राष्ट्रवादी उपभोक्ता बनेंगे ?

राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में समर्थ होना चाहेंगे या असमर्थ रहना चाहेंगे ?

आपने शायद वो विडिओ देखा होगा चीन का मनी ट्रैप – यानि उसके पैसे के जाल के बारे में। कैसे चीन पहले सहायता के लिये लोन देता है और देशों के वापस ना चुकाने पर धीरे धीरे उस देश के संसाधनों और स्थानों तक पर अपना कानूनी रूप से वैध अधिकार कर लेता है। धीरे-धीरे कई देशों में ऐसा कर रहा है और अपने सिल्क-रूट पर कार्य कर रहा है। हम ये सोच कर खुश हो जाते हैं कि भारत की ऐसी स्थिति नहीं है तो हम सुरक्षित हैं । क्योंकि मोदी जी अन्य देशों के साथ सफल सामरिक व कूटनैतिक संबंधों के द्वारा सिल्क-रूट के षड्यन्त्र से भली-भाँति निबट रहे हैं, हम सुरक्षित हैं । बड़े बड़े सुरक्षा और आधारभूत इन्फ्रस्ट्रक्चर की वस्तुओं के भारत में निर्माण से हमें बल मिलता है, उसकी ओर सकारात्मक कदम बढ़ रहे हैं, इसलिए हम सुरक्षित हैं।
केवल इतना ही सोचकर निश्चिंत ना हो जाईये ! हम में से प्रत्येक का जो दायित्व है, राष्ट्रधर्म है उसका हम सबको अपने अपने स्तर पर ही पालन करना है। आप और हम उसमें कहाँ आते हैं, ये समझना चाहिए।
क्योंकि भारत बाकी देशों जैसा नहीं है, इसीलिए भारत के लिये चीन की रणनीति भी बाकी देशों जैसी नहीं है । उसका एक पक्ष ये है कि उसे भारत का आर्थिक नियंत्रण नहीं प्राप्त करना बल्कि उसे आर्थिक रूप से दुर्बल करना है, अस्थिर करना है, आर्थिक अराजकता फैलानी है।
यहाँ आर्थिक निर्भरता बनाने के लिये उसकी भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या पर निवेश का रास्ता लिया है। भारत के बाजार कर दोधारी निशाना है – एक फुटकर बाजार जिसे आप और हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं और दूसरा स्टार्ट-अप में निवेश । दोनों जगह दृष्टि में आए ऐसे बड़े बड़े नाम उसका लक्ष्य नहीं है, अपितु उसका लक्ष्य है साधारण उपभोक्ता-आप और हम! उपभोक्ता बाजार में ‘मेड इन चाइना’ को तो हम जानते ही हैं। बीच-बीच में ‘स्वदेशी ही लो’ की हवा चलती है किन्तु अंततः साधारण भारतीय उपभोक्ता सस्ता होने के कारण और सुलभता से उपलब्ध होने के कारण अभी भी अधिकतर चीन का बना सामान ही प्रयोग कर रहा है। ट्विटर की जागरूकता बहुत ही छोटे स्तर की होती है, उसे पूरे भारत का व्यवहार और उत्तर समझने की भूल हम ना करें तो अच्छा। फुटकर व्यापारी चीन के बने उत्पाद बहुत सरलता से, अत्यधिक उधार पर प्राप्त कर सकते हैं अतः धीरे-धीरे गोली-टॉफी तक यहाँ बनाना छोड़कर वही से आयात करने लगे हैं । हम सबको अपने परफेक्ट घर के परफेक्ट मंदिर में परफेक्ट मूर्ति चाहिए तो दीपावली पर एकदम समकोणीय सुंदर दिखने वाली लक्ष्मी-गणेश ही आते हैं जो पास के बाजार में मिल जाए। ट्विटर के फोटो-ओप में मिट्टी का सामान बनाने वाले या बेचने वाले से ही अंततः विसर्जन करने के लिये लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं लेने के आह्वान सीमित होते हैं; व्यापक स्तर पर बाजार में क्या उपलब्ध है और लोग क्या ले रहे हैं, एक दृष्टि डालने पर दिख जाता है। ये तो हमारी संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव की बात है, साधारण जीवन की मूल आवश्यकताओं के साधनों और उत्पादों के तो असंख्य उदाहरण हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार-नियमों के चलते सरकार एक सीमा के बाद इस पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, लेकिन चीन को रोकने की पूरी आशा हम केवल सरकार/शासन से रखते हैं । फुटकर व्यापारी थोक विक्रेता का ग्राहक है और थोक विक्रेता चीन की महा-थोक, सस्ती और निरंतर आपूर्ति का। फुटकर और थोक व्यापारी की अधिक से अधिक लाभ कमाने की मूलभूल अपेक्षा है। वो अपना लाभ की मात्रा में कोई कमी नहीं चाहते और उपभोक्ता के रूप में हमें सबसे सस्ता और घर के बगल वाली दुकान में मिलने वाला सामान ही चाहिए।
