सर्वप्रथम सूत्रस्थान है। सूत्र किसे कहते हैं ? ‘अल्पाक्षरं असंदिगधं सूत्रं सूत्र विदो विदु’ ये सूत्र की व्याकरण में परिभाषा है। अर्थात अक्षर थोड़े हों और अर्थ बहुत गहरे व बहुत व्यापक हों। यदि चरक संहिता के अंग्रेज़ी में अनुवाद का प्रयास करें तो कई पुस्तकें लिखी जायेंगीं क्योंकि पूरी संहिता सूत्र में लिखी गयी है। संस्कृत की किसी भी गहन बात को भी सूत्र में बताने की परंपरा रही है । अनेक प्रकार का विचार करके, संदेह न हो ऐसी असंदिग्ध रीति से बताना सूत्र का लक्षण होता है।

सूत्रस्थान में विभिन्न अध्यायों में विभक्त, आहार-विहार का, सृष्टि का, जीवन का वर्णन है। वैसे तो चरक के सूत्र इतने अमूल्य हैं कि प्रत्येक सूत्र को रत्न की तुलना दी जाती है, फिर भी पचीसवाँ और छबीसवाँ अध्याय पूर्ण रूप से जानने और पालन करने योग्य है । पचीसवाँ अध्याय यज्जःपुरुषीयोऽध्याय है। उस काल में आयुर्वेद प्राज्ञ पारगामी बुद्धि वाले साधनारत जनों की परिषद हुई, इसीलिए इसका नाम यजः पुरुषीय अध्याय है। उस परिषद में जो भी मुख्य यज्ञ पुरुष थे, उन सबके पक्ष के सूत्र उनके नाम से इस अध्याय में संग्रहित हैं। उस परिषद में मंथन हुआ, चिंतन हुआ और परिणाम स्वरूप पचीसवें और छबीसवें अध्याय के सूत्रों का गठन हुआ। इस अध्याय के सूत्रों में एक-एक द्रव्य के महत्व को बताया गया है। उदाहरण के लिए सबसे अच्छा, श्रेष्ठ धान्य कौन सा है, सबसे कनिष्ठ धान्य कौन से है, श्रेष्ठ और कनिष्ठ दूध कौन से है, आदि । उदाहरण के लिए – “लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति” अर्थात सूखे धान्यों में लाल चावल श्रेष्ठ होते हैं । सूत्रस्थान में 152 वस्तुओं की सूची दी गयी है । खाद्य और पेय अर्थात खाने और पीने वाली इन वस्तुओं की प्रत्येक श्रेणी में श्रेष्ठ कौन से है और कनिष्ठ कौन से है, ये स्पष्ट रूप से बताया गया है।

दूसरा उल्लेखनीय स्थान निदानस्थान है। जहाँ रोगों के कारण का विवरण है । निदान अर्थात रोगों के कारण ! रोगों के कारण  ज्ञात व  अज्ञात दोनों होते हैं और दृष्ट व  अदृष्ट भी । रोग की उत्पत्ति कैसे होती है? मनुष्य शरीर में रोग कैसे हो जाता है ? आदि । “अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोग:पश्चात् प्रवर्तते” – जो रोग आरम्भ में अणु के समान होता है, उसी में बाद में बहुत वर्धन हो जाता है । इसलिए विवेकशील व्यक्ति को पहले ही अपना ध्यान रख कर, रोग ही न हो ऐसी जीवन शैली अपनानी चाहिये। चरक मुनि ने ऐसी जीवन शैली का दिग्दर्शन किया है। केवल दिनचर्या, ऋतुचर्या कैसी हो यही नहीं, अपितु मान्यता कैसी हो; बुद्धि कैसी हो – सत्व प्रधान, रजस प्रधान अथवा तमस प्रधान; जीवन कैसा हो, इन सब पर चरक मुनि ने बहुत विवरण दिया । व्यक्ति जितना रोगों के कारण को जानेगा उतनी अच्छी चिकित्सा कर पायेगा। रोगों का कोई एक कारण नहीं होता, अनेक कारण होते हैं इसीलिए चिकित्सा भी बहुत सी होती है। प्रत्येक रोग की केवल एक चिकित्सा नहीं है जो एक ही औषधि से ठीक हो जाए (उदाहरण के लिए ज्वर, जो एक लक्षण है, उसकी दवाई देने से ज्वर लाने वाला कारण समाप्त नहीं होता)।

चिकित्सास्थान में सर्वप्रथम रोगप्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि करके शरीर और मन को बल प्रदान करने वाली रसायन और वाजीकरण विधाओं को दो पृथक्-पृथक् अध्यायों में वर्णित करके तत्पश्चात् ज्वर आदि अन्य रोगों का निदान-चिकित्सा और पथ्यापथ्य सहित विस्तृत वर्णन किया गया है।

चिकित्सा तीन प्रकार की होती है – तत्व  चिकित्सा, देव विपाश्रय चिकित्सा और युक्ति विपाश्रय चिकित्सा ।

रोग व्याधि के कारण से आते हैं जिसमें पूर्व जन्म के कर्म व्याधि के रूप में आना भी एक कारण है – “पूर्वजन्म भूतं पापं, व्याधिरूपेण बाधते” । इसलिए आयुर्वेद में इतने प्रकार से चिकित्सा बताई गयी है, नक्षत्र से भी कैसे चिकित्सा करनी है, ये बताया गया है। सूक्ति रत्नाकर  व्याधि के निराकरण के लिए बताता है –  “तत्शान्ति: औषधे दाने जपे होमे अर्चनादिर्भि:”, इसलिए आयुर्वेद में होम, मंत्र, औषधि, मणि सभी का चिकित्सा रूप में वर्णन है।

चरक में बताया गया है कि किसकी चिकित्सा करनी है और किसकी चिकित्सा नहीं करनी है। सात्विक लोगों की चिकित्सा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि वह उत्तम कार्य करते हैं। उनका शरीर अच्छा होगा तो वह अच्छे कार्यों में उसे लगाएंगे।

डॉक्टरों द्वारा ली जाने वाली hypocritic oath जो अंतिम साल में ली जाती है, ऐसी शपथ का वर्णन पहली बार चरक ने किया था व उसका क्रियान्वन किया था । चरक संहिताओं में यह शपथ उपदेश अंकित है कि अंत में जब विद्यार्थी पढ़ कर जाता है तो उसे किस तरह से रहना है, चिकित्सा के चार पाद क्या हैं, वैद्य के चार गुण क्या है, औषधि के चार गुण क्या हैं, परिचारक के चार गुण क्या हैं!( सूत्रस्थान, खुड्डाकचतुष्पादोऽध्यायः)

चिकित्सा के संबंध में चरक में सूत्र है की चिकित्सा के समान कोई पुण्य नहीं क्योंकि एक व्यक्ति को आप यदि निरोगी कर देते हैं तो उसे एक नया जीवन दे देते हैं और नये जीवन के दान से बड़ा कौन से दान है? वैद्य ये दान देता है, इसलिए वैद्य से बहुत बड़ी अपेक्षा होती है, उससे एक उत्तम जीवन की आकांक्षा होती है। चिकित्सा करने का ये अवसर कभी-कभी किसी-किसी को ही मिलता है और जो इस अवसर को छोड़ देता है, वह रत्न को छोड़कर पत्थर उठा लेने वाले के समान है। चरक संहिता इतना ज्ञान घटित करने वाला शास्त्र है।

आयुर्वेद में चरक संहिता को पवित्र व अति वंदनीय ग्रंथ माना जाता है। वैद्य उसकी परंपरा के पालन का जतन करते हैं। किन्तु भारत में भी अब चरक को जानने वाले कम ही हैं क्योंकि वह इसके महत्व से अनजान हैं। ऋषि मुनियों से मिले इस अभूतपूर्व ज्ञान को केवल उपदेश व ऐतिहासिक मान कर ही रह जाते हैं।

सुश्रुतो न श्रुतो येन, वाग्भटो येन वाग्भट: | नाधितश्च चरक येन, स वैद्यो यम किंकर:||

सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसे वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।

आगे हम वृद्ध-त्रयी के सुश्रुत और वाग्भट्ट की बात करेंगे।  

आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा की शृंखला का ये  दूसरा भाग इंडिक टुडे (indictoday.com) में प्रकाशित हुआ है।
लिंक: https://www.indictoday.com/long-reads/ayurveda-katha-ii/

आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा!

आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।

धन्वंतरि समारम्भां, जीवकाचार्य मध्यमाम् । अस्मद् आचार्यपर्यन्ताम् , वन्दे गुरु परम्पराम् ॥

विभिन्न संहिताओं, ऐतिहासिक ग्रंथों, संस्कृत के ग्रंथों में आयुर्वेदिक की उत्पत्ति का विवरण उपलब्ध है। आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।चरक मुनि ने ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ कहकर आयुर्वेद को शाश्वत बताया है। आयुर्वेद अविरत चलायमान है और इसकी रक्षा अविरत होती रहती है।

 संहिताओं में निहित ज्ञान के आधार पर सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने करी। सहस्त्रों-सहस्त्रों वर्षों पहले सृष्टि की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद व अथर्वेद में उसका वर्णन है। विशेषकर तैत्तिरीय उपनिषद में बताया गया है:

“तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूत: | आकाशाद्वायु:| वायोरग्नि: | अग्नेराप: |अद्भ्य: पृथिवी | पृथिव्या औषधय: | औषदिभ्यो S न्नम् | अन्नात्पुरुष: ||

उस एक तत्व से आकाश की उत्पत्ति हुई, उसके बाद पंचभूतों की और फिर अनेक प्रकार के महाभूतों की क्रम से उत्पत्ति हुई, अंत में अन्न से मनुष्य की उत्पत्ति हुई। समस्त ब्रह्मांड की रचना की बात बहुत जगह पर आयी है। उन सबके पश्चात एक शास्त्र की रचना हुई।

जैसे कोई व्यक्ति एक यंत्र बनाता है, तो उसे बनाने के बाद उसकी एक अनुदेश पुस्तिका (user manual) निर्मित होती है, जिसमें उससे संबंधित सभी दिशा निर्देश होते हैं, बताया जाता है की उसकी विशेषता क्या है, उसे किस तरह से उपयोग करें, किस तरह से उपयोग न करें – यह सब संकलित कर वह निर्देश पुस्तिका यंत्र के साथ दी जाती है।  सृष्टि के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसकी रचना के बाद एक शास्त्र की रचना हुई जो मानव जीवन की एक प्रकार की निर्देश पुस्तिका है। इस शास्त्र को केवल मानव जीवन का नहीं, सर्व भूतों के जीवन की निर्देश पुस्तिका कहा जा सकता है। 

जिस शास्त्र की रचना हुई वह जीवन से जुड़ा हुआ था, इसीलिए उसका नाम आयुर्वेद रखा गया। आयु अर्थात जीवन, वेद अर्थात ज्ञान। जबसे सृष्टि का आरम्भ हुआ, तबसे अनेक प्रकार की बाधाओं से बचने के लिए, मनुष्य के शरीर को, मन को, आत्मा को, बुद्धि को, व्यवहार को समझने के लिए आयुर्वेद की रचना करी गयी। कोई भी परंपरा इतनी पुरानी नहीं होगी, जितना पुराना आयुर्वेद है। 

आयुर्वेद के सबसे पहले उपदेशक ब्रह्मा थे। वहाँ से आयुर्वेद की परंपरा का आरम्भ हुआ। ब्रह्मा अर्थात सर्जक! जो व्यक्ति सर्जन करता है वह उस कोटि का व्यक्ति है जो ईश्वरीय रूप है, जो पूर्णता की ओर है। वह ईश्वर वो नहीं जिसे हम मानते हैं, परंतु ईश्वरीय अर्थात जिसकी चेतना पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध है, ऐसे ब्रह्मा हैं। दो प्रकार की परम्पराओं का वर्णन, चरक संहिता में व सुश्रुत संहिता में आता है, दोनों ने ब्रह्मा जी को आयुर्वेद का प्रथम सर्जक बताया गया है। 

ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया। दक्ष प्रजापति अर्थात जो दक्ष है, कार्यकुशल है तथा प्रजापति अर्थात जो प्रजा को पालने वाले हैं, प्रजा की रक्षण की जिसकी बुद्धि है। ये नाम गुण को परिभाषित करता है, इन गुणों से युक्त व्यक्ति दक्ष प्रजापति है।  जो बौद्धिक हो और भौतिक न हो, अर्थात अंदर से तो वह बुद्धता को, आत्मा की चेतना को प्राप्त हो, परंतु बाहर से (प्रजा के)शरीर की रक्षा को प्रतिबद्ध हो। क्योंकि वह जानता है कि आत्मा तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम जो सीढ़ी है वो शरीर से आरम्भ होती है। इसलिए ये चिकित्सा के उद्भव का श्रेय ब्रह्मा, उसके बाद दक्ष प्रजापति को जाता है।

दक्ष प्रजापति से ये ज्ञान अश्विनी कुमार को मिला है। अश्विनी कुमार दो हैं। हमारे यहां 33 कोटि (यानी प्रकार) के देवी देवता हैं। उन 33 में से यह दो अश्विनी कुमार युग्म के रूप में मिलते हैं [अश्विनी कुमारों के बारे में बहुत सारी लक्षणा है, इतिहास है, सत्य है, तथ्य है जिनकी चर्चा किसी अन्य अवसर पर करी जाएगी ]।  देवों के वैद्य के रूप में जो ख्यात हैं, वह  दक्ष प्रजापति से ज्ञान प्राप्त अश्विनी कुमार हैं। 

अश्विनी कुमारों से यह ज्ञान देवराज इंद्र ने लिया। देवराज इंद्र एक ऐतिहासिक व पौराणिक पात्र हैं। मनुष्यलोक के सामान एक देवलोक है, देव सृष्टि है  जिसके प्रतिनिधि इंद्र हैं। 

पशुओं की और मनुष्यों की भिन्न सृष्टि है और न दिखने वाली भी पशु सृष्टि हैं – एक वायरस (विषाणु) की सृष्टि है, एक बैक्टीरिया (कीट) की सृष्टि है। ये सूक्ष्म ऊत सृष्टि धीरे धीरे आज भैतिक साधनों के कारण ज्ञात होती जा रही है, दिखाई देती जा रही है। आज सूक्ष्मतम यंत्र से सूक्ष्मतम जीवाणु दिखाई देते हैं। साधन की सहायता से उसका अनुभव किया जा सकता है। किंतु आत्मा की चेतना जब ऊपर जाती है, तो वो कोई साधन की सहायता से नहीं, अपितु साधना के बल पर जाती है, ऐसी ही उत्तम चेतना से परिपूर्ण देवलोक की पूरी सृष्टि है। जैसे एक वायरस की या बैक्टीरिया की अज्ञात सृष्टि है, उसी तरह देवलोक की भी एक अज्ञात सृष्टि है। वो भी दिखाई पड़ती है, उसका भी अनुभव होता है। उसके लिए आत्मा की चेतना की अवस्था उत्तम होनी चाहिए। 

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥  

ब्रह्मा ने ऐसा कल्प के आदि में उत्पन्न प्रजाओं से कहा। इसलिए देवराज इंद्र, जो देव सृष्टि के प्रतिनिधि हैं, उन्हें आयुर्वेद का ज्ञान मिला।  यहाँ तक आयुर्वेद की अलौकिक परंपरा पूरी होती है। जहाँ पर देव सृष्टि है – जहाँ पर चेतना को उपलब्ध हुए जीवों को जो अनुभव होता है, उसे अलौकिक परंपरा कहते हैं जिसमें सर्वप्रथम ब्रह्मा हैं और अंत में इंद्र हैं। इसके बाद लौकिक परंपरा आरंभ होती है। 

देवों को जब कुछ परिवर्तन करना होता है, कुछ परिणत करना होता है तो वह मनुष्यों को खोजते हैं।  जिसके पास उत्तम वस्तुएँ होंगी और वह व्यक्ति यदि उत्तम चेतना वाला होगा – मनुष्य जीवन में देखें तो सात्विक चेतना वाला होगा – तो देव उसे उत्तर में अधिकारी के रूप में देखेंगे। देव सबसे योग्य व्यक्ति को ढूँढता ही रहता है। इंद्र ने भी आयुर्वेद के लिए ऐसा व्यक्ति खोजा और उन्हें वह भारद्वाज ऋषि के रूप में मिल गया।

