आयुर्वेद के उद्गम व लौकिक यात्रा की कथा!

आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।

धन्वंतरि समारम्भां, जीवकाचार्य मध्यमाम् । अस्मद् आचार्यपर्यन्ताम् , वन्दे गुरु परम्पराम् ॥

विभिन्न संहिताओं, ऐतिहासिक ग्रंथों, संस्कृत के ग्रंथों में आयुर्वेदिक की उत्पत्ति का विवरण उपलब्ध है। आज आपको आयुर्वेद की भारत की वैदिक ऋषि परंपरा द्वारा जन-मानस तक लाने की कथा बताते हैं। क्योंकि आयुर्वेद की गंगा को उद्गम् से यहाँ तक लाने में बहुत ऋषियों का श्रम है, तप है। आयुर्वेद की गंगा जिसने असंख्य लोगों को जीवन दिया, वो कहाँ से आरम्भ हुई, कैसे आगे चली, ये जानकारी अधिक प्रचलित नहीं है।चरक मुनि ने ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ कहकर आयुर्वेद को शाश्वत बताया है। आयुर्वेद अविरत चलायमान है और इसकी रक्षा अविरत होती रहती है।

 संहिताओं में निहित ज्ञान के आधार पर सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने करी। सहस्त्रों-सहस्त्रों वर्षों पहले सृष्टि की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद व अथर्वेद में उसका वर्णन है। विशेषकर तैत्तिरीय उपनिषद में बताया गया है:

“तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूत: | आकाशाद्वायु:| वायोरग्नि: | अग्नेराप: |अद्भ्य: पृथिवी | पृथिव्या औषधय: | औषदिभ्यो S न्नम् | अन्नात्पुरुष: ||

उस एक तत्व से आकाश की उत्पत्ति हुई, उसके बाद पंचभूतों की और फिर अनेक प्रकार के महाभूतों की क्रम से उत्पत्ति हुई, अंत में अन्न से मनुष्य की उत्पत्ति हुई। समस्त ब्रह्मांड की रचना की बात बहुत जगह पर आयी है। उन सबके पश्चात एक शास्त्र की रचना हुई।

जैसे कोई व्यक्ति एक यंत्र बनाता है, तो उसे बनाने के बाद उसकी एक अनुदेश पुस्तिका (user manual) निर्मित होती है, जिसमें उससे संबंधित सभी दिशा निर्देश होते हैं, बताया जाता है की उसकी विशेषता क्या है, उसे किस तरह से उपयोग करें, किस तरह से उपयोग न करें – यह सब संकलित कर वह निर्देश पुस्तिका यंत्र के साथ दी जाती है।  सृष्टि के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसकी रचना के बाद एक शास्त्र की रचना हुई जो मानव जीवन की एक प्रकार की निर्देश पुस्तिका है। इस शास्त्र को केवल मानव जीवन का नहीं, सर्व भूतों के जीवन की निर्देश पुस्तिका कहा जा सकता है। 

जिस शास्त्र की रचना हुई वह जीवन से जुड़ा हुआ था, इसीलिए उसका नाम आयुर्वेद रखा गया। आयु अर्थात जीवन, वेद अर्थात ज्ञान। जबसे सृष्टि का आरम्भ हुआ, तबसे अनेक प्रकार की बाधाओं से बचने के लिए, मनुष्य के शरीर को, मन को, आत्मा को, बुद्धि को, व्यवहार को समझने के लिए आयुर्वेद की रचना करी गयी। कोई भी परंपरा इतनी पुरानी नहीं होगी, जितना पुराना आयुर्वेद है। 

आयुर्वेद के सबसे पहले उपदेशक ब्रह्मा थे। वहाँ से आयुर्वेद की परंपरा का आरम्भ हुआ। ब्रह्मा अर्थात सर्जक! जो व्यक्ति सर्जन करता है वह उस कोटि का व्यक्ति है जो ईश्वरीय रूप है, जो पूर्णता की ओर है। वह ईश्वर वो नहीं जिसे हम मानते हैं, परंतु ईश्वरीय अर्थात जिसकी चेतना पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध है, ऐसे ब्रह्मा हैं। दो प्रकार की परम्पराओं का वर्णन, चरक संहिता में व सुश्रुत संहिता में आता है, दोनों ने ब्रह्मा जी को आयुर्वेद का प्रथम सर्जक बताया गया है। 

ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया। दक्ष प्रजापति अर्थात जो दक्ष है, कार्यकुशल है तथा प्रजापति अर्थात जो प्रजा को पालने वाले हैं, प्रजा की रक्षण की जिसकी बुद्धि है। ये नाम गुण को परिभाषित करता है, इन गुणों से युक्त व्यक्ति दक्ष प्रजापति है।  जो बौद्धिक हो और भौतिक न हो, अर्थात अंदर से तो वह बुद्धता को, आत्मा की चेतना को प्राप्त हो, परंतु बाहर से (प्रजा के)शरीर की रक्षा को प्रतिबद्ध हो। क्योंकि वह जानता है कि आत्मा तक पहुंचने के लिए सर्वप्रथम जो सीढ़ी है वो शरीर से आरम्भ होती है। इसलिए ये चिकित्सा के उद्भव का श्रेय ब्रह्मा, उसके बाद दक्ष प्रजापति को जाता है।

दक्ष प्रजापति से ये ज्ञान अश्विनी कुमार को मिला है। अश्विनी कुमार दो हैं। हमारे यहां 33 कोटि (यानी प्रकार) के देवी देवता हैं। उन 33 में से यह दो अश्विनी कुमार युग्म के रूप में मिलते हैं [अश्विनी कुमारों के बारे में बहुत सारी लक्षणा है, इतिहास है, सत्य है, तथ्य है जिनकी चर्चा किसी अन्य अवसर पर करी जाएगी ]।  देवों के वैद्य के रूप में जो ख्यात हैं, वह  दक्ष प्रजापति से ज्ञान प्राप्त अश्विनी कुमार हैं। 

