पंचकोष विज्ञान और पंचकोष आधारित विकास

मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य क्या है ? जीवन की सार्थकता कहाँ पर है ? विकास का परमोच्च शिखर क्या है ? तृप्ति और आनंद की प्राप्ति किस बिन्दु पर है? इन सब प्रश्नों के जवाब तब मिलते हैं इसकी अनुभूति तब होती है जब हम पंचकोश को जानते हैं। पंचकोश का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है । आयुर्वेद के ग्रंथों मे, अध्यात्म के ग्रंथों मे, उपनिषदों में पंचकोश का विस्तृत वर्णन किया गया है । भारतीय शिक्षा का तो फलितार्थ ही पंचकोश के विकास को बताया गया है ।

मानव अस्तित्व के पाँच तत्व माने गये हैं – शरीर ( इंद्रिय), प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा । इन पांचों का समन्वय होकर पूरा शरीर बनता है, जब तक ये न हो तब तक शरीर पूर्ण नहीं माना जाता है अर्थात क्रिया करने में समर्थ नहीं होता है। इस अधिष्ठान को समझना प्राथमिकता है। इस शरीर को समझना प्रथम सोपान है  अर्थात अन्नमय कोश, शरीर के अंदर की शक्ति को समझना द्वितीय है अर्थात प्राणमय कोश, क्रिया के प्रेरक विचार या मन को समझना तृतीय है अर्थात मनोमय कोश, विचार की प्रेरक बुद्धि को समझना चौथा सोपान है अर्थात विज्ञानमय कोश और इन सब से भी ऊपर, बुद्धि से पर वह तत्व जिसको हम आत्मा कहते हैं, उसको समझना अंतिम सोपान है अर्थात आनंदमय कोश । आत्मा के ऊपर जो पांच परते हैं वो पांच कोष (sheaths) हैं – अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनंदमय कोश। पांचों कोष उत्तरोत्तर सूक्ष्म हैं। अन्नमय से सूक्ष्म प्राणमय, प्राणमय से सूक्ष्म मनोमय, मनोमय से सूक्ष्म विज्ञानमय और विज्ञानमय से आनंदमय कोष (चित्त) है जो सूक्ष्मतम है। 

विकास को बाहर से नहीं लाया जा सकता।  शरीर बाहर से नहीं बढ़ता अपितु अंदर कुछ ऐसी प्रक्रिया होती है कि शरीर अंदर से बढ़ता जाता है । कोश यह समझाता है कि जितनी भी प्रक्रिया होगी वह अंदर होगी और विकास अंदर से बाहर की ओर होता है। शरीर के भीतर से कुछ होगा वह कोशों की परत दर परत बाहर आएगा। 

यही जानकर ऋषि-मुनियों ने किस परत पर कार्य करना चाहिए उसका विज्ञान समझाया, वह कैसे करना है ये समझाया, क्या कार्य है, वह कैसे होता है और इसका परिणाम क्या है वह सब समझाया उसे ही पंचकोश का पूरा विज्ञान कहते हैं । यह कोश का विज्ञान है कि किस परत पर कार्य होता है। पंचकोश विज्ञान को जब हम जानते हैं तो उसमे क्रियाकारिता नहीं है, केवल समझना है । पंचकोश विकास को जब जानते हैं तो उसमें क्रियाकारिता है, कर्तव्य का बोध है कि क्या करना है उसके विज्ञान को समझना पंचकोश के विकास को समझना है।पंचकोश का विकास जब कहा जाता है तब विकास में कर्तव्य का बोध है कि क्या कार्य होता है।

संस्कृति आर्य गुरुकुलम् , पंचकोश आधारित विकास के सिद्धांत द्वारा विधिवत शिक्षा व जीवन के विकास का अविरत कार्य आदर्श समाज के निर्माण के लिये कर रहा है। पंचकोश विकास का मार्गदर्शन संस्कृति आर्य गुरुकुलम के वर्तमान अध्यक्ष आचार्य मेहुलभाई सत्रों, शिविरों तथा अध्ययन विषयवस्तु के माध्यम से देते हैं।

भगवद्गीता कैसे पढ़ें

आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति इतना भाग्यशाली नहीं कि उसे गुरू का सानिध्य या उनके द्वारा ज्ञानप्राप्ति हो । ऐसे में,गुरु के अभाव में यदि कोई भगवद्गीता पढ़ना चाहता है तो वो कैसे पढ़े? यदि स्वाध्याय भी कर रहे हैं तो किस विधि और क्रम से करें तो वह प्रभावी हो और पूर्ण हो सके?
भगवद्गीता पढ़ने के इच्छुक लोग व्यापक रूप से ये अवरोध और प्रश्न अनुभव करते है। इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने के लिए इस लेख में भगवद्गीता अभ्यास की प्रभावी विधि पर प्रकाश डाला गया है।

भगवद्गीता अभ्यास की प्रभावी विधि

यहाँ गीता शब्द के प्रयोग का अर्थ है- भगवद्गीता! वो गीता का संदेश जो महाभारत के युद्ध के पहले दिन, मार्गशीर्ष एकादशी को, युद्ध आरम्भ होने से पहले भगवान ने कृष्ण रूप में अर्जुन को कहा था। यह संदेश अथवा भगवद्गीता, महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है। महामुनि व्यास ने आने वाले समय के अनुकूल उसे विभिन्न योगों में विभाजित किया तथा कालान्तर में गीता का एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में अस्तित्व होने पर अध्यायों में पाठ संख्या का क्रम मुख्य हो गया।  भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों को सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है जो वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ हैं। उपनिषदों की कई विद्याओं का उल्लेख व रहस्य, सांख्य दर्शन का सत, विभिन्न योग रूपी साधनों द्वारा व्यक्ति का कल्याण, आदि बहुत कुछ भगवद्गीता में मिलता है। इस कारण इसे जानने की उत्सुकता होती है और अभ्यासरत रहने पर जिज्ञासा जागृत हो जाती है। इस विषय पर सहायता करने के लिए अनेक पुस्तकें उपलब्ध है ।भगवद्गीता विश्व का सर्वाधिक अन्य भाषाओं में अनुवादित ग्रन्थ है। भारत में गीता प्रेस के विभिन्न संस्करण सर्वाधिक प्रचलित है। 