इंद्र ने एक परंपरा के अनुसार आयुर्वेद का ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया। यहाँ से आयुर्वेद की लौकिक परंपरा आरम्भ हुई। ‘इमं द्विज भार’ ऐसा भारद्वाज शब्द की व्युत्पत्ति बताई है। जिसे संभालने की बुद्धि है, वह भारद्वाज, उन्हें इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान दिया।

इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान मिलने के बाद भारद्वाज ने ऋषि परिषद करी [पहले के ऋषि-मुनि उत्तम चेतना को उपलब्ध थे इसलिए जो ज्ञान मिला उसे वो वितरित करना चाहते थे। ज्ञान की ऐसी अदभुत परंपरा रही जिसमें न कोई प्रमाण पत्र देना था, न ही कोई पैसा लेना था और न ही अन्य कोई बातें थीं]। उस ऋषि परिषद में अत्रि मुनि ने भी भाग लिया। अत्रि मुनि का बहुत जगह पर वेदों में भी वर्णन है। ‘त्रिगुणात अतीत: अति अत्रि’, अर्थात  तीनों गुणों से पर जो व्यक्ति हो गया वह अत्रि। 

उस ऋषि परिषद के पश्चात आयुर्वेद के ज्ञान की परंपरा को अत्रि मुनि ने आगे बढ़ाया। अत्रि मुनि से आयुर्वेद की वास्तविक परंपरा आरम्भ होती है। अत्रि तक ये आयुर्वेद ज्ञान परंपरा श्रुति रूप में थी। 

अत्रि ने इस आयुर्वेद की परंपरा का अपने शिष्य व पुत्र आत्रेय को ज्ञान दिया। अब तक ये उपदेश मौखिक थे। क्योंकि पहले की वैदिक परंपरा श्रुत परंपरा थी यानी सुना हुआ याद रखना। इसलिए वेद भी श्रुति कहे जाते हैं। क्योंकि सुना हुआ बहुत महत्व का होता है। संस्कृत में विद्वान को ‘well read’ नहीं कहते, ‘बहु श्रुत’ कहते हैं। सुना हुआ, पढ़े हुए से बहुत गहरा होता है। 

पुनर्वसु आत्रेय का उपदेश, चरक संहिता ग्रंथ में पाया जाता है। चतकर्ण, पाराशर, भेल इन ऋषि मुनियों का भी वर्णन चरक संहिता में दिया गया है। 

आत्रेय ने आयुर्वेद के ज्ञान से आगे छह शिष्यों को तैयार किया, उनमें से एक अग्निवेश थे। अग्निवेश, भेल, चतकर्ण, पाराशर, क्षिप्रणि, हर्षता वह छह शिष्य थे। अनेक लोगों की संहिताएँ हैं, इन सभी ऋषियों के नाम से भी संहिता लिखी गयी हैं। ये छह शिष्य श्रोता थे। उन्होंने पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश को ग्रहण किया। उसके बाद अग्निवेश के पारगामी बुध्दि रचित तंत्र की रचना हुई [तंत्र की शास्त्रीय, दार्शनिक परिभाषा, संहिता की रचना किस प्रकार होती है, आदि किसी अन्य समय। यह एक कोर्स बनाने जितना सरल नहीं है], जो सबसे बड़ा कार्य हुआ। अग्निवेश के बाद ये तंत्र कालक्रम से चलता रहा। मूल उपदेश का तंत्र बनाया गया था, उसमें कालानुक्रम में कुछ मिश्रित होता गया और कुछ निकलता गया।  मूल आयुर्वेद के उपदेश से कुछ न कुछ अलग होता गया, कुछ दूषित भी हुआ।

चाणक्य ने बताया है कि अन्य किसी क्षेत्र में भ्रष्टाचार सह्य हो सकता है परंतु चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में, उनकी व्यवस्था में लेश मात्र भी यदि भ्रष्टाचार हो तो कोई भी व्यवस्था सही नहीं बचेगी और समाज की बहुत हानि होगी। चिकित्सा के क्षेत्र में यदि भ्रष्टाचार हुआ तो वह कभी सह्य नहीं होगा, ये चुकाना पड़ेगा। आयुर्वेद में लोभ एक तरह से वर्जित है, अगले जन्म में, इस जन्म में बहुत भोगना पड़ता है। कुवैद्य की निंदा करी गयी है और सुवैद्य की प्रशंसा करी गयी है। 

अग्निवेश के तंत्र के बाद एक ऋषि आये जिन्हें हम चरक कहते हैं। चरक पारगामी बुद्धि के ऋषि थे, उन्होंने अग्निवेश तंत्र का परिमार्जन, पुनर्गठन किया। उन्होंने देखा की अग्निवेश तंत्र में क्या दूषित हुआ है और उसके लिये क्या किया जा सकता है, ये उन्होंने एक बहुत बड़ी क्रांति रूपक बात आरम्भ करी और चरक संहिता की रचना करी।  इसलिए कहा जाता है की अग्निवेश ने तंत्र लिखा, उसका प्रतिसंस्कार चरक ने किया। वह संहिता इतनी ख्यात हुई की चरक को ‘father of indian medicine’ कहा जाता है। 

चरक दो प्रकार के हैं: एक परंपरा का नाम है चरक (जैसे शंकराचार्य एक परंपरा का भी नाम है जो उनकी पीठ से चलता है और समकालीन शंकराचार्य गुरु व्यक्ति रूप भी हैं)और दूसरा ऋषि प्रकति का, उत्तम ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति भी चरक है । उन्होंने प्रज्ञा व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया, उसका भी नाम चरक हो गया। क्योंकि ‘चरैवेति चरैवेति’, वे अनेक स्थानों पर जाते थे, सदा चलायमान रहते थे इसलिए उनका नाम चरक पड़ा। कई जगह वर्णन है की चरक और पतंजलि, दोनों एक ही हैं। जिन्होंने योगसूत्र लिखा है, उन्होंने ही अपना एक उपनाम चरक रखा है। चरक संहिता में उनके व्यक्ति विशेष पहचान के लिए कुछ नहीं मिलता है। किन्तु  इतिहास के अनेक ग्रंथ देखे जाएँ तो ये भी पता चलता है कि वह राजा तनिष्क के यहां राजवैद्य थे। 

चरक मुनि ने अग्निवेश तंत्र का सुव्यवस्थित रूप से गठन किया। वो गठन करने के बाद, जिसे आज हम संपादन (compilation) कहते हैं, उससे भी बड़ा काम चरक मुनि ने किया। चरक संहिता कोई छोटी मोटी संहिता नहीं है, आठ स्थान में विभक्त है जिसमें 140 अध्याय हैं। यह सब उस समय किया गया जब कागज़, कलम नहीं थे और बहुत सारी टेक्नोलॉजी नहीं थी। उस समय उन्होंने बहुत ही मेहनत से इस ग्रंथ को बनाया। 

परंपरा को बचाने के लक्ष्य को निर्धारित करके उन्होंने एकनिष्ठ होकर यह कार्य किया जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं था। और उन्होंने इतने विषय चरक संहिता में ले लिए कि कहा जाता है, जो यहाँ मिलेगा, वह दूसरे स्थान में होगा, ऐसा नहीं कह सकते, किन्तु दूसरे स्थान में होगा तो चरक संहिता में होगा ही!