उसी प्रकार वैसे तो स्टार्ट-अप के जगत में बहुत सारा विदेशी निवेश लगता है और चीन के निवेश की पूँजी छोटी लगती है – कुछ ६-७ बिलियन अमरीकी डॉलर ! कहा जाता है कि सरकार के लगाए प्रतिबंधों के बाद तो इस निवेश में और भी कमी आई है क्योंकि स्टार्ट-अप अन्य विदेशी निवेशकों से और भारत में से ही बहुत धन इकट्ठा कर ले रहे हैं। केवल बड़े-बड़े कुछ स्टार्ट-अप में चीन का पैसा लगा है (2020 में भारत के 24 में से 17 यूनीकॉर्न्स में चीन का प्रत्यक्ष निवेश था जिसमें अलीबाबा और टेनसेंट मुख्य थे, एन्ट फाइनैन्शल अलीबाबा की ही सहबद्ध कंपनी है)। आज byju, zomato जैसे कुछ का उदाहरण दे कर बताया जाता है कि चीन का निवेश भ्रम है, इन्होंने कितनी तेजी से चीन के निवेश से अपनी निर्भरता हटा ली और हम मान लेते हैं कि ऐसा ही है । जिन जिन प्रकाशन समूहों में ये बताते हुए आलेख-आर्टिकल आते हैं उनके नाम देखिएगा कभी। भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भ्रष्टाचार से ग्रसित है, ये हम केवल राजनैतिक चर्चाएं करते समय ध्यान में रखते हैं लेकिन ऐसे बिजनस आर्टिकल पढ़ते समय भूल जाते हैं। लेकिन छोटे-छोटे कितने ही स्टार्ट-अप की निवेश की पहली पसंद या विकल्प कोई चीनी निवेशक या निवेश कंपनी ही होती है। बहुत से ऐसे लोगों को निजी रूप से जानती हूँ।
परोक्ष रूप से चीन क्या कर रहा है और किस प्रकार अमेरिका में वेन्चर केपिटल कंपनियाँ बना के छद्म वेश में निवेश कर रहा है, ये भी कम ही लोग जानते हैं। ट्रम्प के शासन तंत्र ने बहुत सी ऐसी कंपनियों को बंद किया, उन के दाँत कुंद किये, तो व्यापार जगत ने बहुत भर्त्सना करी (र.र. शब्द का प्रयोग करने का बड़ा मन है यहाँ!) । वहाँ भी ‘करेला, वो भी नीम चढ़ा’ तब हो जाता है जब सारी व्यापारी दुनिया कहती है (भारत की विशेष रूप से) कि राजनीति और व्यापार को अलग रखना चाहिए। कदाचित उसका निहित आर्थिक स्वार्थ इतना अधिक है कि ये समझ नहीं पाती कि चीन का हर कदम वैश्विक राजनीति से प्रेरित है। जैक मा (की कंपनी अलीबाबा) ने भारत में निवेश को केवल व्यापारिक दृष्टि से नाप-तोल कर विवेकपूर्ण व्यवहार करना शुरू किया और अपने देश में भी शासन से अलग आर्थिक स्वावलंबन की राह पर चलने का प्रयास किया तो, एक दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी कंपनी को रातों-रात क्या बना दिया गया !और जैक मा ऐसे अंतर्ध्यान हुये कि कभी-कभी ही कहीं-कहीं ही दिखते हैं अब!
पेटीएम का उदाहरण देखिए। एक भारतीय के विचार और प्रयास पर चीन ने भरपूर पैसा लगाया । सबसे अधिक प्रचलित हुआ, उपभोक्ता ने हाथोंहाथ लिया । सरकार ने भी विमुद्रीकरण लागू होने पर उसका लाभ लिया और जनता ने भी । धीरे-धीरे प्रकल्प सफेद हाथी बन गया । अब चंद्रशेखर जी का राष्ट्रीय स्वावलंबन जागा या आत्मनिर्भरता का भाव अथवा कोश के खाली होने और निवेशकों के हाथ खींचने की स्थिति बन गई – जिस भी वजह से, आईपीओ आया… और लगभग मुँह के बल ही गिरा। भारत के फुटकर उपभोक्ता ने जरूरत के समय उसका बहुत लाभ लिया पर जब निवेशक के रूप में आया तो बोला “ नहीं भाई, ओवरप्राइस्ड है, कोई फायदा नहीं, मत-लो/बेचो !” भारत में ही बने, भारतीयों के लिये ही बने एक उत्पाद को बनाए रखने के लिये भी राष्ट्रीयता नहीं, निजी लाभ ही मुख्य बन गया । ये केवल एक उदाहरण दिया यहाँ !
ऐसे ही अवसर चीन पूरी मेहनत से, समय लगा के, बुन-बुनकर आपके सामने परोसता रहा है और रहेगा। और हम जब तक हमारी अपनी निजता को बहुत छोटा और प्रभावहीन मानते हुए, अपने नित्य जीवन और राष्ट्रीयता को दो अलग अलग पदार्थ मानते रहेंगे, सुख और हित में से सुख को चुनते रहेंगे, तब तक ठगे जाते रहेंगे और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिये अपने हिस्से का योगदान देने में असमर्थ रहेंगे।