पाठों का बन्धारण

गीता की अध्याय संख्या व उनके विषय इस प्रकार हैं :-

  1. पहला अध्याय –  अर्जुनविषादयोग
  2. दूसरा अध्याय -सांख्ययोग
  3. तीसराअध्याय – कर्मयोग
  4. चौथा अध्याय -ज्ञानकर्मसन्‍यासयोग
  5. पाँचवाँ अध्याय -कर्मसन्‍यासयोग
  6. छ्ठा अध्याय -आत्मसंयमयोग
  7. सातवाँ अध्याय -ज्ञानविज्ञानयोग
  8. आठवाँ अध्याय -अक्षरब्रह्मयोग
  9. नौवाँ अध्याय -राजविद्याराजगुह्ययोग
  10. दसवाँ अध्याय – विभूतियोग
  11. ग्यारहवाँ अध्याय -विश्वरूपदर्शनयोग
  12. बारहवाँ अध्याय -भक्तियोग
  13. तेरहवाँ अध्याय -क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग
  14. चौदहवाँ अध्याय -गुणत्रयविभागयोग
  15. पन्द्रहवाँ अध्याय -पुरुषोत्तमयोग
  16. सोलहवाँ अध्याय -दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  17. सत्रहवाँ अध्याय -श्रद्धात्रयविभागयोग
  18. अठ्ठारहवाँ अध्याय -मोक्षसन्यासयोग

आधुनिक समय में व्यक्ति द्वारा गीता को पुस्तक जानकर उसे दी गई प्राथमिकता 

आधुनिक समय में व्यक्ति की ज्ञान अर्जित करने की आकांक्षा अधिकतर अपने आप पढ़ने तक सीमित होती है जिसके लिए वह पुस्तकों को आधार स्तम्भ बना लेता है। शुद्ध शास्त्रीय ज्ञाता-विद्वान से ग्रहण करने के बजाय लोग आपस में चर्चा कर अपने अनुभव व मत-मतान्तर साझा करते हैं और भगवद्गीता जैसे सशक्त ग्रन्थ को भी एक प्रेरक पुस्तक की तरह, एक कॉफी टेबल पुस्तक की तरह पढ़ने के प्रयास करते रहते हैं। सही विधि के अभाव में ‘हिट एण्ड ट्रायल’ से पढ़ने का प्रयास करते है और अधिक आगे नहीं जा पाते। जैसे हम किसी भूल-भुलैया (मेज़) में जाये तो लक्ष्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग जान पड़ते हैं, हम अपने अनुमान से एक मार्ग पर चल पड़ते हैं जो कुछ दूर जाकर बन्द हो जाता है। तो या तो उस अवरोध पर हम रुक जाते हैं या पुन: आरम्भ पर आते हैं। मार्ग जब तक सही नही होगा, लक्ष्य तक नही पहुँचेंगे। ऐसे में जानकार द्वारा सुझाये मार्ग पर चलने से उस लक्ष्य के सही मार्ग से आगे बढ़ते हैं। उसी प्रकार, गुरु द्वारा बतायी विधि से भगवद्गीता पढ़ने पर हम उसे जानने समझने के लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं और अध्ययन कार्य को पूर्ण कर पाते है।

यह स्वीकारिता सबसे पहले लानी आवश्यक है कि स्वयं से गीता अध्ययन कठिन है। अठारह अध्यायों के शब्दार्थ तो पाठक किसी भी श्रेष्ठ सुझाई / जानी प्रणाली से पढ़ लेगा। – किन्तु पाठक को अधिक कुछ नहीं समझेगा।वह जिस दृष्टि से समझता है वो न तो पूर्ण है  न सक्षम लेकिन आज के समय का सत्य यही है कि अधिकतर व्यक्तियों के गुरु नहीं है न उस दिशा में कोई कार्य है। लेकिन गीता पढ़ने की, उसे जानने की इच्छा है तो ऐसे में व्यक्ति क्या करे?

गीताध्ययन की प्रभावी विधि 

इसे जानने के लिए दो पक्षों को समझना आवश्यक है:

पहला पक्ष – गीता को पढ़ने और समझने के लिए निरन्तरता, दीर्घकालिता तथा सत्कार का व्रत

व्यक्ति सबसे पहले क्या पढ़े? इस प्रश्न का उत्तर इस पक्ष से मिलता है। पतञ्जलि योग सूत्र में बताते हैं-अभ्यासवैराग्याभ्याम् तन्निरोधः॥१.१२॥ स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमि:॥१.१४॥ जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्॥२.३१॥

गीता अध्ययन के लिए इन तीन सूत्रों की प्रेरणा कुछ इस प्रकार होगी कि अभ्यास से चित्तवृत्तियों का निरोध होता है और बहुत समय तक निरन्तर और श्रद्धा के साथ सेवन किया हुआ वह अभ्यास दृढ़ अवस्था वाला हो जाता है और यह , सब अवस्थाओं में पालन करने योग्य महाव्रत है। अध्ययन साधना की यह साथन रूपी चाबी महर्षि पतञ्जलि ने उपलब्ध कराई हुई है।