युग व प्रमुख वैद्य

काल के अनुसार आयुर्वेद के अनेक ऋषियों की महत्ता बतायी गयी है। उसके अनुसार अत्रि की कृतयुग/सतयुग में बहुत महत्ता है। सतयुग के वैद्य के रूप में अत्रि प्रमुख हैं। अत्रि ने अपनी स्मृति में सात्विक लोगों की चिकित्सा कैसे करी जाए, उसपर कार्य किया। उस युग में सत्त्वप्रधान व्यक्ति हुआ करते थे तो रोग भी उस प्रकार के होते थे, चिकित्सा भी उसी प्रकार की करनी होती थी। सतयुग के रोग ऐसे थे की अधिक तप करने से, अधिक सहन करने से, अधिक शरीर को कष्ट देने से होते थे तो उसी प्रकार की चिकित्सा अत्रि मुनि ने स्थापित करी।

द्वापर युग में बहुत युद्ध घटित हुये, सुश्रुत द्वापर के वैद्य थे। द्वापर में युद्ध बहुत हुये, उसके लिए शल्य की आवश्यकता रही। ऋषि-मुनि परंपरा से बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति को समाज कल्याण की चिंता रहती ही है, इसलिए सुश्रुत( जो विश्वामित्र के पुत्र थे) के रूप में वह दिवोदास धन्वंतरि की परंपरा में आये। धन्वंतरि की परंपरा में आकर उन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी, उन्हें शल्य चिकित्सा (surgery) का जनक माना जाता है। 

कलियुग में वाग्भट्ट प्रमुख वैद्य हुये। कलियुग में सत्व के लिए अधिक तप के कारण, शरीर के कष्टों के कारण रोग नहीं होते, युद्ध के कारण भी नहीं होते, अपितु अधिकतर आहार विहार के नियमों का पालन न करने के कारण होते हैं, इसलिए वाग्भट्ट का नाम कलियुग में गौरवपूर्ण हुआ, क्योंकि उन्होंने आहार-विहार से संबंधित अति विस्तृत चिकित्सा स्थापित करी (अष्टांग हृदय, अष्टांग संग्रह ग्रंथ)। 

चरक संहिता की रचना के 1000 साल बाद, दृढ़वल ने उसका प्रतिसंस्कार किया, उसमें 141 अध्याय किये। आधुनिक समय में भी बहुत विद्वानों ने चरक पर काम किया है, जैसे चरक विन्यास, जल कल्पतरु, चक्रपाणि आदि के व्याख्याएँ चरक पर मिलती हैं। प्राय: 44 व्याख्याओं का वर्णन चरक के ऊपर प्राप्त हैं।

आधुनिक चिकित्सा जगत की बात करें तो एलोपैथी के लिए हैप्पोक्रिटिस का नाम आता है, होमियोपैथी को देखें तो  हैनिमैन, सुशलर  का नाम आता है, ऐसे ही अन्य पथियों के लिए विभिन्न चिकित्सकों का, लेखकों का नाम आता है, जिन्होंने वो पद्धति/पथी आरम्भ करी। आयुर्वेद को किसी व्यक्ति विशेष ने आरम्भ नहीं किया। ये ज्ञान अनादि से प्रवाहित है। 

 ‘आयुर्वेद: पंचमो वेद:’ आयुर्वेद को पाँचवे वेद का स्थान दिया गया है। आयुर्वेद एक काढ़ा,दवाई अथवा केवल वटी-गुटी का शास्त्र नहीं है। ये जीवन से जुड़ा हुआ, सूक्ष्मतम ज्ञान से निहित शास्त्र है। इसमें जीवन की प्रत्येक पक्ष को सूक्ष्मता से देखा गया है, प्रत्येक व्याधि का समाधान दिया गया है। चाहे प्रमाणिकता हो, चाहे जीवन के अछूते पक्ष हों, सबकी बात आयुर्वेद में करी गयी है, इसीलिए चरक मुनि ने कहा है ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ |

शायद ही किसी अन्य चिकित्सा पथी की पुस्तकें पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद कही गयीं। इसलिए आयुर्वेद में बताया :

‘न कामर्थं न अर्थार्थं, अथ भूत दयां प्रति’ ये शास्त्र भूतानुकंपया है, ये शास्त्र धन कमाने के लिए नहीं है, किसी कामार्थ नहीं है, ये पेट भरने के लिए भी नहीं है। इसका हेतु है कि ये अनेक प्रकार के जीव जंतु का कल्याण हो जाए, मनुष्य स्वस्थ रह सके, रोगों से बच सके और जो रोग हो गए हैं उनका निदान कर सके। इसलिए रोगों से बचने के लिए क्या क्या आवश्यक है, ये सारा ज्ञान आयुर्वेद में हैं, इसलिए उसकी रचना हुई। 

आयुर्वेद में चरक संहिता को पवित्र ग्रंथ व अति वंदनीय माना जाता है। वैद्य उसकी उसकी परंपरा के पालन का जतन करते हैं। 

सुश्रुतो न श्रुतो येन, वाग्भटो येन वाग्भट: | नाधितश्च चरक येन, स वैद्यो यम किंकर:||

सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसको वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।

यात्रा जारी है……

Is this the right path in the chaos?

Can we really sort a chaos by only being another voice adding to that chaos? Thinking that their voice is the sane one, the dharmiks also come and share their thoughts, knowledge and suggestions to rest of the world in the limited confinement of a social media platform. They (most likely) do that on more than one platform, each time in the confinement of that social media platform, talking in the format (micro-blog, audio-visual, Q-ans and so on) of that platform.

All this for explaining and bringing back people to something which is a complex system called sanatana, if I may call it so for the sake of discussion (see, I just did it by calling sanatana a system so that I can say what I have to say using the limited vocabulary and space I have got).

Why chaos? Because they are so many voices with each one saying ‘listen to me’. A knowledgeable and well-intentioned dharmik writes a book in an ‘acceptable’ language about certain aspect of santana, sharing deep insights, reasons, explainable tarkas and suggestions on how to start following it; but at the same time there are 100 other books written by modern hindus with the repackaged truth, they use the rules of the game and have better shelf availability of their book. This proportion of dharmik to modern hindus is what, 1:10 maybe 1:100? Dharmik’s book doesn’t reach the desired shelf, the desired audience. How is the audience supposed to know that the dharmik’s book is the genuine and better one? We blame the audience for not using their ‘viveka’ to choose, we blame them for not being the seeker and search for themselves but why do we forget that so many dharmic warriors have to come up because this collective ‘viveka’ is very weak and the spirit of being a seeker has been killed in a planned and structured manner in last few hundred years? So does the job start or end by simply calling them a failed collective? Does it solve the problem? No. They rather get further pushed away, as being defensive is in the DNA for atleast 2 to 3 generations now.

While doing manan I struggle with the question that can we really explain or move people to a complex system called santana or vedic sanskruti which is fluid, interdisciplinary and doesn’t use the tool-set which is popular or understood by people today?

This complex system which has been made surprisingly simple by our sages, great rushi-munis to understand and follow by knitting various practices, rules of life, sanskaras and biggest & oldest ever documented repository!

Using this repository and by being the pracharak shishya of the guru-shishya parampara, a big number of dharmiks are trying to bring the knowledge to people in an ‘acceptable format’ or ‘bite sized’ information (not gyan). Is that really the right step-by-step approach to ultimately bring all into the purview of understanding santana thoughts and practices completely and later start following them?

I also observe a lot of well-intentioned Hindu’s getting pulled into the same tricks of social media which they initially took up only to reach out to more people. The initial intension was noble but gradually they get taken over by the thought of talking to people in the language they understand, where the core problem is that the language (set of life practices, attitudes, approach) which is understood by all itself is very shallow, promotes alasya, wants everything to be served to a person instead of motivating the person to be a seeker and initiate the journey of being wiser than the previous day, every day.

Another example is where a lot of these dharmiks write smaller bite sized pieces to explain various aspects of sanatana in the modern understandable language and all the references they get to cite are non-Indian westerners? So, by giving reference of a recent researcher ( 50 -100 years is recent in this context) from the western world we try to ‘justify’ that that our age old knowledge and practices are scientific and relevant by putting them in a tool-set which is modern but very limited and certainly very different from the original tool-set where these practices were originated. Why are we unable to provide the vedic and shastriya-tarkik scientific explanation and have to switch to modern science process to explain it. The indic scientific explanation also goes to the last molecule of detail and in a simple way but every such explanation disappears in the chaos and the explanation using the modern scientific/technical language rather starts sounding like a rant.

I have my doubts if this is the right path. Can’t articulate all of them well here as my vaakpatuta isn’t good enough to bring all of them forth.

That is the reason I am sharing this open question to all!

I have seen a dharmiks sharing their disappointment at times on twitter, some are sad, some are angry, some are anguished, some seem to be giving up and but still trying their best to keep on the path as they realise it is a difficult one. But I have my doubts if this is the right path to reach the goal post we want to reach.