अश्विनी कुमारों से यह ज्ञान देवराज इंद्र ने लिया। देवराज इंद्र एक ऐतिहासिक व पौराणिक पात्र हैं। मनुष्यलोक के सामान एक देवलोक है, देव सृष्टि है  जिसके प्रतिनिधि इंद्र हैं। 

पशुओं की और मनुष्यों की भिन्न सृष्टि है और न दिखने वाली भी पशु सृष्टि हैं – एक वायरस (विषाणु) की सृष्टि है, एक बैक्टीरिया (कीट) की सृष्टि है। ये सूक्ष्म ऊत सृष्टि धीरे धीरे आज भैतिक साधनों के कारण ज्ञात होती जा रही है, दिखाई देती जा रही है। आज सूक्ष्मतम यंत्र से सूक्ष्मतम जीवाणु दिखाई देते हैं। साधन की सहायता से उसका अनुभव किया जा सकता है। किंतु आत्मा की चेतना जब ऊपर जाती है, तो वो कोई साधन की सहायता से नहीं, अपितु साधना के बल पर जाती है, ऐसी ही उत्तम चेतना से परिपूर्ण देवलोक की पूरी सृष्टि है। जैसे एक वायरस की या बैक्टीरिया की अज्ञात सृष्टि है, उसी तरह देवलोक की भी एक अज्ञात सृष्टि है। वो भी दिखाई पड़ती है, उसका भी अनुभव होता है। उसके लिए आत्मा की चेतना की अवस्था उत्तम होनी चाहिए। 

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥  

ब्रह्मा ने ऐसा कल्प के आदि में उत्पन्न प्रजाओं से कहा। इसलिए देवराज इंद्र, जो देव सृष्टि के प्रतिनिधि हैं, उन्हें आयुर्वेद का ज्ञान मिला।  यहाँ तक आयुर्वेद की अलौकिक परंपरा पूरी होती है। जहाँ पर देव सृष्टि है – जहाँ पर चेतना को उपलब्ध हुए जीवों को जो अनुभव होता है, उसे अलौकिक परंपरा कहते हैं जिसमें सर्वप्रथम ब्रह्मा हैं और अंत में इंद्र हैं। इसके बाद लौकिक परंपरा आरंभ होती है। 

देवों को जब कुछ परिवर्तन करना होता है, कुछ परिणत करना होता है तो वह मनुष्यों को खोजते हैं।  जिसके पास उत्तम वस्तुएँ होंगी और वह व्यक्ति यदि उत्तम चेतना वाला होगा – मनुष्य जीवन में देखें तो सात्विक चेतना वाला होगा – तो देव उसे उत्तर में अधिकारी के रूप में देखेंगे। देव सबसे योग्य व्यक्ति को ढूँढता ही रहता है। इंद्र ने भी आयुर्वेद के लिए ऐसा व्यक्ति खोजा और उन्हें वह भारद्वाज ऋषि के रूप में मिल गया।

इंद्र ने एक परंपरा के अनुसार आयुर्वेद का ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया। यहाँ से आयुर्वेद की लौकिक परंपरा आरम्भ हुई। ‘इमं द्विज भार’ ऐसा भारद्वाज शब्द की व्युत्पत्ति बताई है। जिसे संभालने की बुद्धि है, वह भारद्वाज, उन्हें इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान दिया।

इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान मिलने के बाद भारद्वाज ने ऋषि परिषद करी [पहले के ऋषि-मुनि उत्तम चेतना को उपलब्ध थे इसलिए जो ज्ञान मिला उसे वो वितरित करना चाहते थे। ज्ञान की ऐसी अदभुत परंपरा रही जिसमें न कोई प्रमाण पत्र देना था, न ही कोई पैसा लेना था और न ही अन्य कोई बातें थीं]। उस ऋषि परिषद में अत्रि मुनि ने भी भाग लिया। अत्रि मुनि का बहुत जगह पर वेदों में भी वर्णन है। ‘त्रिगुणात अतीत: अति अत्रि’, अर्थात  तीनों गुणों से पर जो व्यक्ति हो गया वह अत्रि। 

उस ऋषि परिषद के पश्चात आयुर्वेद के ज्ञान की परंपरा को अत्रि मुनि ने आगे बढ़ाया। अत्रि मुनि से आयुर्वेद की वास्तविक परंपरा आरम्भ होती है। अत्रि तक ये आयुर्वेद ज्ञान परंपरा श्रुति रूप में थी। 

अत्रि ने इस आयुर्वेद की परंपरा का अपने शिष्य व पुत्र आत्रेय को ज्ञान दिया। अब तक ये उपदेश मौखिक थे। क्योंकि पहले की वैदिक परंपरा श्रुत परंपरा थी यानी सुना हुआ याद रखना। इसलिए वेद भी श्रुति कहे जाते हैं। क्योंकि सुना हुआ बहुत महत्व का होता है। संस्कृत में विद्वान को ‘well read’ नहीं कहते, ‘बहु श्रुत’ कहते हैं। सुना हुआ, पढ़े हुए से बहुत गहरा होता है। 

पुनर्वसु आत्रेय का उपदेश, चरक संहिता ग्रंथ में पाया जाता है। चतकर्ण, पाराशर, भेल इन ऋषि मुनियों का भी वर्णन चरक संहिता में दिया गया है। 

आत्रेय ने आयुर्वेद के ज्ञान से आगे छह शिष्यों को तैयार किया, उनमें से एक अग्निवेश थे। अग्निवेश, भेल, चतकर्ण, पाराशर, क्षिप्रणि, हर्षता वह छह शिष्य थे। अनेक लोगों की संहिताएँ हैं, इन सभी ऋषियों के नाम से भी संहिता लिखी गयी हैं। ये छह शिष्य श्रोता थे। उन्होंने पुनर्वसु आत्रेय के उपदेश को ग्रहण किया। उसके बाद अग्निवेश के पारगामी बुध्दि रचित तंत्र की रचना हुई [तंत्र की शास्त्रीय, दार्शनिक परिभाषा, संहिता की रचना किस प्रकार होती है, आदि किसी अन्य समय। यह एक कोर्स बनाने जितना सरल नहीं है], जो सबसे बड़ा कार्य हुआ। अग्निवेश के बाद ये तंत्र कालक्रम से चलता रहा। मूल उपदेश का तंत्र बनाया गया था, उसमें कालानुक्रम में कुछ मिश्रित होता गया और कुछ निकलता गया।  मूल आयुर्वेद के उपदेश से कुछ न कुछ अलग होता गया, कुछ दूषित भी हुआ।