निरन्तरता, नियमित रहने से आती है और नियमित रहने का सबसे प्रभावी साधन है उच्चारण अर्थात् गीता का नियमित रूप से वाणी द्वारा संस्कृत पाठ का स्पष्ट उच्चारण या आवृत्ति! हममें से कई को संस्कृत पढ़ना व उसका उच्चारण नहीं आता तो उसे सीखने का यही अवसर है। असंख्य व्यक्ति, समूह, संस्थाएँ ये कार्य प्रत्यक्ष तथा ऑनलाइन निःस्वार्थ रूप से कर रहे हैं। उनसे उच्चारण सरलता से सीखा जा सकता है।

उच्चारण सीखने से, आवृत्ति करने से नियमितता आती है, गीता के प्रति सहजता आती है, फलतः दृढ़ता आती है और व्यक्ति का विश्वास बढ़ता है कि वह कुछ जान रहा है। जैसे-जैसे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है, वैसे वैसे उसके अर्थ की ओर व्यक्ति की जिज्ञासा बढ़ती है। इसमें एक अपेक्षा यह भी रहती है कि इससे वह साथ- साथ संस्कृत सीख रहा है। वह नहीं भी सीखे तो उच्चारण आदि सीखने से उसका गीता से परिचय बढ़ता है, उदाहरण के लिए- कितने अध्याय है, कौन सा अध्याय किस योग की बात करता है, कहाँ सर्वाधिक श्लोक हैं, आदि। अर्थात् गीता का मूलभूत परिचय उच्चारण सीखते सीखते हो जाता है। 

सस्वर पाठ तथा कण्ठस्थीकरण ( याद करने) की सरलता के अनुसार पाठ क्रम:

गीता के अध्‍यायो का आवृति अथवा शब्दार्थ को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार क्रम रखा जाता है( यह सीखने या सिखाने वाले के अनुसार भिन्न भी हो सकता है) – पन्द्रहवाँ, बारहवाँ, सोलहवाँ, नौवाँ, दसवाँ, पहला, दूसरा, आठवाँ, छठा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, सातवाँ, तेरहवाँ, चौदहवाँ, सत्रहवाँ, अठारहवाँ तथा ग्‍यारहवाँ।

इस क्रम का कारण अध्याय में श्लोकों की संख्या, उनका सरल उच्चारण, साधारण अर्थ की रोचकता, छन्दों की अथवा विभक्तियो आदि की एकरूपता, आदि होते हैं। गीता प्रेस की पुस्तकों में कण्ठस्थ करने के लिए श्लोक- आवृति और संख्या आदि स्मरण करने की कई युक्तियाँ दी गयी रहती है अथवा अनुभवीजन अन्य प्रभावी स्मरण युक्तियाँ बताते हैं।

छोटे बच्चे श्लोकों की बार -बार आवृति करें और बड़ी अवस्था वाले व्यक्ति श्लोकों के पदच्छेद और शब्दार्थ को ध्यान में लाकर फिर श्लोको की आवृत्ति करें तो श्लोक स्मरण होते चले जाते हैं। समूह पाठ करने से आयु जनित संकोच दूर होता है तथा उच्चारण की छोटी मोटी त्रुटि ठीक होती रहती हैं। लयबद्ध पाठ-आवर्तन आनन्दित करता है और भिन्न रागों में गाने पर व्यक्ति का मधुर मनोरजंन होता है। ऐसे धीरे- धीरे उसमें रस आने लगता है।

इसी सब में गीता के सही अर्थ को जानने की स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा उत्पन्न होती है। गीता के प्रयोजन को जानने के लिए व्यक्ति सनद्ध होता है।

अर्थ और तत्व के अनुसार पाठ क्रम:

सही अर्थ में गीता के तत्व और प्रयोजन को जानने के लिए अध्ययन इस क्रम में किया जाना चाहिए। इस क्रम में भगवद्गीता के ज्ञाता अथवा गुरु और उनके अभाव में टीका , व्याख्या की सहायता से अर्थ ज्ञान प्राप्त करने ( श्रवण – मनन – निधि ध्यासन) का प्रयास वांछनीय है:

पहला, तीसरा, पाँचवा, सातवाँ, नौवाँ, ग्यारहवाँ, तेरहवाँ, पन्द्रहवाँ, सत्रहवाँ फिर दूसरा, चौथा, छठा, आठवाँ, दसवाँ, बारहवाँ, चौदहवाँ , सोलहवाँ और अठारहवाँ ।

इस क्रम के कारण को गुरु समझाता है तथा जिज्ञासु को आत्म ज्ञान तथा मोक्ष के पथ पर ले चलता है। ये पुस्तकों में लिखित नहीं मिल पाता है। आरम्भ विषाद से होता है और अंत मोक्ष में होता है। 

तो सबसे पहले युद्ध और व्यक्ति का विषाद, फिर कर्म की चेतना , फिर कर्मसन्‍यास, फिर ज्ञान-विज्ञान फिर राजविद्या राजगुह्य की महिमा, पश्चात विश्वरूप दर्शन, फिर क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का विभाग, पुरुषोत्तम का ज्ञान,उसके पश्चात परमात्मा के प्रति श्रद्धा के तीन विभाग।