Rajiv Malhotra ji has been working on the project of creating ‘Intellectual Kshatriyas’ for long. He gets very annoyed at a lot of emotional hindus not been able to present their case well and defend sanatana and dharma. But some IKs that would have been created by now, are they visible? Or have they been lost to this chaos as well? If yes, then is this one of the right paths?

The fundamental question is, if I am willing to change the game itself because it is on shallow and incorrect grounds, doesn’t follow the right rules and has blind folded the participants/participants don’t want to play with blinds unfolded, Can I really change it by playing it, by being a part of the same game and playing it by same rules? It is beyond that point of metaphor that ‘if you want to understand the game, you will have to play it first’ as we have been part of this game for so long and now are willing to change it (atleast I have made this transition, some are lucky to always have been outside it) because we have understood it to be the faulty one with a adhogaami goal post.

Sanatana system has enormous experience of having set up the game from scratch, define the rules, enable the players with capabilities and skills, clearly define the goal posts and provide the attitude that there are various right paths to reach the goal posts. But the dharmiks are not able to create the new game. Prevailing conditions are already known like secular democracy, politics being priority of govt as it may be ruling but ultimately it is a political party, too much left ideology influence, conversion missions, religious extremism. My point is the game has to be designed to address these conditions/limitations so citing them as reasons doesn’t answer the question.

There is overload of indic information on twitter now, be it about temples, our pauranic tales, various roopa of Ishwara, Devi’s. But is that really serving the collective purpose that we want to achieve or is it just adding to the chaos?

This thought got triggered when I was reading this article on indictoday.com https://www.indictoday.com/quick-reads/balis-water-temples-understanding-technology-dharmic-rituals/ by Dr Nagendra Setumadhavrao

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः।  वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥

Charpatpanjarikastotram

The childhood is lost by attachment to playfulness. Youth is lost by attachment to woman. Old age passes away by thinking over many things. But there is hardly anyone who wants to be lost in parambrahman.

The journey continues…….

Music : How did it all begin?

Music : How did it all begin?
As with much else, our music began in the age of the vedas. The vedic period saw the beginning of what is today known as sama music or the Saman the musical way of rendering Sama Veda. Read on..

How did the Indian music begin? As with everything, it was a gift from Ishwara. Here is what the ancient Natyashastra says:

Once, a long time ago (told at the onset of Tretayuga), it so happened that people got addicted to base sentiments, were ruled by lust and greed, experienced less happiness and more sorrow, behaved in angry and jealous ways, with each other and not only gods but demons, evil spirits, yakshas and such like others swarmed over the earth. Seeing this plight, Indra and other gods approached Brahma and requested him to give the people a mean of entertainment (Kridaniyaka), but one which would not only be seen but heard and this should turn out to be a diversion (so that people gave up their bad ways).

Till then, sangeet had been something only the devas enjoyed. A suitable human had to be found who was capable of receiving this gift-a truly great man. A gandharva or man of superior spiritual ability was required to convey this knowledge of the gods to the world of man. So, Brahma instructed Bharata in the Nāṭyaveda and gave the responsibility to him and his hundred sons to propagate and practice the same. The eternal gandharva sage Narada is to be thanked for the classical music we have today.

Since our music has a background in dharma, the teaching methods are very similar to dharmic-vedic education.  It is the tradition of guru-shishya parampara, that has been part of Indian culture or humility – the willingness to learn. He must also have the quality of sadhana or dedication. Only through constant sadhana can a shishya become a true master of music. It is the best principle to teach our children, even today.

In the beginning: the music of Vedas

So much for the legends. How about formal beginnings! As in so many other fields, so also in music, India has one of the most ancient traditions in the world. At a time when Western civilisation was barbaric and crude, thousands of years before the rise of the Greeks and the Romans we already had a complex and sophisticated music tradition.

As with much else, our music began in the age of the vedas. The vedic period saw the beginning of what is today known as sama music or the Saman the musical way of rendering Sama Veda.

Sama music was very simple, starting with one note, then two, then three, up to seven. In each round of chanting, one note was added. The notes started high and, and went down gradually.

Music of India is a composite art comprising Gita (singing), Vadya (instruments) and Nrtya (limb movements) –

Gita, Vadya, Nrtyam trayam Natyam Tauratrikam ca tat Samgitam || (Hemachandra)

Our vedic ancestors used four kinds of instruments:

Tata : Stringed instruments, like the Veena

Avanaddha : Hollow things to beat like drums

Ghana : Solid things to beat, like gongs

Sushira : Things to blow on, like flutes.

Narad muni works gave the gatra veena, which has clear instruments on how to use fingers, hands and head with different notes and words.

What were the words? Mostly from the Rigveda. Everything was not religious in nature. Sama music was for rituals, but early music scholars also mention narashamshi gathas – songs of the common man. SO we’ve been a democratic nation for a pretty long time too – even when it comes to music !

जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च। यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥

Nāṭyaśāstra 

He took the lyrics (पाठ्य) from the Ṛgveda, the music (गीत) from the Sāmaveda, the language of gestures (अभिनय) from the Yajurveda and the aesthetic experience (रस) from Atharvaveda

The journey continues….

Why is vedic education system relevant today

Family, health and education are the 3 foundational pillars of a society – this has been long understood and clearly narrated by our vedic era scholars. Modern day societies( largely grouped as countries run by governments, constitutions and law) agree and follow the same belief. Schemes, policies and systems in all modern day developed countries are centred around these three foundational pillars. 

Then

Indian society had successfully managed itself and flourished for thousands of years primarily due to all its practices, culture, knowledge and societal guidelines knitted to preserve and balance these three pillars of Family – the ashram and varna system; Health – Ayurved, developed and practiced as the science of health (physical, mental and intellectual) and life, which is pro-active, preventive and routine oriented instead of being reactive, corrective and need based; Education – which meant physical and intellectual knowledge to enable one to make the right decisions, strengthen the mind, excel in various skills and arts, to know one’s strengths and weaknesses and accordingly shape the future course for livelihood, society and country.

Now

The modern education system, in the last 100-200 years, has been unsuccessful in bringing about all this. There are a lot of shortcomings in this human psychology based modern education system (introduced by Macaulay)  and it is mandatory to improve this education system or to provide an alternative else the negative consequences of this otherwise improper education system will affect all the other streams and systems of the society and country. Education is the foundation of all other systems and thus it being right or wrong affects other systems deeply.

Its result is a deteriorated education system which focuses on literacy and rote memory more than knowledge. Educationalists, education policy experts, psychologists and employers – all are pointing to huge gaps of this system as lack of value education, shallow or incorrect understanding of concepts and subjects, multiple personality-character issues and mostly unemployable adults.

The new National Education Policy 2020 seems to be promising to address a lot of modern education system’s shortcomings. The key, however lies in implementation and how effectively is the system able to upskill and improve the teachers

Here is what our vedic education directs the student or the disciple to do. The focus is on making a learned and noble human being, who is respectful, capable, skillful and doesn’t shy away citing lazyness:

शिष्यानुशासनम् वेदमनूच्याचार्योन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ॥

vedam anucya ācāryaḥ antevasinam anuśāsti | satyaṁ vada | dharmaṁ cara | svādhyāyānmā pramadaḥ| ācāryāya priyaṁ dhanamāhṛtya prajātantuṁ mā vyavacchetsīḥ |satyānna pramaditavyam | dharmānna pramaditavyam kuśalānna pramaditavyam | bhūtyai na pramaditavyam |svādhyāyapravacanābhyāṁ na pramaditavyam|

तैत्तिरीयोपनिषत्

The journey continues…..

दर्शन क्या है?

दर्शन क्या है?
आधुनिक पाश्चात्य संसार में जो ‘philosophy’ शब्द है , वह दर्शन के लिये प्रयोग होता है। जिसे philosophy कहते हैं , वह दर्शन नहीं है। दर्शन उससे बहुत आगे है, बहुत विस्तृत है।

आदरणीय गुरुजी श्री मेहुलभाई आचार्य द्वारा दिया गया दर्शन का परिचय!