चाणक्य ने बताया है कि अन्य किसी क्षेत्र में भ्रष्टाचार सह्य हो सकता है परंतु चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में, उनकी व्यवस्था में लेश मात्र भी यदि भ्रष्टाचार हो तो कोई भी व्यवस्था सही नहीं बचेगी और समाज की बहुत हानि होगी। चिकित्सा के क्षेत्र में यदि भ्रष्टाचार हुआ तो वह कभी सह्य नहीं होगा, ये चुकाना पड़ेगा। आयुर्वेद में लोभ एक तरह से वर्जित है, अगले जन्म में, इस जन्म में बहुत भोगना पड़ता है। कुवैद्य की निंदा करी गयी है और सुवैद्य की प्रशंसा करी गयी है। 

अग्निवेश के तंत्र के बाद एक ऋषि आये जिन्हें हम चरक कहते हैं। चरक पारगामी बुद्धि के ऋषि थे, उन्होंने अग्निवेश तंत्र का परिमार्जन, पुनर्गठन किया। उन्होंने देखा की अग्निवेश तंत्र में क्या दूषित हुआ है और उसके लिये क्या किया जा सकता है, ये उन्होंने एक बहुत बड़ी क्रांति रूपक बात आरम्भ करी और चरक संहिता की रचना करी।  इसलिए कहा जाता है की अग्निवेश ने तंत्र लिखा, उसका प्रतिसंस्कार चरक ने किया। वह संहिता इतनी ख्यात हुई की चरक को ‘father of indian medicine’ कहा जाता है। 

चरक दो प्रकार के हैं: एक परंपरा का नाम है चरक (जैसे शंकराचार्य एक परंपरा का भी नाम है जो उनकी पीठ से चलता है और समकालीन शंकराचार्य गुरु व्यक्ति रूप भी हैं)और दूसरा ऋषि प्रकति का, उत्तम ज्ञान को प्राप्त व्यक्ति भी चरक है । उन्होंने प्रज्ञा व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा संगठन खड़ा किया, उसका भी नाम चरक हो गया। क्योंकि ‘चरैवेति चरैवेति’, वे अनेक स्थानों पर जाते थे, सदा चलायमान रहते थे इसलिए उनका नाम चरक पड़ा। कई जगह वर्णन है की चरक और पतंजलि, दोनों एक ही हैं। जिन्होंने योगसूत्र लिखा है, उन्होंने ही अपना एक उपनाम चरक रखा है। चरक संहिता में उनके व्यक्ति विशेष पहचान के लिए कुछ नहीं मिलता है। किन्तु  इतिहास के अनेक ग्रंथ देखे जाएँ तो ये भी पता चलता है कि वह राजा तनिष्क के यहां राजवैद्य थे। 

चरक मुनि ने अग्निवेश तंत्र का सुव्यवस्थित रूप से गठन किया। वो गठन करने के बाद, जिसे आज हम संपादन (compilation) कहते हैं, उससे भी बड़ा काम चरक मुनि ने किया। चरक संहिता कोई छोटी मोटी संहिता नहीं है, आठ स्थान में विभक्त है जिसमें 140 अध्याय हैं। यह सब उस समय किया गया जब कागज़, कलम नहीं थे और बहुत सारी टेक्नोलॉजी नहीं थी। उस समय उन्होंने बहुत ही मेहनत से इस ग्रंथ को बनाया। 

परंपरा को बचाने के लक्ष्य को निर्धारित करके उन्होंने एकनिष्ठ होकर यह कार्य किया जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं था। और उन्होंने इतने विषय चरक संहिता में ले लिए कि कहा जाता है, जो यहाँ मिलेगा, वह दूसरे स्थान में होगा, ऐसा नहीं कह सकते, किन्तु दूसरे स्थान में होगा तो चरक संहिता में होगा ही!

युग व प्रमुख वैद्य

काल के अनुसार आयुर्वेद के अनेक ऋषियों की महत्ता बतायी गयी है। उसके अनुसार अत्रि की कृतयुग/सतयुग में बहुत महत्ता है। सतयुग के वैद्य के रूप में अत्रि प्रमुख हैं। अत्रि ने अपनी स्मृति में सात्विक लोगों की चिकित्सा कैसे करी जाए, उसपर कार्य किया। उस युग में सत्त्वप्रधान व्यक्ति हुआ करते थे तो रोग भी उस प्रकार के होते थे, चिकित्सा भी उसी प्रकार की करनी होती थी। सतयुग के रोग ऐसे थे की अधिक तप करने से, अधिक सहन करने से, अधिक शरीर को कष्ट देने से होते थे तो उसी प्रकार की चिकित्सा अत्रि मुनि ने स्थापित करी।

द्वापर युग में बहुत युद्ध घटित हुये, सुश्रुत द्वापर के वैद्य थे। द्वापर में युद्ध बहुत हुये, उसके लिए शल्य की आवश्यकता रही। ऋषि-मुनि परंपरा से बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति को समाज कल्याण की चिंता रहती ही है, इसलिए सुश्रुत( जो विश्वामित्र के पुत्र थे) के रूप में वह दिवोदास धन्वंतरि की परंपरा में आये। धन्वंतरि की परंपरा में आकर उन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी, उन्हें शल्य चिकित्सा (surgery) का जनक माना जाता है। 

कलियुग में वाग्भट्ट प्रमुख वैद्य हुये। कलियुग में सत्व के लिए अधिक तप के कारण, शरीर के कष्टों के कारण रोग नहीं होते, युद्ध के कारण भी नहीं होते, अपितु अधिकतर आहार विहार के नियमों का पालन न करने के कारण होते हैं, इसलिए वाग्भट्ट का नाम कलियुग में गौरवपूर्ण हुआ, क्योंकि उन्होंने आहार-विहार से संबंधित अति विस्तृत चिकित्सा स्थापित करी (अष्टांग हृदय, अष्टांग संग्रह ग्रंथ)। 