सुता चली ससुराल!

नारी की यह प्रतिष्ठा, अविवाहितावस्था का स्वातंत्र्य, गृहव्यवस्था की स्वामिनी रूप में परिवर्तन, धर्म व्यवस्था शिक्षा का संतान को परंपरागत रूप में हस्तांतरण, पुरुष को संरक्षण व पोषण के लिए दिया जाने वाला दायित्व और ज्ञान-विज्ञान जैसे गंभीर विषय पर प्रभुत्व – पश्चिम के प्रकाश में सुधार की धूसित धारणा रखने वाले लोगों विशेषकर देवियों को अब भी पथ-प्रदर्शन के लिए पर्याप्त है।

शादी करके लड़कियों को ही पति के घर क्यों जाना होता है ? इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास..

जिस वैदिक समाज की आदिम वैवाहिक कल्पना ‘सूर्या’ के रूप में ऋग्वेद में प्रस्तुत की है, उसकी कल्पना न जाने कितनी शत-सहस्त्राब्दियों के बाद भी समाज में यथावत देखी जा सकती है। ऋषिका सूर्या का ऋग्वेद के दसवें मण्डल में सूक्त है:

सम्राज्ञी श्वसुरे भव सम्राज्ञी श्वश्रवा भव। ननांदरी सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधिदेवेषु । ।

अर्थात, हे वधु, तू ससुराल जाकर (अपने सदाचरण और सबके साथ अच्छे बर्ताव से) सास ससुर नंद के ऊपर अधिपत्य जमाकर सर्वत्र महारानी होकर रह!