दर्शन का पहला रूप हम समझते हैं देखना। हम विग्रह का, भगवान की मूर्ति का दर्शन करते हैं,उसे देखते हैं। कभी किसी व्यक्ति को भी कहते हैं,”आपके दर्शन दुर्लभ हो गये हैं” (दर्शन दुर्लभ हो गये, जबसे दिया उधार!) अर्थात् कोई व्यक्ति अब दिखता नहीं।  

जब भारतीय ‘दर्शन’ की बात करी जाती है तो वह है संस्कृत की ‘दृश’ धातु से बना, उससे निष्पन्न हुआ शब्द -दर्शन! 

आधुनिक पाश्चात्य संसार में जो ‘philosophy’ शब्द है , वह दर्शन के लिये प्रयोग होता है। जिसे philosophy कहते हैं , वह दर्शन नहीं है। दर्शन उससे बहुत आगे है, बहुत विस्तृत है। 

अनुमान से कुछ बताने, या सोचने, विचार करने, बहुत विचार करने को फिलोसॉफी कहते हैं। फिलोसॉफी विचार का शास्त्र है। 

फिलोसॉफी में सोचा जाता है, दर्शन में देखा जाता है।दर्शन निर्विचार की भूमिका में देखा जाता है। दर्शन प्रत्यक्ष है।

ज्ञान प्राप्त करने की, साधना की भारतीय विज्ञान में सीढ़ी है – श्रवण, मनन और निधि ध्यासन। श्रवण माने सुनना; मनन माने सुने हुए तथा स्वाध्याय द्वारा जाने गये ज्ञान को पुनः स्मरण करना, उसका संकलन करना तथा निधि-ध्यासन माने मनन किये हुए ज्ञान को स्तिथप्रज्ञ होकर उसका परीक्षण करना, उसे धारण करना व आत्मसात करना।  

हमारे ऋषि-मुनियों ने इस निधि ध्यासन की प्रक्रिया में बहुत सी ऐसी बातें देखीं, अनुभव करीं और उनका साक्षात्कार किया। वो सोचीं नहीं, विचार नहीं किया, संशोधन नहीं किया; उन्होंने साक्षात्कार किया। साक्षात्कार होने के बाद कुछ रहस्य ऐसे पता चले जो हम इन्द्रियों के द्वारा नहीं जान सकते। वह, जिसका अनुभव इन्द्रियों रूपी साधन द्वारा नहीं हो सकता, उन्हें इन्द्रियातीत कहते हैं। ऐसे अनुभव को किसी साधन से नहीं जाना जा सकता, साधना से जाना जा सकता है। ऐसे ही कुछ इन्द्रियातीत अनुभव ऋषि-मुनियों को हुए। वह पता चला जो सृष्टि के पार है। 

इसीलिए तो ‘रिष’ धातु से ऋषि शब्द बना – ऋषति संसारस्य पारं दर्शयति, इति ऋषि:। ऋषि का अर्थ है, जो संसार से पर की बात बता सके, जो संसार के पार की बात को जान लेते हैं।

अतः निधि ध्यासन की प्रक्रिया में, ऋषि मुनियों के मन में प्रश्न उठे। प्रश्न उठने के पश्चात उन्होंने साधना करी। साधना के पश्चात उसके उत्तर मिले। उन्होंने इन्द्रियातीत अनुभवों से अपने मन में उठे प्रश्नों के उत्तर को जाना – ये शरीर कैसे चलता है ; मन कहाँ से आया है ; [केन: सितं प्रेषितं मन:, केन: प्राण:] कौन प्राण को भेजता है ; मरने के बाद क्या होता है ; आत्मा कहाँ चला जाता है और क्या-क्या जाता है ; सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई ; क्यों उत्पन्न हुई ; ये सब क्यों हुआ ; मैं संसार में क्यों आया ; मुझे कौन चला रहा है ; मैं कहाँ जाऊँगा ; मैं क्या कर रहा हूँ ; यह सब क्या है ; ये सभी रचना और इसकी विधि क्या है?

वह उत्तर अनुभूति के स्तर पर मिले, शब्द के स्तर पर नहीं! उन्होंने उन उत्तरों को देखा और उसको कहा – दर्शन! 

उसके ऊपर शास्त्र लिखे गये। विभिन्न ऋषियों ने विभिन्न शास्त्र लिखे। 

मनुष्य के लिए साधना के कई  मार्ग हैं, प्राप्तव्य एक है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं : गणित में दो और दो चार होते हैं, एक और तीन भी चार होते हैं तथा आठ में से चार जाएँ, तो भी चार होते हैं। चार तक पहुँचना महत्वपूर्ण है और चार तक बहुत तरह से पहुँचा जा सकता है। ऐसी ही यदि 100 की संख्या पर पहुँचना हो तो कई मार्ग हैं। पर इसका यह अर्थ नहीं कि केवल कोई एक मार्ग ही सही है। ऐसा नहीं है कि केवल दो और दो चार ही उचित है अथवा शुद्ध है, तीन और एक नहीं। यदि कोई ऐसा कहता है तो कहने वाला गणितज्ञ नहीं हो सकता!

ऐसे ही मुक्ति का यही एक मार्ग है और कोई मार्ग नहीं हो सकता, ऐसा कहने वाला ज्ञानी नहीं है। 

ऋषि-मुनियों ने जाना कि परमात्मा की ओर जाने वाले कितने मार्ग हैं और भटकाने वाले कितने मार्ग  हैं। परमात्मा तक ले जाने वाले मार्गों की पूरी प्रक्रिया दी। सृष्टि का उद्भव कैसे हुआ; हम कहाँ से आये; जन्म कैसे होता है; जन्म के समय पर गर्भ में हम कैसे आ जाते हैं; वहीं क्यों आते हैं; पूर्व जन्म कैसे होता है; पुनर्जन्म कैसे होता है – ऐसी बहुत सारी बातें लिखीं और उनका नाम बताया गया दर्शन शास्त्र!

हमारे ऐसे छह दर्शन मुख्य हैं:

  1. न्याय, (2) वैशेषिक, (3) सांख्य, (4) योग, (5) पूर्व मीमांसा (मीमांसा शास्त्र) तथा (6) उत्तर मीमांसा (वेदांत)।

इन छह दर्शनों के शास्त्र भिन्न ऋषियों ने लिखे हैं। वेदों को आधार मानकर, वेदों के वाक्यों को आधार मानकर लिखे गये ये छह दर्शन वैदिक दर्शन कहलाते हैं। 

अन्य तीन दर्शन हैं :

(7) जैन दर्शन, (8) बौद्ध दर्शन और (9) चार्वाक दर्शन

यह अवैदिक दर्शन कहलाते हैं क्योंकि वो वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं। इनमें दो दर्शन ऐसे हैं जो पूर्व व पुनर्जन्म को मानते हैं, सृष्टि के रहस्य को मानते हैं – जैन दर्शन और बौद्ध दर्शन। ये दोनों दर्शन हैं। सृष्टि की, पूर्वजन्म की, पुनर्जन्म की पूर्ण  प्रक्रिया बताते हैं।  परंतु ये वेदों के वाक्यों को प्रमाणभूत नहीं मानते। वह मानते हैं कि वेद वाक्य प्रमाण हो भी सकता हैं और नहीं भी हो सकता है। 

नौंवा और अंतिम दर्शन है चार्वाक दर्शन। चार्वाक दर्शन रहस्य को नहीं मानता है। वह भोगों को मानता है:

यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।। 

अर्थात् जब तक जीवन है, सुख से जियो, भोग-आनंद करो। यह देह भस्मीभूत होने के बाद कहाँ पुनः आना है।  

चार्वाक दर्शन कहता है कि सब कुछ यहीं, इसी संसार में है, इसीलिए सब भोग लो क्योंकि उसके बाद जन्म ही नहीं है। इस संसार से बाहर कुछ होता तो जन्म होता। कुछ नहीं है इसीलिए जन्म भी नहीं है। आत्मा, परमात्मा, सत्संग – यह सब कुछ नहीं होता, इसका कोई लाभ नहीं। इस दर्शन के अनुसार: 

त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः। बुद्धि पौरुष हीनानां जीविका धातु निर्मिता।। 