चरक संहिता की रचना के 1000 साल बाद, दृढ़वल ने उसका प्रतिसंस्कार किया, उसमें 141 अध्याय किये। आधुनिक समय में भी बहुत विद्वानों ने चरक पर काम किया है, जैसे चरक विन्यास, जल कल्पतरु, चक्रपाणि आदि के व्याख्याएँ चरक पर मिलती हैं। प्राय: 44 व्याख्याओं का वर्णन चरक के ऊपर प्राप्त हैं।

आधुनिक चिकित्सा जगत की बात करें तो एलोपैथी के लिए हैप्पोक्रिटिस का नाम आता है, होमियोपैथी को देखें तो  हैनिमैन, सुशलर  का नाम आता है, ऐसे ही अन्य पथियों के लिए विभिन्न चिकित्सकों का, लेखकों का नाम आता है, जिन्होंने वो पद्धति/पथी आरम्भ करी। आयुर्वेद को किसी व्यक्ति विशेष ने आरम्भ नहीं किया। ये ज्ञान अनादि से प्रवाहित है। 

 ‘आयुर्वेद: पंचमो वेद:’ आयुर्वेद को पाँचवे वेद का स्थान दिया गया है। आयुर्वेद एक काढ़ा,दवाई अथवा केवल वटी-गुटी का शास्त्र नहीं है। ये जीवन से जुड़ा हुआ, सूक्ष्मतम ज्ञान से निहित शास्त्र है। इसमें जीवन की प्रत्येक पक्ष को सूक्ष्मता से देखा गया है, प्रत्येक व्याधि का समाधान दिया गया है। चाहे प्रमाणिकता हो, चाहे जीवन के अछूते पक्ष हों, सबकी बात आयुर्वेद में करी गयी है, इसीलिए चरक मुनि ने कहा है ‘आयुर्वेदो अमृतानाम्’ |

शायद ही किसी अन्य चिकित्सा पथी की पुस्तकें पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद कही गयीं। इसलिए आयुर्वेद में बताया :

‘न कामर्थं न अर्थार्थं, अथ भूत दयां प्रति’ ये शास्त्र भूतानुकंपया है, ये शास्त्र धन कमाने के लिए नहीं है, किसी कामार्थ नहीं है, ये पेट भरने के लिए भी नहीं है। इसका हेतु है कि ये अनेक प्रकार के जीव जंतु का कल्याण हो जाए, मनुष्य स्वस्थ रह सके, रोगों से बच सके और जो रोग हो गए हैं उनका निदान कर सके। इसलिए रोगों से बचने के लिए क्या क्या आवश्यक है, ये सारा ज्ञान आयुर्वेद में हैं, इसलिए उसकी रचना हुई। 

आयुर्वेद में चरक संहिता को पवित्र ग्रंथ व अति वंदनीय माना जाता है। वैद्य उसकी उसकी परंपरा के पालन का जतन करते हैं। 

सुश्रुतो न श्रुतो येन, वाग्भटो येन वाग्भट: | नाधितश्च चरक येन, स वैद्यो यम किंकर:||

सुश्रुत जिसने सुना नहीं, वाग्भट्ट जिसको वाग्भट्ट (कंठस्थ) नहीं, चरक का जिसने चिकित्सा उपक्रम पढ़ा नहीं, वो वैद्य वैद्य नहीं, यम का दूत है।

यात्रा जारी है……

Music : How did it all begin?

Music : How did it all begin?
As with much else, our music began in the age of the vedas. The vedic period saw the beginning of what is today known as sama music or the Saman the musical way of rendering Sama Veda. Read on..

How did the Indian music begin? As with everything, it was a gift from Ishwara. Here is what the ancient Natyashastra says:

Once, a long time ago (told at the onset of Tretayuga), it so happened that people got addicted to base sentiments, were ruled by lust and greed, experienced less happiness and more sorrow, behaved in angry and jealous ways, with each other and not only gods but demons, evil spirits, yakshas and such like others swarmed over the earth. Seeing this plight, Indra and other gods approached Brahma and requested him to give the people a mean of entertainment (Kridaniyaka), but one which would not only be seen but heard and this should turn out to be a diversion (so that people gave up their bad ways).

Till then, sangeet had been something only the devas enjoyed. A suitable human had to be found who was capable of receiving this gift-a truly great man. A gandharva or man of superior spiritual ability was required to convey this knowledge of the gods to the world of man. So, Brahma instructed Bharata in the Nāṭyaveda and gave the responsibility to him and his hundred sons to propagate and practice the same. The eternal gandharva sage Narada is to be thanked for the classical music we have today.

Since our music has a background in dharma, the teaching methods are very similar to dharmic-vedic education.  It is the tradition of guru-shishya parampara, that has been part of Indian culture or humility – the willingness to learn. He must also have the quality of sadhana or dedication. Only through constant sadhana can a shishya become a true master of music. It is the best principle to teach our children, even today.

In the beginning: the music of Vedas

So much for the legends. How about formal beginnings! As in so many other fields, so also in music, India has one of the most ancient traditions in the world. At a time when Western civilisation was barbaric and crude, thousands of years before the rise of the Greeks and the Romans we already had a complex and sophisticated music tradition.

As with much else, our music began in the age of the vedas. The vedic period saw the beginning of what is today known as sama music or the Saman the musical way of rendering Sama Veda.

Sama music was very simple, starting with one note, then two, then three, up to seven. In each round of chanting, one note was added. The notes started high and, and went down gradually.

Music of India is a composite art comprising Gita (singing), Vadya (instruments) and Nrtya (limb movements) –

Gita, Vadya, Nrtyam trayam Natyam Tauratrikam ca tat Samgitam || (Hemachandra)

Our vedic ancestors used four kinds of instruments:

Tata : Stringed instruments, like the Veena

Avanaddha : Hollow things to beat like drums

Ghana : Solid things to beat, like gongs

Sushira : Things to blow on, like flutes.