कारण अवलोकन :

(1) ये परंपरा यानि कन्या का विवाह कर के अपने वर/पति के घर जाना ऋग्वैदिक काल से है और थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ अभी तक समाज में यथावत है। कोई व्यवस्था यदि सर्वहितकारी नहीं होती तो इतने लंबे समय तक टिक नहीं पाती। तो पहली बात ये इतनी प्राचीन है। पुराणों के काल से भी पहले की प्रथा, अतः परंपरा। पुराणों की बात इसलिए कि कई प्रकार का दूषण उसके बाद से आना आरम्भ हुआ जब गूढ़ ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों तक सरलता से समझाने के लिए लाक्षणिक भाषा में कथाओं और पात्रों की रचना हुई, जिसका अक्षरशः और स्थूल अर्थ लेकर के भ्रांतियों या ऐसी मान्यताओं का प्रसार हुआ जो तार्किक नहीं लगतीं। 

एक तर्क जो इस प्रथा के बदलाव के पक्ष में दिया जाता है कि सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएँ भी बंद हुईं और यह इस बात का द्योतक है कि निरंतर परिवर्तनशीलता व ‘सुधार’ हमारे धर्म का, सनातन का परिचायक है इसलिए इस प्रथा (विवाह कर के कन्या का ससुराल जाना) को भी क्यों न बदलें! तो पहली बात यह कुप्रथा नहीं प्रथा है। प्रथा केवल इसलिए बदलनी चाहिए क्योंकि वह पुरानी है, कुछ उचित तर्क नहीं लगता। दूसरा, सती भी प्रथा नहीं थी। आपने और हमने जो देखा सुना है वह अधिकतर ताज़े लिखे इतिहास में पढ़ा है और राजा राममोहन राय जैसे समाज ‘सुधारकों’ के जीवन चरित्र के माध्यम से जानते हैं। पहले तो उसकी तह तक जाकर देखिए की क्या यह प्रथा थी? – देशव्यापि और चिरकालीन? अथवा क्षेत्र विशेष में कुछ समय के लिए आयी विसंगति! दूसरा, राजपूतों के रण पश्चात होने वाले जौहर को यदि हम सती-प्रथा मानते हैं तो ये ठीक नहीं। ऐसा ही कुछ बाल-विवाह के साथ है। बाल-विवाह को चिर कालिक प्रथा मानते हों तो खोजें-पढ़ें कि लड़कियों की शिक्षा 16-17 वर्ष की आयु तक होती थी और लड़कों की 25 वर्ष तक। इस आयु में विवाह होने को बाल-विवाह कहा जाएगा ? तो इस विसंगति के आरम्भ होने का काल ढूंढें और कारण भी। तो पहला बिंदु यह है कि यह प्रथा वैदिक काल से ही स्थापित है। ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित व्यवस्थाएँ बहुत सूक्ष्म, गहन चिंतन व परीक्षण के बाद स्थापित करीं गयीं थीं,जो बहुत लचीली हैं, यानी परिवर्तनशील होते हुए भी सशक्त सिद्धान्तों पर आधारित हैं जो पूर्णतया व्यावहारिक हैं। इसलिए इतने समय तक चल पा रहे हैं। 

एक किसी ने इस प्रश्न पर मत प्रकट किया था कि इसे बदलना समाज को तोड़ने या राष्ट्र को नष्ट करने की ओर एक कदम होगा, तो उसका बहुत उपहास व तिरस्कार किया गया। किसी भी एक ओर के अंतिम ध्रुव पर अपना विचार बाँधने की बजाय एक मूल बात मैं ये समझती हूँ कि पूर्वजों के अतीत को जानने की उत्कंठा व अभिलाषा हर मनुष्य की होती है। जब अपने ही जीवन की अतीत कालिक स्मृतियों को वह परम् समान व स्नेह की दृष्टि से देखते है भले ही वह सुख की हों या दुख की, ऐसे ही अपने प्राचीन ज्ञान व परम्परा भी हमारे राष्ट्र की स्मृतियाँ हैं, उन्हें खो देने पर हम राष्ट्र का अस्तित्व भी खोते जाते हैं। 