ऐसे पहले स्थितप्रज्ञ, फिर ब्रह्म की उपासना, फिर आत्म संयम योग, फिर आत्मा से ऊपर का अक्षर ब्रह्म का ज्ञान, फिर सर्वत्र ब्रह्म दर्शन ( विभूति योग) । उसके पश्चात भक्ति घटित होती है जिससे गुणत्रय से व्यक्ति अतीत होता है, फिर दैवी सम्पदा को प्राप्त करके मोक्ष सन्‍यास की प्राप्ति होती है। मोक्ष से पहले क्या है तो दैवी सम्पदा है , इस माया को अतीत करके मोक्ष की प्राप्ति है। उससे पहले गुणातीत अवस्था है। गुणातीत अवस्था से पहले भक्ति है। उससे पहले ब्रह्म दर्शन है, उससे पहले अक्षर ब्रह्म को जानना है, उससे पहले आत्म संयम है। उसकी आवश्यकता क्यों है क्योंकि ब्रह्म की उपासना है फिर उस उपासना के लिए आदर्श स्थितप्रज्ञ होना है ( सांख्य योग)।

अब मन में ये प्रश्न उठता है कि पाठबद्ध व्यास जी ने किया तो उसी क्रम से पढा जाना चाहिए। यहां समझने का विषय है कि आर्ष ग्रन्थ सूत्र रूपी होते हैं अर्थात कुछ व्यक्त होता है और कुछ अव्यक्त होता है और वह गुरू की चेष्टा से व जिज्ञासु की पात्रता से घटित होता है।अर्थ-क्रम से अध्ययन और उसका चित्त में धारण वास्तव में जिज्ञासु के आत्म विकास की यात्रा है। जिसकी परिणति मोक्ष में होकर भगवद्‌गीता का प्रयोजन सिद्ध होता है।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा ( संजय का) मत है॥

दूसरा पक्ष – अनुबन्ध चतुष्ट्य से गीता अध्ययन  

व्यक्ति इस विधि से ही क्यों पढ़े? इस प्रश्न का उत्तर इस पक्ष से मिलता है। विषय, अधिकारी, सम्बन्ध, प्रयोजन – किसी बात को जानने के लिए ये चार मुख्य अनुबन्ध चतुष्टय कहलाते हैं । इन सब के मूल में है जिज्ञासा ।

गीता को पढ़ने की उत्सुकता का आरम्भ हमारे निजी स्वार्थ से होता है – गीता मेरी सहायता कैसे कर सकती है / गीता से मैं कैसे अधिक सफल हो सकता/ सकती हूँ ? गीता को जानना, पढ़ना शरीर के स्तर से होता है, पर कहने वाला गुरु शरीर से ऊपर होना चाहिए तभी तो वो शरीर से ऊपर की बात बता पायेगा। इसलिए जो भाष्य है, व्याख्या है , उसके अध्ययन की ये एक रीति है जो गुरु/ विद्वान के मार्गदर्शन में पालन करी जाती है। गीता है या दर्शन शास्त्र है, उसे पढ़ने या पढ़ाने की एक रीति आयी है वो रीति से पढेंगे तो वास्तविक अर्थ को जान पायेंगे, प्रयोजन को जान पायेंगे, उसके अधिकारी को जान पायेंगे, उसके सम्बन्ध को जान पायेंगे और इसके विषय को जान पायेंगे।

निरन्तरता, दीर्घकालिता और सत्कार के अभ्यास गुण तब तक नहीं आयेंगे जब तक व्यक्ति को प्यास नहीं लगेगी, उसे जिज्ञासा नहीं होगी। इसके लिए ब्रह्म सूत्र में बताया है कि सबसे पहले जिज्ञासा अर्थात् ब्रह्म जिज्ञासा आवश्यक है। जब तक जिज्ञासा नहीं तब तक आगे बढ़‌ना नहीं होगा। स्वाध्याय से ही आगे बढ़ेंगे तो कितने प्रश्न तो उठेंगे ही नहीं ।

अब जिज्ञासा कैसे आयेगी? जिज्ञासा वातावरण से आयेगी। तो वातावरण तैयार किया जाना चाहिये। भले ही गीता केकितने कोर्स कर लें, लेकिन वातावरण नहीं तो जिज्ञासा लगाना कठिन है। ये सर्वप्रथम है। ये व्यक्ति कई प्रकार से कर सकता है। नियमित पाठ करना इसका प्रभावशाली साधन है, उसे सत्संगति में करना और भी अच्छा।

अनुबन्ध चतुष्ट्य में पहला है विषय – विषय क्या है?जैसे विषय है ब्रह्म का प्रतिपादन करना , यदि ग्रन्थ में वो बात न आये तो वह ग्रन्थ उस विषय का नहीं कहा जायेगा।

दूसरा है विषय का अधिकारी अर्थात उसे ग्रहण करने के लिए कौन है? यहाँ जिज्ञासु अधिकारी है !