Narad muni works gave the gatra veena, which has clear instruments on how to use fingers, hands and head with different notes and words.

What were the words? Mostly from the Rigveda. Everything was not religious in nature. Sama music was for rituals, but early music scholars also mention narashamshi gathas – songs of the common man. SO we’ve been a democratic nation for a pretty long time too – even when it comes to music !

जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सामभ्यो गीतमेव च। यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥

Nāṭyaśāstra 

He took the lyrics (पाठ्य) from the Ṛgveda, the music (गीत) from the Sāmaveda, the language of gestures (अभिनय) from the Yajurveda and the aesthetic experience (रस) from Atharvaveda

The journey continues….

दर्शन क्या है?

दर्शन क्या है?
आधुनिक पाश्चात्य संसार में जो ‘philosophy’ शब्द है , वह दर्शन के लिये प्रयोग होता है। जिसे philosophy कहते हैं , वह दर्शन नहीं है। दर्शन उससे बहुत आगे है, बहुत विस्तृत है।

आदरणीय गुरुजी श्री मेहुलभाई आचार्य द्वारा दिया गया दर्शन का परिचय!

दर्शन का पहला रूप हम समझते हैं देखना। हम विग्रह का, भगवान की मूर्ति का दर्शन करते हैं,उसे देखते हैं। कभी किसी व्यक्ति को भी कहते हैं,”आपके दर्शन दुर्लभ हो गये हैं” (दर्शन दुर्लभ हो गये, जबसे दिया उधार!) अर्थात् कोई व्यक्ति अब दिखता नहीं।  

जब भारतीय ‘दर्शन’ की बात करी जाती है तो वह है संस्कृत की ‘दृश’ धातु से बना, उससे निष्पन्न हुआ शब्द -दर्शन! 

आधुनिक पाश्चात्य संसार में जो ‘philosophy’ शब्द है , वह दर्शन के लिये प्रयोग होता है। जिसे philosophy कहते हैं , वह दर्शन नहीं है। दर्शन उससे बहुत आगे है, बहुत विस्तृत है। 

अनुमान से कुछ बताने, या सोचने, विचार करने, बहुत विचार करने को फिलोसॉफी कहते हैं। फिलोसॉफी विचार का शास्त्र है। 

फिलोसॉफी में सोचा जाता है, दर्शन में देखा जाता है।दर्शन निर्विचार की भूमिका में देखा जाता है। दर्शन प्रत्यक्ष है।

ज्ञान प्राप्त करने की, साधना की भारतीय विज्ञान में सीढ़ी है – श्रवण, मनन और निधि ध्यासन। श्रवण माने सुनना; मनन माने सुने हुए तथा स्वाध्याय द्वारा जाने गये ज्ञान को पुनः स्मरण करना, उसका संकलन करना तथा निधि-ध्यासन माने मनन किये हुए ज्ञान को स्तिथप्रज्ञ होकर उसका परीक्षण करना, उसे धारण करना व आत्मसात करना।  

हमारे ऋषि-मुनियों ने इस निधि ध्यासन की प्रक्रिया में बहुत सी ऐसी बातें देखीं, अनुभव करीं और उनका साक्षात्कार किया। वो सोचीं नहीं, विचार नहीं किया, संशोधन नहीं किया; उन्होंने साक्षात्कार किया। साक्षात्कार होने के बाद कुछ रहस्य ऐसे पता चले जो हम इन्द्रियों के द्वारा नहीं जान सकते। वह, जिसका अनुभव इन्द्रियों रूपी साधन द्वारा नहीं हो सकता, उन्हें इन्द्रियातीत कहते हैं। ऐसे अनुभव को किसी साधन से नहीं जाना जा सकता, साधना से जाना जा सकता है। ऐसे ही कुछ इन्द्रियातीत अनुभव ऋषि-मुनियों को हुए। वह पता चला जो सृष्टि के पार है। 

इसीलिए तो ‘रिष’ धातु से ऋषि शब्द बना – ऋषति संसारस्य पारं दर्शयति, इति ऋषि:। ऋषि का अर्थ है, जो संसार से पर की बात बता सके, जो संसार के पार की बात को जान लेते हैं।

अतः निधि ध्यासन की प्रक्रिया में, ऋषि मुनियों के मन में प्रश्न उठे। प्रश्न उठने के पश्चात उन्होंने साधना करी। साधना के पश्चात उसके उत्तर मिले। उन्होंने इन्द्रियातीत अनुभवों से अपने मन में उठे प्रश्नों के उत्तर को जाना – ये शरीर कैसे चलता है ; मन कहाँ से आया है ; [केन: सितं प्रेषितं मन:, केन: प्राण:] कौन प्राण को भेजता है ; मरने के बाद क्या होता है ; आत्मा कहाँ चला जाता है और क्या-क्या जाता है ; सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई ; क्यों उत्पन्न हुई ; ये सब क्यों हुआ ; मैं संसार में क्यों आया ; मुझे कौन चला रहा है ; मैं कहाँ जाऊँगा ; मैं क्या कर रहा हूँ ; यह सब क्या है ; ये सभी रचना और इसकी विधि क्या है?

वह उत्तर अनुभूति के स्तर पर मिले, शब्द के स्तर पर नहीं! उन्होंने उन उत्तरों को देखा और उसको कहा – दर्शन! 

उसके ऊपर शास्त्र लिखे गये। विभिन्न ऋषियों ने विभिन्न शास्त्र लिखे। 

मनुष्य के लिए साधना के कई  मार्ग हैं, प्राप्तव्य एक है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं : गणित में दो और दो चार होते हैं, एक और तीन भी चार होते हैं तथा आठ में से चार जाएँ, तो भी चार होते हैं। चार तक पहुँचना महत्वपूर्ण है और चार तक बहुत तरह से पहुँचा जा सकता है। ऐसी ही यदि 100 की संख्या पर पहुँचना हो तो कई मार्ग हैं। पर इसका यह अर्थ नहीं कि केवल कोई एक मार्ग ही सही है। ऐसा नहीं है कि केवल दो और दो चार ही उचित है अथवा शुद्ध है, तीन और एक नहीं। यदि कोई ऐसा कहता है तो कहने वाला गणितज्ञ नहीं हो सकता!