ऐसे में एक रोचक सत्य ये भी है दक्षिण भारत के कुछ प्रान्तों में, जहाँ मातृ-प्रधान समाज का रूप है, वहाँ लड़के विवाह करके लड़की के घर जाते हैं, गोत्रादि बदलते हैं, वंशवृक्ष मातृपक्ष (माता की सत्ता से, पिता की नहीं) से चलते हैं। इसका मूल वैदिक-प्रथाओं से ये अपभ्रंश क्यों और कैसे हुआ, यह जानना रोचक होगा। ऐसा सीमित क्षेत्रों व कुलों में ही होता है, सर्वव्यापि नहीं है। 

(2) नर और नारी की रचना में अंतर है। मानव शरीर सत, रज और तम, इन तीन गुणों से बनता है, उसमें ये तीन गुण होते हैं। नर सत प्रधान है और नारी रज प्रधान है। 

ईश्वर के अहंकार ने, सत से सृष्टि की रचना की प्रेरणा करी और प्रकृति ने रज से सृष्टि की रचना करी। स्त्री को प्रकृति ने जीवन सृजन का गुण व लक्षण दिया है। पतञ्जलि के अनुसार स्त्री का अर्थ है – ‘स्त्यापति अस्यां गर्भ इति स्त्री’ – नारी को स्त्री इस लिए कहते हैं कि गर्भ की स्थिति उसके भीतर होती है। रजोधर्म, गर्भधारण व स्तन्य (breast milk) स्त्री की योग्यता है। न्याय बताता है ‘गर्भधारण योगत्वं’ – गर्भधारण की योग्यता उसका लक्षण! मनुष्य होते हुए भी जिसमें स्तन्य योग्यत्व हो वह स्त्री है। इन लक्षणों का उद्देश्य फल या उपस्थिति का कारण है संतान उत्पत्ति (संतति अथवा प्रजा की वृद्धि) अर्थात मातृत्व की प्राप्ति। 

नर में केवल पुरुषत्व होता है और नारी में स्त्रीत्व और कन्यात्व दोनों होते हैं। वस्तुतः जब एक पिता विवाह संस्कार के समय पुत्री का हाथ जामाता के हाथ में देता है तो केवल उसके कन्यात्व का दान करता है, उसके स्त्रीत्व का नहीं। पाणिग्रहण संस्कार में उसके कन्यात्व अर्थात भोग्यत्व की योग्यता (उसके द्वारा सर्जन करे जाने की योग्यता) का अमूल्य दान कन्या का पिता वर को देकर उसके संरक्षण व पोषण का दायित्व वर को देता है (वर के परिवार को नहीं)। अपने ही घर में परिपक्व स्त्री होने पर भी वह संतान की छाया से बाहर नहीं आ पाती। जब तक स्त्री स्वयं संतान की भूमिका व भाव में रहेगी तो माँ होने के भाव का दमन रहेगा। उसका पूर्ण उत्तरदायित्व लेने का भाव सीमित रूप में जागृत रहेगा क्योंकि वह स्वयं अपना उत्तरदायित्व अपने माता-पिता पर छोड़े है। 

