क्या इतिहास को समझने के लिए उसे पहले पढ़ाया जाना आवश्यक है? या उसे कहानियों, पात्रों और मनन के माध्यम से धीरे-धीरे अनुभव भी किया जा सकता है?
शास्त्रीय शिक्षा-पद्धति यह बताती है कि बाल्यावस्था के अलग-अलग चरणों में ज्ञान देने का तरीका भी अलग होता है। लगभग 11-15 वर्ष की आयु में मनोमय कोश के विकास के साथ बच्चे में स्वतंत्र चिंतन आकार लेने लगता है। यह वह समय है जब साहित्य के माध्यम से विचार, मूल्य, संस्कृति और इतिहास को सहज रूप से मन में उतारा जा सकता है। 16-20 वर्ष की आयु में चरित्र अधिक प्रभाव डालते हैं– जिन पात्रों को युवा देखते, समझते और आदर्श मानते हैं, वे बिना सीधे उपदेश के प्रेरित और शिक्षित करते हैं।
क्रांतिदूत इसी शास्त्रीय दृष्टि को भारत के इतिहास से जोड़ने का एक प्रयास है। दस पुस्तकों की यह साहित्यिक शृंखला भारत के कम जाने गए क्रांतिकारियों के जीवन, संघर्ष और चरित्र को नई पीढ़ी तक पहुँचाती है। इसकी पहली दो पुस्तकें, झाँसी फाइल्स और काशी, अब एक विशेष डिजिटल रीडिंग अनुभव के रूप में उपलब्ध हैं।
यह केवल पुस्तक पढ़ने का अनुभव नहीं है। पढ़ते हुए बीच-बीच में दिए गए सहज, संवादात्मक प्रश्न और MCQs पाठक को रुककर सोचने और समझने का अवसर देते हैं। पुस्तक के अंत में पाठक को अपने विचार लिखकर साझा करने के लिए भी स्नेहपूर्वक प्रेरित किया जाता है। इस तरह, ये प्रश्न और MCQs बिना किसी परीक्षा के, पढ़ने और सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं।
हम विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्राचार्यों, संस्थापकों, न्यासियों, विभागाध्यक्षों और कुलपतियों को आमंत्रित करते हैं कि वे इस 10-पुस्तकीय शृंखला को अपने संस्थान में नियमित पठन-अनुभव या पूरक पाठ्यक्रम के रूप में अपनाने पर विचार करें – ताकि भारत का इतिहास केवल पढ़ाया न जाए, बल्कि युवा उसे पढ़ें, समझें, उस पर विचार करें और उससे प्रेरणा लें।
अधिक जानने के लिए :
यहाँ क्लिक करें : झाँसी फाइल्स
यहाँ क्लिक करें : काशी
भारत परिक्रमा ज्ञान धारा को विस्तार से जानें : भारत परिक्रमा.