ऐसे ही मुक्ति का यही एक मार्ग है और कोई मार्ग नहीं हो सकता, ऐसा कहने वाला ज्ञानी नहीं है। 

ऋषि-मुनियों ने जाना कि परमात्मा की ओर जाने वाले कितने मार्ग हैं और भटकाने वाले कितने मार्ग  हैं। परमात्मा तक ले जाने वाले मार्गों की पूरी प्रक्रिया दी। सृष्टि का उद्भव कैसे हुआ; हम कहाँ से आये; जन्म कैसे होता है; जन्म के समय पर गर्भ में हम कैसे आ जाते हैं; वहीं क्यों आते हैं; पूर्व जन्म कैसे होता है; पुनर्जन्म कैसे होता है – ऐसी बहुत सारी बातें लिखीं और उनका नाम बताया गया दर्शन शास्त्र!

हमारे ऐसे छह दर्शन मुख्य हैं:

  1. न्याय, (2) वैशेषिक, (3) सांख्य, (4) योग, (5) पूर्व मीमांसा (मीमांसा शास्त्र) तथा (6) उत्तर मीमांसा (वेदांत)।

इन छह दर्शनों के शास्त्र भिन्न ऋषियों ने लिखे हैं। वेदों को आधार मानकर, वेदों के वाक्यों को आधार मानकर लिखे गये ये छह दर्शन वैदिक दर्शन कहलाते हैं। 

अन्य तीन दर्शन हैं :

(7) जैन दर्शन, (8) बौद्ध दर्शन और (9) चार्वाक दर्शन

यह अवैदिक दर्शन कहलाते हैं क्योंकि वो वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं। इनमें दो दर्शन ऐसे हैं जो पूर्व व पुनर्जन्म को मानते हैं, सृष्टि के रहस्य को मानते हैं – जैन दर्शन और बौद्ध दर्शन। ये दोनों दर्शन हैं। सृष्टि की, पूर्वजन्म की, पुनर्जन्म की पूर्ण  प्रक्रिया बताते हैं।  परंतु ये वेदों के वाक्यों को प्रमाणभूत नहीं मानते। वह मानते हैं कि वेद वाक्य प्रमाण हो भी सकता हैं और नहीं भी हो सकता है। 

नौंवा और अंतिम दर्शन है चार्वाक दर्शन। चार्वाक दर्शन रहस्य को नहीं मानता है। वह भोगों को मानता है:

यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।। 

अर्थात् जब तक जीवन है, सुख से जियो, भोग-आनंद करो। यह देह भस्मीभूत होने के बाद कहाँ पुनः आना है।  

चार्वाक दर्शन कहता है कि सब कुछ यहीं, इसी संसार में है, इसीलिए सब भोग लो क्योंकि उसके बाद जन्म ही नहीं है। इस संसार से बाहर कुछ होता तो जन्म होता। कुछ नहीं है इसीलिए जन्म भी नहीं है। आत्मा, परमात्मा, सत्संग – यह सब कुछ नहीं होता, इसका कोई लाभ नहीं। इस दर्शन के अनुसार: 

त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः। बुद्धि पौरुष हीनानां जीविका धातु निर्मिता।। 

अर्थात् बुद्धि और पौरुष बिना के लोग ऐसी लोक-परलोक की बातें करते रहते हैं। 

इन सबका उत्तर वैदिक दर्शन में, न्याय व वैशेषिक आदि में बहुत  विस्तारपूर्वक दिया गया है। यदि एकाग्रचित्त होकर पढ़ेंगे तो संपूर्ण दर्शन समझ में आ जाएगा। 

इस तरह से नास्तिक दर्शन और आस्तिक दर्शन, दोनों दर्शन हैं। पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष दोनों हैं। प्रत्येक तथ्य यहाँ तर्क से स्पष्ट किया गया है।  दर्शन शास्त्र में कुछ भी तर्क अथवा अर्थ के परे नहीं है। बुद्धि के साक्षात्कार की भूमिका पर आकर जो लिखा गया वो दर्शन शास्त्र है। 

इसके लिए गीता में स्वयं कृष्ण ने ही ‘ज्ञान क्या है’ ये बताया है:

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥

अध्यात्मज्ञान में स्थित होना और तत्वज्ञान के अर्थ में परमात्मा को ही देखना (जो दर्शन शास्त्र बताता है),वही ज्ञान है। तत्वज्ञान कराने वाला जो दर्शनशास्त्र है, वह मेरे मत में ज्ञान है, और अन्य सब अज्ञान है। 

तो दर्शन शास्त्र क्या है? ऋषि-मुनियों ने जो अलग-अलग मार्गों से अनुभूति करी – सृष्टि कैसे बनी, कौन चलाता है, कैसे चलती है, आदि, उस अनुभूति से जो भिन्न-भिन्न वाक्य निकले, जिनकी दिशा भिन्न हैं, कहने की विधि भिन्न है, लेकिन पहुँचना एक ही स्थान/लक्ष्य पर है- मुक्ति! मोक्ष!; इन अनुभवों का, देखी हुई अनुभूतियों का नाम दर्शन है। 

वैदिक ज्ञान की सूक्ष्म समझ का उदाहरण: न्याय दर्शन अथवा भारतीय भौतिक शास्त्र/भौतिकी (Indian Physics)

आधुनिक विज्ञान ने लगभग 1800 ई. में परमाणु (atom) की व्याख्या करी तथा उस पर शोध आरम्भ किया। 

न्याय दर्शन, जिसे Indian physics कहा जाता है, उसके रचयिता गौतम मुनि ने परमाणु के बारे में लिखा है। परमाणु शब्द, आज जिसे हम atom कहते हैं, वो वेदों के बाद,पहली बार गौतम मुनि ने बताया है। परमाणु की व्यवस्थित व्याख्या; परमाणु क्या होता है; इतना सूक्ष्म होता है कि दिखता नहीं है, तो भी वह होता है; उसका यथार्थ माप, परिमाण; उसकी शक्ति; यह पूर्ण विवरण गौतम मुनि ने लिखित किया।  जिस समय यूरोप ने परमाणु की कल्पना भी नहीं करी थी, तब परमाणु का पूरा विवरण गौतम मुनि ने लिखा था। 