(3) स्त्री रजप्रधान है और पुरुष (नर) सत प्रधान है। रज कामना का, इच्छा का द्योतक है। रज प्रधान होने के कारण उसमें लालसा, इच्छा, चाह प्रबल होती है, अतः स्त्री का एक नाम (विशेषण रूपी) ‘ललना’ है। इसी रज गुण के कारण स्त्री प्रेम-प्रधान है (और सत गुण के कारण पुरुष तर्क-प्रधान), लज्जाशीलता उसकी सहज-प्रेरणा है, प्राकृतिक लक्षण है। जैसे छुई-मुई के पौधे का छूते ही सिकुड़ जाना उसका प्राकृतिक लक्षण है। प्रकृति ने इन्हें ऐसा बनाया है तो ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’ का विचार तर्क की परिधि से बाहर है। इन गुणों के कारण स्त्री की कोमलता को लता स्वरूप बताया जाता है जिसे बढ़ने के लिए आधार-आश्रय की आवश्यकता होती है। इसी लिए उसके कन्यात्व को वर को सौंपते हुए कन्या का पिता उसके संरक्षण व पोषण का दायित्व वर को देता है। वर अथवा पुरुष उसका संरक्षक व पोषक होता है, स्वामी नहीं, उसका अधिकार नहीं होता स्त्री पर क्योंकि स्त्रीत्व का तो दान ही नहीं दिया गया, केवल कन्यात्व का दिया गया है। जब संरक्षण व पोषण का दायित्व वर को सौंप दिया तो पिता के घर न रह कर स्त्री वर के घर जाती है क्योंकि वर अपने उत्तरदायित्व का वहन अपनी अनुकूल व प्रभावी परिस्थितियों में अधिक अच्छी प्रकार कर पायेगा। इसे लता के रूपक से समझते हैं कि लता बिना किसी सहारे के, भूमि पर पड़ी-पड़ी भी बढ़ सकती है, परंतु जब उसे उचित आश्रय मिलता है तब उसके गुण, शक्ति व फल-फूल पूर्ण व उत्तम रूप से आते हैं। जब उस लता रूपी स्त्री का दायित्व वर को सौंप दिया तो पोषक का दायित्व स्थानांतरित हो गया। वर का कन्या के घर आ जाना एक ही घर में दो संरक्षक/ पोषक की स्थिति उत्पन्न करता है। सोचिये इसमें सामंजस्य कब तक शान्तिपूर्वक रहेगा?

(4)स्त्री के प्रेम प्रधानता के दो स्वरूप होते हैं – भावुक या आश्रित (emotional or dependant)। किसी भी स्त्री पर ध्यान देंगे तो दोनों में एक स्वरूप स्पष्ट दिखेगा। पुरुष तर्क प्रधान है, उसके भी दो स्वरूप होते हैं – तार्किक या जड़। दोनों प्रकार के पुरुष का बाहरी स्वरूप एक ही होता है। जहाँ भावुकता की, प्रेम की आवश्यकता हो वहाँ पुरुष को पुरुषार्थ करना पड़ेगा और स्त्री में स्वाभाविक है। ऐसे ही यदि स्त्री को तार्किक बुद्धि विकसित करनी है तो उसे पुरुषार्थ करना पड़ेगा। अब तुलना करिए, कौन नई परिस्थितियों में प्रसन्नतापूर्वक व सुलभता से रह पायेगा, – जड़ या भावुक, तार्किक या आश्रित?

(5) नर बीज का दाता है (giver) और स्त्री बीज की पात्र है, ग्रहीता है (receiver)। प्रकृति ने बीज को पोषित कर उससे फल बनाने का दायित्व स्त्री को दिया है, प्रकृति दायित्व लेने वाले (receiver) को देती है, देने वाले (giver) को नहीं। देने और लेने वाले समानांतर कब होंगे?,जब देने वाले को भी कुछ उत्तरदायित्व हो। इसलिए ग्रहीता के संरक्षण व पोषण का, माता की देखभाल का उत्तरदायित्व नर अथवा वर को देने की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक व्यवस्था का सृजन हुआ। यदि उस स्थिति में बेटी पिता के ही घर पर है तो वर पूर्ण उत्तरदायित्व नहीं ले इसकी गहन संभावना सदैव रहेगी। 