अर्थात् बुद्धि और पौरुष बिना के लोग ऐसी लोक-परलोक की बातें करते रहते हैं। 

इन सबका उत्तर वैदिक दर्शन में, न्याय व वैशेषिक आदि में बहुत  विस्तारपूर्वक दिया गया है। यदि एकाग्रचित्त होकर पढ़ेंगे तो संपूर्ण दर्शन समझ में आ जाएगा। 

इस तरह से नास्तिक दर्शन और आस्तिक दर्शन, दोनों दर्शन हैं। पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष दोनों हैं। प्रत्येक तथ्य यहाँ तर्क से स्पष्ट किया गया है।  दर्शन शास्त्र में कुछ भी तर्क अथवा अर्थ के परे नहीं है। बुद्धि के साक्षात्कार की भूमिका पर आकर जो लिखा गया वो दर्शन शास्त्र है। 

इसके लिए गीता में स्वयं कृष्ण ने ही ‘ज्ञान क्या है’ ये बताया है:

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥

अध्यात्मज्ञान में स्थित होना और तत्वज्ञान के अर्थ में परमात्मा को ही देखना (जो दर्शन शास्त्र बताता है),वही ज्ञान है। तत्वज्ञान कराने वाला जो दर्शनशास्त्र है, वह मेरे मत में ज्ञान है, और अन्य सब अज्ञान है। 

तो दर्शन शास्त्र क्या है? ऋषि-मुनियों ने जो अलग-अलग मार्गों से अनुभूति करी – सृष्टि कैसे बनी, कौन चलाता है, कैसे चलती है, आदि, उस अनुभूति से जो भिन्न-भिन्न वाक्य निकले, जिनकी दिशा भिन्न हैं, कहने की विधि भिन्न है, लेकिन पहुँचना एक ही स्थान/लक्ष्य पर है- मुक्ति! मोक्ष!; इन अनुभवों का, देखी हुई अनुभूतियों का नाम दर्शन है। 

वैदिक ज्ञान की सूक्ष्म समझ का उदाहरण: न्याय दर्शन अथवा भारतीय भौतिक शास्त्र/भौतिकी (Indian Physics)

आधुनिक विज्ञान ने लगभग 1800 ई. में परमाणु (atom) की व्याख्या करी तथा उस पर शोध आरम्भ किया। 

न्याय दर्शन, जिसे Indian physics कहा जाता है, उसके रचयिता गौतम मुनि ने परमाणु के बारे में लिखा है। परमाणु शब्द, आज जिसे हम atom कहते हैं, वो वेदों के बाद,पहली बार गौतम मुनि ने बताया है। परमाणु की व्यवस्थित व्याख्या; परमाणु क्या होता है; इतना सूक्ष्म होता है कि दिखता नहीं है, तो भी वह होता है; उसका यथार्थ माप, परिमाण; उसकी शक्ति; यह पूर्ण विवरण गौतम मुनि ने लिखित किया।  जिस समय यूरोप ने परमाणु की कल्पना भी नहीं करी थी, तब परमाणु का पूरा विवरण गौतम मुनि ने लिखा था। 

जालान्तर्गते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः । तस्य षष्ठतमो भागः परमाणुः स उच्यते ।।

वातायन के जाल से (खिड़की से) अंदर आती सूर्य की किरणों में जो अति लघु कण दिखते हैं, उसके छठे भाग को परमाणु कहते हैं। 

यह उदाहरण दर्शाता है की न तो वैदिक ज्ञान लुप्तप्रयोग अथवा अप्रचलित (obsolete) है तथा न ही ये व्यर्थ अथवा अप्रासंगिक (irrelevant) है। आधुनिक विज्ञान के तीनों भागों – भौतिक शास्त्र (physics), रसायन शास्त्र (chemistry) और जीव शास्त्र (biology, zoology) का उद्भव इसी भारतीय दर्शन से हुआ है। इसके सभी मूलभूत सिद्धांतों को जानना, वैदिक विद्या को पढना व सीखना, आज के समय में प्रखरतम, तेजस्वी व रचनात्मक वैज्ञानिक व दार्शनिक दोनों बना सकता है। 

इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन: । मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु स: ।।

भगवद्गीता 3.42

इंद्रियों के परे मन है, मन के परे बुद्धि है और बुद्धि के भी परे आत्मा है ।

यात्रा जारी है….

प्रथम गुरुओं को नमस्कार

सदाशिव समारंभां शंकराचार्य मध्यमाम् ।
अस्मद् आचार्य पर्यंतां वंदे गुरू परंपराम् ।।

मेरे प्रथम गुरु मेरे माता- पिता हैं। प्रथम शब्द, विचार, विद्या, आहार, संस्कार, सभी कुछ हमें इनसे ही मिलता है।

आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु पूर्णिमा का दिन अपने गुरुओं को प्रणाम करने, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व निष्ठा व्यक्त करने के लिए समर्पित है।

अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला – गुरु!ईश्वर को प्राप्त करने का, ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग केवल गुरु प्रशस्त करता है। हमें ईश्वर के, ज्ञान प्राप्ति के योग्य बनाता है। गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं, ये हम सब जानते हैं और अधिकतर मानते भी हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को नियत करने वाले भारतवर्ष के वासी तो जानते ही होंगे। मैं अपने आपको बहुत सौभाग्यशाली मानती हूँ क्योंकि कई रूपों में, विविध परिस्थितियों में, मेरे लिए आवश्यक गुरु को ईश्वर ने सदैव मुझसे मिलाया है।

मेरे प्रथम गुरु मेरे माता- पिता हैं। हम सभी के होते हैं। इस संसार में जन्म लेने के बाद पहला सभी कुछ इन्हीं से सीखते हैं। प्रथम शब्द, विचार, विद्या, आहार, संस्कार, सभी कुछ इनसे ही मिलता है। माता-पिता रूपी गुरुओं को मेरा साष्टांग प्रणाम !

गुरु के इस रूप से परे गुरुओं के कई अन्य रूप हैं – मानव रूपी ज्ञानी गुरु जो आपको शिष्य स्वीकार करे; ‘जीवन में प्राप्त हुआ अनुभव’ तथा ‘ईश्वरीय शक्ति की अनुभूति’, जो अंततः आपको उसी ईश्वर के ओर ले जाती है – ये सभी गुरु हैं।

(इस वर्ष) आज का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज ही के दिन, माता पिता मुझे अपनी संतान के रूप में इस संसार में लाए थे। उनकी इस कृपा के लिए उनका धन्यवाद! इमेरजेंसी के काल में, बीच दिल्ली में, कुछ कठिन परिस्थितियों में जन्म लेने वाली इस बालिका को एक सक्षम व विचारशील नारी में परिवर्तित करने के लिए उनकी व सभी गुरुओं की ऋणी हूँ।

इसी अवसर पर कुछ स्मृतियाँ पिरो कर आत्ममुग्ध भी हो रही हूँ। सबको नमस्कार!

स्वयं

मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् |स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः ||

गुरूगीता

हे देवी ! गुरु यह दो अक्षरवाला मंत्र सब मंत्रों में राजा है, श्रेष्ठ है | स्मृतियाँ, वेद और पुराणों का वह सार ही है, इसमेंसंशय नहीं है |

यात्रा जारी है…..