जालान्तर्गते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः । तस्य षष्ठतमो भागः परमाणुः स उच्यते ।।

वातायन के जाल से (खिड़की से) अंदर आती सूर्य की किरणों में जो अति लघु कण दिखते हैं, उसके छठे भाग को परमाणु कहते हैं। 

यह उदाहरण दर्शाता है की न तो वैदिक ज्ञान लुप्तप्रयोग अथवा अप्रचलित (obsolete) है तथा न ही ये व्यर्थ अथवा अप्रासंगिक (irrelevant) है। आधुनिक विज्ञान के तीनों भागों – भौतिक शास्त्र (physics), रसायन शास्त्र (chemistry) और जीव शास्त्र (biology, zoology) का उद्भव इसी भारतीय दर्शन से हुआ है। इसके सभी मूलभूत सिद्धांतों को जानना, वैदिक विद्या को पढना व सीखना, आज के समय में प्रखरतम, तेजस्वी व रचनात्मक वैज्ञानिक व दार्शनिक दोनों बना सकता है। 

इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन: । मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु स: ।।

भगवद्गीता 3.42

इंद्रियों के परे मन है, मन के परे बुद्धि है और बुद्धि के भी परे आत्मा है ।

यात्रा जारी है….

टिकटॉक, इंद्रजीत और अक्षपाद

आज भारत में कई अन्य एप्प के साथ साथ टिकटॉक भी बंद हो गया है (वर्तमान में तो हो गया है, भविष्य के बारे में ज्ञात नहीं)। भयंकर हलचल है अंतर्जाल पर! जीवन, जीवन का सार, जीविका, जिजीविषा – न जाने क्या क्या छिन्न-भिन्न हो गया है कितने भारतीय नागरिकों का । विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर विविध प्रकार की प्रक्रियाएँ हैं। कहीं लोग दुःखी हैं कि नेत्रों को शांति देने का साधन छिन गया। कहीं लोग चिंतामुक्त हैं कि जो दृष्टि-पंक इतनों (विशेषकर युवाओं) को घेरे था, वहाँ निर्मल जल आने का मार्ग बना । कुछ संस्थाएँ भारतीयता के नाम पर उसका विकल्प, दृष्टि-पंक के एक दूसरे कुंड के रूप में क्रय-विक्रय करने के लिए प्रस्तुत हैं ।

आज चक्षुरिन्द्रीय परोक्ष रूप से सबकी चर्चा का केंद्र हैं क्योंकि इसके आकर्षण के कारण आज भारत में टिकटॉक के लगभग 12 करोड़ उपभोक्ता हैं।

चक्षुरिन्द्रीय को कुछ भारतीय पंक परोसने के इस कोलाहल में चलिए , कुछ इसके दार्शनिक ज्ञान अर्जन का भी प्रयास करते हैं। भारतीय ज्ञान व दर्शन के अनुसार मनुष्य की पाँच कर्मेन्द्रियाँ व पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। कर्मेन्द्रियाँ जो हमें कार्य करने में सहायता करती हैं। व ज्ञानेन्द्रियाँ जो हमें किसी पदार्थ ,तत्व के लक्षण अथवा गुण का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाती हैं। ये पाँच हैं – घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, त्वगेन्द्रिय व श्रवणेन्द्रिय । ये इन्द्रियाँ क्रमशः हमारी नासिका, जिह्वा, नेत्रों, त्वचा व कर्णों में स्थित होती हैं। इनके लक्षण या अर्थ हैं – गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द।

चक्षुरिन्द्रिय हमें देखने की क्षमता प्रदान करती हैं। सभी ज्ञानेंद्रियों से सुसज्जित हम इन्हें अपनी सामान्य क्षमता का भाग मानकर इसे ‘taken for granted’ लेकर चलते हैं। इनमें चक्षुरिन्द्रिय कदाचित सर्वाधिक मूल्यवान मानी जाती हैं। इस इन्द्रिय के निष्क्रिय होने से हमें सबसे अधिक बाधा होती है। टिकटॉक की सामग्री सेवन के लिए भी इसी इन्द्रिय का सर्वाधिक प्रयोग होता है।

न्याय शास्त्र कहता है :

चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रुपम् ।

 चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वे सति गुणत्वं रुपत्वम्।

जिस गुण का ग्रहण मात्र चक्षु इन्द्रिय के द्वारा ही किया जाता है, उसे रूप कहते हैं। अर्थात् जो केवल रूप मात्र का ग्रहण करे, रूप से इतर जो विशेष गुण ग्रहण न करे, उसे चक्षु इन्द्रिय कहते हैं।

यही टिकटॉक के उपभोक्ता करते हैं! इस इन्द्रिय का अच्छा अधिष्ठान कर लिया है।

इस इन्द्रिय के एक अन्य पक्ष का मेरा अनुभव इससे भिन्न है । जीवन में कई बार दृष्टि बाधित बच्चों/ वयस्कों के साथ काम करने का, उनके साथ समय बिताने का उनकी किसी प्रकार की सहायता करने का अवसर मिला है। उस समय जब भारत में ऑडियो बुक्स और पॉडकास्ट प्रचलित नहीं थे (टिकटॉक तो बहुत दूर की बात है), हम कार्यालय के मित्र मिलकर एक दृष्टि-बाधित बालिकाओं के विद्यालय के लिए उनकी पाठ्य पुस्तकें रेकॉर्ड किया करते थे (आप वॉकमैन जानते हों कदाचित)। उस विद्यालय की संस्थापक व प्रबंधक ने (जो स्वयं दृष्टि-बाधित हैं) अपने जीवन की आई बाधाओं से सीखकर ऐसी कई अन्य बालिकाओं के जीवन को आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता से परिपूर्ण करने का बीड़ा उठाया था। आज भी उनकी संस्था इस क्षेत्र में एक प्रखर व अग्रणी संस्था के रूप में सम्मानित है। एक अन्य संस्था ऐसी वयस्क होते बालक-बालिकाओं को जीविका के लिए कुछ विद्या, कला व शिक्षा देने के क्षेत्र में कार्यरत है। उनमें से एक बड़ी संख्या संगणक (computer) प्रक्षिक्षण प्राप्त करती है और अनेक तेजस्वी प्रोग्रामर समाज को दे चुकी है। इन सभी स्थानों में एक भी बालक ऐसा नहीं मिला जो चक्षुरिन्द्रिय के अभाव में दुःखी हो अथवा उस कारण अपने आप को कोई भी कार्य करने में असमर्थ समझते हों।