 यदि कोई जिज्ञासु नहीं है तो स्पष्ट है कि वो नहीं ही समझ पायेगा। जब जिज्ञासा होती है तभी उसे पता चलता है इससे क्या होगा! जो अधिकारी नहीं है वो गीता समझ भी लेगा तो उसे प्रश्न आयेगा कि ये बात तो मैने जान ली लेकिन उससे क्या अन्तर पड़ा? इसे जानकर क्या होगा? पूरा भाष्य भी पढ लिया .जाये या गीता विद्यालय पाठ्‌यक्रम में भी आ जाये तो उसका अर्थ सब नहीं पढ सकेंगे क्योकि गीता को कोर्स में लाया जा सकता है, सबको अधिकारी नहीं बनाया जा सकता। शिक्षक भी पढ़ लेगा तो उसके मन में प्रश्न आयेगा कि मैंने पूरी गीता भी पढ ली किन्तु उससे मुझे क्या लाभ हुआ? जिज्ञासु होता तो उसे जो मिलता उसके बाद ये प्रश्न नहीं आता कि मुझे क्या मिला! भूखे को भोजन जाये तो वो सोचता है कितना अच्छा हो गया भोजन मिल गया। उसे बहुत महत्व की वस्तु मिली लगती है। उसके पास कुछ धन-सम्पत्ति नहीं है। किन्तु भूखे के पास तृप्ति है और ये जो तृप्ति है, वह भूख के कारण है, भोजन के कारण नहीं है। ऐसे ही जिज्ञासु को गीता के अध्ययन से जो प्राप्त होता है वह गीता के पढ़ने के कारण नहीं उसकी जिज्ञासा के कारण है।

अपने स्तर पर व्यक्ति कैसे पता लगा सकता है कि उसे केवल उत्सुकता है या जिज्ञासा है ? उसके प्रश्न पूछने से, विषय की, सीखने की तीव्रता से पता चलता है कि उसे जिज्ञासा है अथवा केवल उत्सुकता । उसे किस विषय में रस है? जैसे अध्यात्म में रस है तो उसे अध्यात्म की तत्व की जिज्ञासा है । लेकिन राजनीति में अथवा व्यवहारिकता में अथवा बाह्य वस्तुओं में रस है तो पता चलता है ये जिज्ञासा नहीं केवल उसकी उत्सुकता है। कुछ नया जानने की उत्सुकता स्वाभाविक होती है। जो हर किसी में हो सकती है। जिज्ञासा एक स्तर पर जाकर होती है, सबको नहीं होती है। 

विषय, अधिकारी, फिर दोनों को सम्बन्ध – ग्रन्थ और विषय का, ग्रन्थ और अधिकारी का – जब तक नहीं बनता है तब तक वो पूर्णता नहीं आती है। विषय और ग्रन्थ का सम्बन्ध होना चाहिये। ऐसे ही ग्रन्थ और अधिकारी का सम्बन्ध होना चाहिये। जो कही गयी अधिकारिता रखता है वो अधिकारी है । गीता के सम्बन्ध में जिज्ञासु अधिकारी है। जिज्ञासा कब आती है? “तद्‌विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवये ” – प्रणिप्रात परिप्रश्न सेवा ये तीन जो करे वो अधिकारी है, अधिकारी को ज्ञान घटित होगा। जैसे आहार लेने के बाद रक्त बन जाता है ऐसा नहीं है। आहार लेने के बाद जो प्रकिया होती है (आहार को रस, रस के रक्त में परिवर्तित करने की ) वो होनी चाहिए, उससे रक्त बनता है केवल आहार से नहीं। केवल गीता सीखने की तैयारी से गीता नहीं आ जायेगी।

अधिकार प्राप्त करने के लिए क्या करना है? उसके लिए व्यक्ति को प्रयोजन सिद्ध करना है।उसका क्या प्रयोजन है? गीता का प्रयोजन क्या है, वह किस उद्देश्य से कही गयी? वो बनाई एक उद्देश्य से गयी – अर्जुन को सत्य और धर्म का भान करा कर युद्ध को सन्नद्ध करने के लिए, किन्तु प्रयोजन अलग ही था – मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति तक ले जाना। गीता का उपयोग यदि अलग रीति से हो तो वो प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है। 

 प्रयोजन यदि लौकिक है तो अध्यात्म ग्रन्थ का प्रयोजन चरित्रार्थ नहीं होता। लौकिक स्तर पर बहुत से स्थानो पर गीता बहुत सहायता करती है, ऐसे में ये समझ लेना है कि यह गीता का प्रयोजन नहीं है, उसका बाय- प्रोडक्ट है। बाय- प्रोडक्ट का प्रयोजन है कि उसका उपयोग ऐसा भी हो सकता है – जैसे अपने जीविका कमाने के क्षेत्र में गीता के माध्यम से कैसे सफल हों? ये गीता का प्रयोजन नहीं है।

गीता किस प्रयोजन से कही गयी ? तो विषाद से आरम्भ कर मोक्ष तक की यात्रा में जितने पड़ाव है, उनसे होते हुए मोक्ष कर्म या गुणातीत अवस्था को प्राप्त करना। जैसे-विषाद के बाद कर्म का पड़ाव है। कर्म के बाद कर्म सन्यास का पड़ाव है। वो अवस्था जब व्यक्ति कर्म विहीन हो सकता है, कर्म के बाद ज्ञान और विज्ञान की स्थिति आती है तो ज्ञान घटित होता है। ये ज्ञान केवल ज्ञान है, सूचना है या विद्या है? कहते हैं वो विद्या है और वो भी राज विद्या है तो राजविद्या- राजगुह्य योग की स्थिति आती है। राजविद्या घटित हो जाने पर विश्व का यथार्थ दर्शन होता है तो विश्व रूप दर्शन की स्थिति होती है। विश्वरूप दर्शन होने पर भक्ति घटित होती है । इस प्रकार आगे जाते हैं (ऊपर दिये अर्थ क्रम के अनुसार ) और अंततः मोक्ष की स्थिति या गुणातीत अवस्था प्राप्त होती है। व्यक्ति को गीता का यह प्रयोजन सिद्ध करना है, अन्य तो छोटे छोटे प्रयोजन हैं।