‘स्थिरत्व’ स्त्री का प्राकृतिक गुण है (रज प्रधानता के कारण)। वह एक स्थिति या परिस्थिति में लंबे समय तक रह सकती है। पुरुष का प्राकृतिक गुण महत्वाकांक्षा है (सत गुण, अहंकार प्रधान होने के कारण), इस कारण वह एक स्थिति या परिस्थिति में अधिक समय तक नहीं रह सकता। ऐसे में पूर्णतया अनुकूल न होने पर भी नए स्थान पर रह पाना स्त्री के लिए सहज है, पुरुष के लिए कठिन है। एक पुरुष (पिता) की इच्छा (उसकी जड़ता) के लिए दूसरा पुरुष लंबे समय तक अनुकूल न होने पर अथवा निज जड़ता के कारण, लंबे समय तक उस स्थिति में सहजता से नहीं रह पायेगा। जबकि स्त्री दूसरी (वरिष्ठ) स्त्री के उपस्थिति व सत्ता में अपने भावुकता, आश्रितता व स्थिरत्व के प्राकृतिक गुण के कारण लंबे समय तक पूर्णतया अनुकूल न होने पर भी उस स्थिति में रह पाएगी। स्थिरत्व के गुण के अभाव के कारण पुरुष पारिवारिक संरचना में आत्म-वश्य, संचालनीय (self-manageable) बहुत कम होता है, ऐसे में स्त्री का उसके परिवार के संचालन के लिए उसके घर आना प्रायोगिक, वांछनीय है। स्थिरत्व, बुद्धि-बल (युक्ति-बल, काल-बल, व सहज-बल) के जो अवयव व्यवहार बल कहलाते हैं उसकी मात्रा स्त्री में कहीं अधिक है। गृह व्यवस्था का निर्वहन स्त्री सुलभ है। उस गृह की स्वामिनी होने का भाव उसके लिए आवश्यक है। अपने पिता के घर में गृहस्वामिनी का भाव आने की संभावना नहीं या अति क्षीण है। 

एक जगह पढ़ा तो बात तर्कसंगत लगी कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी स्त्री (अपनी पत्नी) के परिग्रह में रहने पर उन्हें कटु वचन कहे और अपने चरित्र की विशुद्धि की सफाई सीता को देनी पड़ी। तो क्या एक सामान्य कलियुगी नर मानव से अपेक्षा करी जा सकती है कि वह अन्य घर में (अपने पिता के घर में) रहने वाली अपनी पत्नी पर किसी प्रकार का अनुचित लांछन नहीं लगाता रहेगा? गृहस्थी की शांति के लिए सामान्य अवस्था में भी स्त्री के अपने पति के घर में रहने की व्यवस्था की परंपरा ही चली और रही भी। स्त्री का एक नाम ‘योषा’ है अर्थात जो पुरुष को अपने साथ जुटाती है। 

ऐसे ही स्त्री का एक नाम ‘मानिनी’ है। अर्थ विस्तृत है। स्त्री मानप्रिय है, रूठने पर मनाए जाने की आकांक्षा वाली है, दूसरे उसमें स्वाभिमान व आत्मसम्मान की भावना तीव्र होती है और साथ ही साथ अपनत्व की भावना भी।   

समाज में पतनसूचक आये दो परिवर्तन इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य हैं।  पहला – चार प्रकार के बल में पुरुष में अर्थ-बल और काम-बल( पौरुषत्व, कर्म को सिद्ध करने की शारीरिक क्षमता) स्त्री की अपेक्षा अधिक होने पर उसने संरक्षक व पोषक की भूमिका को अर्थ-बल के कारण अधिकार व स्वामित्व मान लेना आरम्भ किया और काम-बल का स्त्री के भावुक व आश्रित- सहज-प्रेरित/प्राकृतिक गुणों का दमन करने के लिए प्रयोग करना आरम्भ किया। फलस्वरूप अन्य दो बलों (बुद्धि-बल/व्यवहार-बल व प्रतिकार-बल) को हीन और अर्थ-बल व काम-बल को श्रेष्ठ मानने लगा। दूसरा-  स्त्री की आश्रितता के मूलभूत गुण को ठेस लगने से और आत्मसम्मान व स्वाभिमान की भावना तीव्र होने से, उसने अपने को इन दोनों बलों अर्थात अर्थ-बल व काम-बल को विशेष पुरुषार्थ कर सशक्त करना आरम्भ कर दिया जिसका रूप हम आज के समय में जीविका-उपार्जन/धन-उपार्जन में कार्यरत स्त्रियों के रूप में देखते हैं। अपने काम-बल को अधिक दृढ़ करते-करते उसका पुरुषार्थ करते-करते आज वह हर उस क्षेत्र में कार्य करने को तुली है जहाँ स्वाभाविक शारीरिक बल ही अधिक चाहिए होता है और इसे जेंडर इक्वलिटी (gender equality) का सिद्धांत बना दिया गया है। इसका सीधा दुष्प्रभाव उसके आंतरिक अंगों और गृहस्थी पर पड़ता है।