टिकटॉक, इंद्रजीत और अक्षपाद

आज भारत में कई अन्य एप्प के साथ साथ टिकटॉक भी बंद हो गया है (वर्तमान में तो हो गया है, भविष्य के बारे में ज्ञात नहीं)। भयंकर हलचल है अंतर्जाल पर! जीवन, जीवन का सार, जीविका, जिजीविषा – न जाने क्या क्या छिन्न-भिन्न हो गया है कितने भारतीय नागरिकों का । विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर विविध प्रकार की प्रक्रियाएँ हैं। कहीं लोग दुःखी हैं कि नेत्रों को शांति देने का साधन छिन गया। कहीं लोग चिंतामुक्त हैं कि जो दृष्टि-पंक इतनों (विशेषकर युवाओं) को घेरे था, वहाँ निर्मल जल आने का मार्ग बना । कुछ संस्थाएँ भारतीयता के नाम पर उसका विकल्प, दृष्टि-पंक के एक दूसरे कुंड के रूप में क्रय-विक्रय करने के लिए प्रस्तुत हैं ।

आज चक्षुरिन्द्रीय परोक्ष रूप से सबकी चर्चा का केंद्र हैं क्योंकि इसके आकर्षण के कारण आज भारत में टिकटॉक के लगभग 12 करोड़ उपभोक्ता हैं।

चक्षुरिन्द्रीय को कुछ भारतीय पंक परोसने के इस कोलाहल में चलिए , कुछ इसके दार्शनिक ज्ञान अर्जन का भी प्रयास करते हैं। भारतीय ज्ञान व दर्शन के अनुसार मनुष्य की पाँच कर्मेन्द्रियाँ व पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। कर्मेन्द्रियाँ जो हमें कार्य करने में सहायता करती हैं। व ज्ञानेन्द्रियाँ जो हमें किसी पदार्थ ,तत्व के लक्षण अथवा गुण का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाती हैं। ये पाँच हैं – घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, त्वगेन्द्रिय व श्रवणेन्द्रिय । ये इन्द्रियाँ क्रमशः हमारी नासिका, जिह्वा, नेत्रों, त्वचा व कर्णों में स्थित होती हैं। इनके लक्षण या अर्थ हैं – गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द।

चक्षुरिन्द्रिय हमें देखने की क्षमता प्रदान करती हैं। सभी ज्ञानेंद्रियों से सुसज्जित हम इन्हें अपनी सामान्य क्षमता का भाग मानकर इसे ‘taken for granted’ लेकर चलते हैं। इनमें चक्षुरिन्द्रिय कदाचित सर्वाधिक मूल्यवान मानी जाती हैं। इस इन्द्रिय के निष्क्रिय होने से हमें सबसे अधिक बाधा होती है। टिकटॉक की सामग्री सेवन के लिए भी इसी इन्द्रिय का सर्वाधिक प्रयोग होता है।

न्याय शास्त्र कहता है :

चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रुपम् ।

 चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वे सति गुणत्वं रुपत्वम्।

जिस गुण का ग्रहण मात्र चक्षु इन्द्रिय के द्वारा ही किया जाता है, उसे रूप कहते हैं। अर्थात् जो केवल रूप मात्र का ग्रहण करे, रूप से इतर जो विशेष गुण ग्रहण न करे, उसे चक्षु इन्द्रिय कहते हैं।

यही टिकटॉक के उपभोक्ता करते हैं! इस इन्द्रिय का अच्छा अधिष्ठान कर लिया है।

इस इन्द्रिय के एक अन्य पक्ष का मेरा अनुभव इससे भिन्न है । जीवन में कई बार दृष्टि बाधित बच्चों/ वयस्कों के साथ काम करने का, उनके साथ समय बिताने का उनकी किसी प्रकार की सहायता करने का अवसर मिला है। उस समय जब भारत में ऑडियो बुक्स और पॉडकास्ट प्रचलित नहीं थे (टिकटॉक तो बहुत दूर की बात है), हम कार्यालय के मित्र मिलकर एक दृष्टि-बाधित बालिकाओं के विद्यालय के लिए उनकी पाठ्य पुस्तकें रेकॉर्ड किया करते थे (आप वॉकमैन जानते हों कदाचित)। उस विद्यालय की संस्थापक व प्रबंधक ने (जो स्वयं दृष्टि-बाधित हैं) अपने जीवन की आई बाधाओं से सीखकर ऐसी कई अन्य बालिकाओं के जीवन को आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता से परिपूर्ण करने का बीड़ा उठाया था। आज भी उनकी संस्था इस क्षेत्र में एक प्रखर व अग्रणी संस्था के रूप में सम्मानित है। एक अन्य संस्था ऐसी वयस्क होते बालक-बालिकाओं को जीविका के लिए कुछ विद्या, कला व शिक्षा देने के क्षेत्र में कार्यरत है। उनमें से एक बड़ी संख्या संगणक (computer) प्रक्षिक्षण प्राप्त करती है और अनेक तेजस्वी प्रोग्रामर समाज को दे चुकी है। इन सभी स्थानों में एक भी बालक ऐसा नहीं मिला जो चक्षुरिन्द्रिय के अभाव में दुःखी हो अथवा उस कारण अपने आप को कोई भी कार्य करने में असमर्थ समझते हों।

कितना भयंकर विरोधाभास है कि टिकटॉक पर प्रतिबंध से कितने युवा चक्षुरिन्द्रिय के मनोरंजन वंचित होने से दुखी हैं।

अभी कुछ दिन पूर्व ट्विटर पर एक वीडियो देखा था एक दृष्टि-बाधित, नेत्रहीन युवक का । उसका नाम इंद्रजीत है, बड़ी प्रसन्नता से मग्न हो कर वो शिव तांडव स्तोत्र गा रहा है (credit: Youtube channel bihar mail)।

ये वीडियो देखकर मुझे इंद्रजीत शब्द का उसके सही स्वरूप में अर्थ धारण हुआ। इंद्रजीत (संस्कृत – इंद्रजित्)  अर्थात् अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला। वो जो इन्द्रियों पर निर्भर न रहे। ये नवयुवक उचित अर्थ में इंद्रजीत है। इसकी अपनी चक्षुरिंद्रिय पर किंचित भी निर्भरता नहीं है। इसने वास्तविक अर्थ में अपनी इंद्रिय को जीत लिया है।

एक अन्य परिपेक्ष्य हैं गौतम मुनि का।  न्याय सूत्र या न्यायशास्त्र के प्रवर्तक प्रणेता, जिनका औपाधिक नाम अक्षपाद भी है। अक्षपाद अर्थात् वह जिसमें गति व दृष्टि दोनों हों। इसकी कथा है कि गौतम मुनि का मन निरंतर तत्व चिंतन में लगा रहता था । नेत्र को मन का सहयोग नहीं मिल पाता था, अतः वे चलते-चलते प्रायः गिर जाया करते थे और आहत हो जाते थे। इस लिए महेश्वर ने कृपा कर उनके पैर में एक ऐसे नये नेत्र की रचना कर दी जिसे मन के सहयोग की अपेक्षा ना थी । इस नये नेत्र के मिलने से वे अक्षपाद  नाम से प्रसिद्ध हुए। और इससे उनके दोनों कार्यों – चलने फिरने तथा तत्वचिंतन करने की बाधाएँ दूर हो गयीं । भारतीय प्रमेयप्रधान न्याय दर्शन को किस पद पर उन्होंने आसीन किया है, ये मुझे कहने की आवश्यकता भी नहीं है।

महेश्वर तो स्वयं त्रिनेत्रधारि हैं, यद्यपि उनका तीसरा नेत्र ज्ञानचक्षु है। उसकी पात्रता की अपेक्षा आज के टिकटॉक योद्धाओं से करना अपनी ही मानहानि करना है।

इन दोनों दृष्टांतों के बाद टिकटॉक पर पूर्णतया आश्रित इन कोटि कोटि युवाओं को देखकर रिक्तता का, खेद का अनुभव होता है। इनसे क्या अपेक्षा कर सकते हैं – इंद्रजीत अथवा अक्षपाद बनने या होने की ? ये कोटि कोटि उपभोक्ता जो अपने दृष्टिसुख (व किंचित श्रवणसुख) के लिए अपना बहुत कुछ विस्मरण कर २ घड़ी के विडीओ के लिए अपनी मनोस्थिति को रुग्ण व आहत कर रहे हैं और उन्हें आभास भी नहीं है।

अब टिकटॉक गया तो कोई भारतीय ऐप उन्हें इस अंतहीन अतृप्त कामना की मरीचिका में ले जाने को तत्पर है।

मेरे चक्षुरिंद्रिय अनेकों इंद्रजीत व अक्षपाद देखने को लालायित है, आशान्वित है!

न जातु काम: कामनामुपभोगेन शाम्यति

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाऽभिवर्धते।।

मनुस्मृति २।६४

मनुष्य की कामनाएँ भोग करने से तृप्त नहीं होतीं, किंतु जैसे अग्नि की ज्वाला घृत डालने से बढ़ती है, इसी प्रकार कामनाएँ भोग करने से और अधिक बढ़ जाती हैं।

यात्रा जारी है……