इस प्रकार अनुबन्ध चतुष्ट्य के माध्यम से पहले पक्ष में बतायी विधि का कारण स्पष्ट होता है।आधुनिक समय में गीता की सरल सुलभ पहुँच के लिए किये गये प्रयास इसी श्रेणी में आते हैं। किन्तु वह अनुबन्ध चतुष्ट्‌य का पालन नहीं करते हैं। ऐसे में पढ़ते तो सब है किन्तु आगे कम ही बढ़ पाते है। गीता और व्यक्ति का सम्बन्ध स्थापित करने के लिए लोगों को ऊपर नहीं उठा सकते हैं तो गीता को नीचे ले आते हैं। गुरु परम्परा में व्यक्ति को ऊपर उठाने की विधि है, गीता को नीचे लाने की विधि नहीं है।  गीता अपने स्तर पर है, उस तक व्यक्ति को जाना है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै:। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

कार्य पुरुषार्थ से उद्यम करने से ही सिद्ध होते है, केवल इच्छा करने से नहीं I जैसे सोते हुए सिंह के मुख में हिरन स्वयं प्रवेश नहीं करते।

आभार:

संस्कृति आर्य गुरुकुलम् के आचार्य मेहुलभाई’ गुरुपरंपरा से शिक्षित दीक्षित गीता-दर्शन शास्त्री तथा षड्दर्शन शास्त्री हैं। उनकी ज्ञानप्राप्ति वाराणासी के ऋषितुल्य पं विश्वनाथ शास्त्री दातार जी से हुई है। इस लेख में प्रस्तुत विधि आचार्य जी द्वारा उद्घाटित है तथा उनकी अनुमति से लेखिका द्वारा यहाँ सार्वजनिक करी गयी है।

यह लेख इंडिका टुडे पोर्टल पर भी प्रकाशित किया गया है। इसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है:
https://www.indica.today/bharatiya-languages/hindi/effective-method-of-bhagavad-gita-study-how-to-read-bhagavad-gita/

वरदराज पेरूमाल कोविल मंदिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु

राजगोपुरम ! मुख्य द्वार

वरदराज पेरूमाल कोविल दिव्य देशम में से एक है, जो विष्णु के वह 108 मंदिर हैं जहाँ 12 आलवार संतों ने तीर्थ करा था और विष्णु स्तुति गायी थीं। यह मंदिर कुछ 1100 वर्ष पुराना है। इसे प्रसिद्ध चोल राजा राज राजा प्रथम ने बनवाया था। बाद के समय में चोल राजाओं कुलोत्तुंग प्रथम और विक्रम चोला ने इसमें विस्तार किए।

मंदिर के पीछे की ओर से मूलवर सन्निधि का शिखर (पुण्यकोटि विमानम)! इस शिखर पर नरसिंह शीर्ष दिखता है।
प्रवेशद्वार से भीतरी प्रांगण का दृश्य, जिसमें दो मण्डप और उसके पश्चात् ध्वज स्तंभ स्थित है।
ध्वज स्तंभ के दाईं ओर अन्न क्षेत्र और बाईं ओर पवित्र पुष्करणी स्थित है।
और यह है मंदिर की पुष्करणी जिसके कारण यह एक तीर्थस्थल कहलाता है।

वरदराज पेरूमल यानि वर देने वाले विष्णु ! जिनका नौ फ़ीट का अंजीर की लकड़ी का बना विग्रह इस पुष्करिणी में सदा जलमग्न विराजमान रहता है और हर 40 वर्ष में एक बार जल से बाहर आता है, भक्तों के दर्शन हेतु! इस मूर्ति का निर्माण स्वयं विश्व कर्मा द्वारा किया बताया जाता है।

इस स्थान में मूर्ति जलमग्न रहती है।

सोलहवीं शताब्दी तक यह गर्भग्रह में विद्यमान और पूजित थी। परंतु मुसलमान आक्रांताओं के बढ़ते हमलों के कारण अर्चकों ने उसे चांदी की पेटिका (casket) में सुरक्षित कर इस पुष्करणी में छिपा दिया और इसकी जानकारी गुप्त रखी। 1709 में पुष्करणी की सफाई में यह उद्घाटित हुआ। तब से यह परंपरा स्थापित हुई कि प्रत्येक चालीस वर्ष के बाद यह मूर्ति जल से निकाली जाती है और 48 दिनों तक भक्तों के दर्शन के लिए रखी जाती है। इसकी पौराणिक कथा गूगल पर सरलता से उपलब्ध है। कहते हैं कि ब्रह्मा जी द्वारा किये जा रहे यज्ञ की सरस्वती रूपी वेगवती नदी के जल प्रकोप से रक्षा के लिए स्वयं विष्णु यहां बाड़ की तरह लेट गये थे।

मुख्य दर्शन वीथिका

बारह स्तंभों की इस वीथिका की शोभा देखते ही बनती है। यहां विष्णु के उत्सव विग्रह श्री देवी तथा भू देवी के साथ विराजमान हैं। भारत भर से दर्शनार्थी यहां दर्शन के लिए आते हैं। किन्तु स्थानीय मूलनिवासी वैष्णव अपनी आभा और निष्ठा के कारण सहज ही पहचान में आ जाते हैं।

पेरूमाल(विष्णु) के उत्सव विग्रह के बायीं ओर ये छोटा आ प्रांगण है जिसके बायीं ओर तायार पेरुनदेवी की सन्निधि है।
ये मण्डप शायद तायार के उत्सव विग्रह के लिये हो!
जालीदार स्तंभ

इन जालीदार स्तंभों की शिल्पकारी चकित करती है। इतनी सूक्ष्मता से आकार और अनुपात का ध्यान रख, एक ही पत्थर को पूर्ण रूप से सही तराशा है।