कितना भयंकर विरोधाभास है कि टिकटॉक पर प्रतिबंध से कितने युवा चक्षुरिन्द्रिय के मनोरंजन वंचित होने से दुखी हैं।

अभी कुछ दिन पूर्व ट्विटर पर एक वीडियो देखा था एक दृष्टि-बाधित, नेत्रहीन युवक का । उसका नाम इंद्रजीत है, बड़ी प्रसन्नता से मग्न हो कर वो शिव तांडव स्तोत्र गा रहा है (credit: Youtube channel bihar mail)।

ये वीडियो देखकर मुझे इंद्रजीत शब्द का उसके सही स्वरूप में अर्थ धारण हुआ। इंद्रजीत (संस्कृत – इंद्रजित्)  अर्थात् अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला। वो जो इन्द्रियों पर निर्भर न रहे। ये नवयुवक उचित अर्थ में इंद्रजीत है। इसकी अपनी चक्षुरिंद्रिय पर किंचित भी निर्भरता नहीं है। इसने वास्तविक अर्थ में अपनी इंद्रिय को जीत लिया है।

एक अन्य परिपेक्ष्य हैं गौतम मुनि का।  न्याय सूत्र या न्यायशास्त्र के प्रवर्तक प्रणेता, जिनका औपाधिक नाम अक्षपाद भी है। अक्षपाद अर्थात् वह जिसमें गति व दृष्टि दोनों हों। इसकी कथा है कि गौतम मुनि का मन निरंतर तत्व चिंतन में लगा रहता था । नेत्र को मन का सहयोग नहीं मिल पाता था, अतः वे चलते-चलते प्रायः गिर जाया करते थे और आहत हो जाते थे। इस लिए महेश्वर ने कृपा कर उनके पैर में एक ऐसे नये नेत्र की रचना कर दी जिसे मन के सहयोग की अपेक्षा ना थी । इस नये नेत्र के मिलने से वे अक्षपाद  नाम से प्रसिद्ध हुए। और इससे उनके दोनों कार्यों – चलने फिरने तथा तत्वचिंतन करने की बाधाएँ दूर हो गयीं । भारतीय प्रमेयप्रधान न्याय दर्शन को किस पद पर उन्होंने आसीन किया है, ये मुझे कहने की आवश्यकता भी नहीं है।

महेश्वर तो स्वयं त्रिनेत्रधारि हैं, यद्यपि उनका तीसरा नेत्र ज्ञानचक्षु है। उसकी पात्रता की अपेक्षा आज के टिकटॉक योद्धाओं से करना अपनी ही मानहानि करना है।

इन दोनों दृष्टांतों के बाद टिकटॉक पर पूर्णतया आश्रित इन कोटि कोटि युवाओं को देखकर रिक्तता का, खेद का अनुभव होता है। इनसे क्या अपेक्षा कर सकते हैं – इंद्रजीत अथवा अक्षपाद बनने या होने की ? ये कोटि कोटि उपभोक्ता जो अपने दृष्टिसुख (व किंचित श्रवणसुख) के लिए अपना बहुत कुछ विस्मरण कर २ घड़ी के विडीओ के लिए अपनी मनोस्थिति को रुग्ण व आहत कर रहे हैं और उन्हें आभास भी नहीं है।

अब टिकटॉक गया तो कोई भारतीय ऐप उन्हें इस अंतहीन अतृप्त कामना की मरीचिका में ले जाने को तत्पर है।

मेरे चक्षुरिंद्रिय अनेकों इंद्रजीत व अक्षपाद देखने को लालायित है, आशान्वित है!

न जातु काम: कामनामुपभोगेन शाम्यति

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाऽभिवर्धते।।

मनुस्मृति २।६४

मनुष्य की कामनाएँ भोग करने से तृप्त नहीं होतीं, किंतु जैसे अग्नि की ज्वाला घृत डालने से बढ़ती है, इसी प्रकार कामनाएँ भोग करने से और अधिक बढ़ जाती हैं।

यात्रा जारी है……

Why this blog?

Here is why I have started writing this blog called ‘Journey to Brahm Varchas’.

Through this blog, I want to share my journey of a beautiful lifelong saadhana that I have started to connect to Bharat’s very strong and evolved vedic foundations that can shape the current India !

Time is always in motion in form of Kaalchakra. Life would have changed a lot in the last 5 years for many. My life has changed a lot as well – from what I used to be to what I am now – personally, professionally, mentally and spiritually – and is still changing, progressing.

What I used to be..

What I am now..

A lot of people I know, find these changes somewhat unbelievable, bold, daring, unrealistic, motivating…I can add on a lot to this list 🙂 Whatever might be their observation, one thing that all of them say unequivocally is that I should share these experiences, the changes, various learnings and the uniqueness (they see it as so!) in my perspective.

While my perspective may or may not be unique, but as someone who now has seen both ways of life – the modern world way of life and the vedic-satvic way of life – I can now see and understand a lot of what is truly different, what surprises and difficulties one faces if adapting to a vedic lifestyle. Thus, I draw very different observations and sometimes even conclusions from the same situation that I used to ascertain differently earlier. And I am here to share them with you. I would try to write both in Hindi and English languages.

There isn’t going to be any chronology in which I knit and share my experiences and learnings, so enjoy the waves as they come!

~ Anshu