अंदर की ओर से मण्डप की छत

केवल स्तंभ ही नहीं, इस मण्डप की छत भी विस्मित करती है। अच्छी बात यह है की जीर्णोद्धार के समय सामायिक चटक रंगों का प्रयोग ना करके प्राकृतिक रंगों की सहायता से इन्हें संरक्षित किया गया है।

तायार पेरून देवी की सन्निधि में उनके दर्शन में एक प्रकार की शीतलता का अनुभव होता है। परिक्रमा करते समय पीछे की ओर से शिखर का स्वर्ण आच्छादित शिखर बहुत सुन्दर दिखता है। तायार अर्थात् मां। मन्दिर के मुख्य देव की पत्नी का एक मां के रूप में स्वतंत्र सन्निधि रहती है। इस मंदिर में विष्णु पत्नी लक्ष्मी पेरुन देवी के रूप में विद्यमान हैं।
मूल विग्रह के बारे में पूछने पर मुख्य मण्डप वीथिका के पीछे की ओर स्थिति सन्निधि में जाने को कहा जाता है। मूलवर नरसिंह की सन्निधि में पंद्रह स्तंभों में से एक पर यह रूप उकेरा हुआ है। विग्रह का रूप कुछ इसी तरह है। यहां उग्र नरसिंह अथवा योगी नरसिंह का विग्रह स्थापित है।
और ये है प्रसिद्ध सौ स्तंभों वाला मण्डप!

चोल कला का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता यह शत -स्तंभ मण्डप पुष्करणी के बाईं ओर स्थित है। प्रत्येक स्तंभ एक भिन्न कथा और देव को प्रस्तुत करता है। भारतीय शिल्प जिज्ञासु और इतिहासकार यहां कितने ही दिन बिता सकते हैं। यह मण्डप विजय नगर के राजाओं द्वारा बनवाया बताया जाता है।

कठोर पाषाण में तराश कर बनाई इन कलाकृतियों की सूक्ष्मता और निपुणता देख बरबस ही शिल्प कार के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं। योद्धा के शस्त्र, घोड़े की लगाम, अश्व के पैरों के नीचे आए शत्रु की अवस्था, सह कुछ स्पष्ट है।

कल्याण मण्डप

इस मण्डप वेदी पर प्रति वर्ष वसंत के समय श्री विष्णु का विवाह पेरून देवी से होता है। सुनने में आया उत्सव भव्य होता है।

स्तंभ पर उकेरे आञ्जनेय (हनुमान)!
योगी नरसिंह

शत -स्तंभ मण्डप से दिख रही इस दिव्य पुष्करिणी की दिव्यता चित्र में नहीं बांधी जा सकती । श्री विष्णु से प्रार्थना है कि वह अपना वरदहस्त सदा भक्तों के शीश पर रखें और उन्हें दर्शनलाभ दें!

“शक्तिक्रीड़ा जगत् सर्वम्”

सारा जगत चित्शक्ति विलास है!

यह सारा जगत शक्ति की ही क्रीड़ा है।वस्तुत: परमात्मरूपा महाशक्ति ही विविध शक्तियों के रूप में सर्वत्र क्रीड़ा कर रही हैं। जहाँ शक्ति नहीं वहाँ न्यूनता है। शक्तिहीन का कहीं भी समादर नहीं होता। ध्रुव और प्रह्लाद भक्तिशक्ति के कारण पूजित हैं। गोपियाँ प्रेमशक्ति के कारण जगत्पूज्य हुई हैं। हनुमान और भीष्म की ब्रह्मचर्यशक्ति, व्यास और वाल्मीकि की कवित्वशक्ति, भीम और अर्जुन की शौर्यशक्ति, युधिष्ठिर और हरीशचंद्र की सत्यशक्ति, प्रताप और शिवाजी की वीरशक्ति ही सबको श्रद्धा और समादर का पात्र बनाती है। सर्वत्र शक्ति की ही प्रधानता है। समस्त विश्व महाशक्ति का ही विलास है। देवीभागवत में स्वयम भगवती कहती है – ‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् – अर्थात समस्त विश्व मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त दूसर को सनातन या अविनाशी तत्व नहीं है।

‘नित्यैव सा जगन्मूर्ति:’ – वह जगदात्मिका भगवती नित्या है।

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती तवेत्याहु: सन्तो धरणिधरराजन्यतनये।

तदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयत: परित्रातुं शंके परिह्रतनिमषास्तव दृश:।।

 हे शैलेंद्रतनये! शास्त्र ऐवं संत यह कहते हैं कि तुम्हारे पलक झपकते ही यह संसार प्रलय के गर्भ में लीन हो जाता है और पलक खोलते ही यह फिर से प्रकट हो जाता है।संसार क बनना और बिगड़ना तुम्हारे लिये एक पल का खेल है। तुम्हारे एक बार पलक उठाने से जो यह संसार खड़ा हो गया है वह नष्ट न हो जाये, मानो ऐसी शंका से तुम सदा निर्निमेष दॄष्टि से अपने भक्तों को निहारती रहती हो।

चित्त-विलास प्रपंच यह, चिद्-विवर्त चिद्-रूप।

ऐसी जाकी दृष्टि है, सो विद्वान अनूप।।

ॐ श्रीमूलशक्त्यै नम:

~ साभार: कल्याण – शक्ति अंक । चित्र सौजन्य: बिजय बिसवाल

Is this the right path in the chaos?

Can we really sort a chaos by only being another voice adding to that chaos? Thinking that their voice is the sane one, the dharmiks also come and share their thoughts, knowledge and suggestions to rest of the world in the limited confinement of a social media platform. They (most likely) do that on more than one platform, each time in the confinement of that social media platform, talking in the format (micro-blog, audio-visual, Q-ans and so on) of that platform.

All this for explaining and bringing back people to something which is a complex system called sanatana, if I may call it so for the sake of discussion (see, I just did it by calling sanatana a system so that I can say what I have to say using the limited vocabulary and space I have got).

Why chaos? Because they are so many voices with each one saying ‘listen to me’. A knowledgeable and well-intentioned dharmik writes a book in an ‘acceptable’ language about certain aspect of santana, sharing deep insights, reasons, explainable tarkas and suggestions on how to start following it; but at the same time there are 100 other books written by modern hindus with the repackaged truth, they use the rules of the game and have better shelf availability of their book. This proportion of dharmik to modern hindus is what, 1:10 maybe 1:100? Dharmik’s book doesn’t reach the desired shelf, the desired audience. How is the audience supposed to know that the dharmik’s book is the genuine and better one? We blame the audience for not using their ‘viveka’ to choose, we blame them for not being the seeker and search for themselves but why do we forget that so many dharmic warriors have to come up because this collective ‘viveka’ is very weak and the spirit of being a seeker has been killed in a planned and structured manner in last few hundred years? So does the job start or end by simply calling them a failed collective? Does it solve the problem? No. They rather get further pushed away, as being defensive is in the DNA for atleast 2 to 3 generations now.

While doing manan I struggle with the question that can we really explain or move people to a complex system called santana or vedic sanskruti which is fluid, interdisciplinary and doesn’t use the tool-set which is popular or understood by people today?

This complex system which has been made surprisingly simple by our sages, great rushi-munis to understand and follow by knitting various practices, rules of life, sanskaras and biggest & oldest ever documented repository!

Using this repository and by being the pracharak shishya of the guru-shishya parampara, a big number of dharmiks are trying to bring the knowledge to people in an ‘acceptable format’ or ‘bite sized’ information (not gyan). Is that really the right step-by-step approach to ultimately bring all into the purview of understanding santana thoughts and practices completely and later start following them?

I also observe a lot of well-intentioned Hindu’s getting pulled into the same tricks of social media which they initially took up only to reach out to more people. The initial intension was noble but gradually they get taken over by the thought of talking to people in the language they understand, where the core problem is that the language (set of life practices, attitudes, approach) which is understood by all itself is very shallow, promotes alasya, wants everything to be served to a person instead of motivating the person to be a seeker and initiate the journey of being wiser than the previous day, every day.

Another example is where a lot of these dharmiks write smaller bite sized pieces to explain various aspects of sanatana in the modern understandable language and all the references they get to cite are non-Indian westerners? So, by giving reference of a recent researcher ( 50 -100 years is recent in this context) from the western world we try to ‘justify’ that that our age old knowledge and practices are scientific and relevant by putting them in a tool-set which is modern but very limited and certainly very different from the original tool-set where these practices were originated. Why are we unable to provide the vedic and shastriya-tarkik scientific explanation and have to switch to modern science process to explain it. The indic scientific explanation also goes to the last molecule of detail and in a simple way but every such explanation disappears in the chaos and the explanation using the modern scientific/technical language rather starts sounding like a rant.

I have my doubts if this is the right path. Can’t articulate all of them well here as my vaakpatuta isn’t good enough to bring all of them forth.

That is the reason I am sharing this open question to all!

I have seen a dharmiks sharing their disappointment at times on twitter, some are sad, some are angry, some are anguished, some seem to be giving up and but still trying their best to keep on the path as they realise it is a difficult one. But I have my doubts if this is the right path to reach the goal post we want to reach.

Rajiv Malhotra ji has been working on the project of creating ‘Intellectual Kshatriyas’ for long. He gets very annoyed at a lot of emotional hindus not been able to present their case well and defend sanatana and dharma. But some IKs that would have been created by now, are they visible? Or have they been lost to this chaos as well? If yes, then is this one of the right paths?

The fundamental question is, if I am willing to change the game itself because it is on shallow and incorrect grounds, doesn’t follow the right rules and has blind folded the participants/participants don’t want to play with blinds unfolded, Can I really change it by playing it, by being a part of the same game and playing it by same rules? It is beyond that point of metaphor that ‘if you want to understand the game, you will have to play it first’ as we have been part of this game for so long and now are willing to change it (atleast I have made this transition, some are lucky to always have been outside it) because we have understood it to be the faulty one with a adhogaami goal post.

Sanatana system has enormous experience of having set up the game from scratch, define the rules, enable the players with capabilities and skills, clearly define the goal posts and provide the attitude that there are various right paths to reach the goal posts. But the dharmiks are not able to create the new game. Prevailing conditions are already known like secular democracy, politics being priority of govt as it may be ruling but ultimately it is a political party, too much left ideology influence, conversion missions, religious extremism. My point is the game has to be designed to address these conditions/limitations so citing them as reasons doesn’t answer the question.

There is overload of indic information on twitter now, be it about temples, our pauranic tales, various roopa of Ishwara, Devi’s. But is that really serving the collective purpose that we want to achieve or is it just adding to the chaos?

This thought got triggered when I was reading this article on indictoday.com https://www.indictoday.com/quick-reads/balis-water-temples-understanding-technology-dharmic-rituals/ by Dr Nagendra Setumadhavrao

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः।  वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥

Charpatpanjarikastotram

The childhood is lost by attachment to playfulness. Youth is lost by attachment to woman. Old age passes away by thinking over many things. But there is hardly anyone who wants to be lost in parambrahman.

The journey continues…….