 विवाह होने पर स्त्री किसी की कन्या न होकर पत्नी हो जाती है (कन्यात्व का दान पाणिग्रहण के समय होता है)। पिता पुरुष है – तर्कप्रधान, जड़, भावुकता के अपेक्षाकृत अभाव वाला (यहाँ सबके प्रति सामान्यतः भावुकता की बात है केवल अपनी पुत्री के प्रति नहीं) और महत्वाकांक्षी! परिस्थिति का संतुलन, लचीलापन, कन्या से मातृत्व में परिवर्तन, गृहव्यवस्था में परिवर्तन, संतान से गृह स्वामिनी होने का भाव – यह सब पुत्री एक स्त्री होने के कारण बहुत सहजता से जी लेगी परंतु पिता और पति इतने सारे परिवर्तन पुरुष होने के कारण इतनी सहजता से नहीं जी पाएंगे। 

परिवार, पीढ़ी और अंततः संस्कृति सहज और सुचारू रूप से कैसे चले, ये ही विचार कर हमारे अति ज्ञानी पूर्वज ऋषि-मुनियों ने ऐसी कालातीत (timeless) परम्पराएँ स्थापित करी हैं जो अत्यंत दूरगामी परिणाम देने वाली, सशक्त और समाज को सदैव विकास की ओर अग्रसर रखने वाली हैं। आजकल के हम सभों की समस्या यह लगती है की एक तो हम ऋषि-मुनियों को अपने से कुछ ही बेहतर (marginally better) समझते हैं, उनकी पारगामी बुद्धि की योग्यता का आकलन अपनी सीमित बुद्धि से करते हैं इसलिए स्वीकार नहीं कर पाते की मानव जीवन, समाज व राष्ट्र के विचार से गहन चिंतन, अनुभव व प्रयासों के बाद उन्होंने परम्पराएँ व व्यवस्थाएँ स्थापित करी हैं जो कालातीत होने में सक्षम हैं। हमें सब कुछ अविश्वास व प्रश्नवाचक दृष्टि से ही देखना है और मूल व दूषित में अंतर करने के विवेक को विकसित करने का प्रयास नहीं करना है। 

दूसरा, समय के साथ योजयनद्ध तरीके से हमारे दृष्टिकोण व सोच में जो पतित परिवर्तन लाया गया है, उसके चलते हम अपने संस्कार, परंपरा, व्यवस्था या जीवन-शैली को अति सरल होने के कारण उसे प्रभावी स्वीकार नहीं करते। उसे रूढ़ीवादी, अपूर्ण, अप्रासंगिक होने की दृष्टि से अधिक देखते हैं। चैतन्य को प्राप्त हमारे पूर्वज जिस स्तर पर चिंतन व मनन करते थे वह हमें उपलब्ध नहीं। उसके फलस्वरूप हमें सूत्रबद्ध ज्ञान, विज्ञान, विद्याएँ, कालजयी व्यवस्थाएँ प्राप्त हुई हैं। प्रभावी को जटिल (complex) होना आवश्यक नहीं, ये हमारी बहुत सारी परम्पराएँ सिद्ध करती हैं। 

घर के भीतर स्त्री समस्त व्यापार का केंद्र होती है। गृह व्यवस्था का निर्वहन (उसमें केवल भोजन पकाना कपड़े धोना नहीं, सब कुछ है), परिस्थिति संतुलन, स्थिरत्व उसे सुलभ व सहज है। विभिन्न वय एवं श्रेणी के पुरुषों से अलग न रहकर वह उनकी चर्चाओं, क्रियाओं और विचारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। क्या एक पिता जिसने उसे जन्म दिया, उसके ऐसा करने पर उसे इस परिपक्व दायित्व के अयोग्य समझें (कन्या संतान भाव के बने रहने के कारण), इसकी संभावना नहीं? गृहस्थी का मूल भार्या है, जो गृहस्वामिनी  होने पर स्त्री का परिवर्तित रूप है। वैदिक समाज की जो वैवाहिक कल्पना, कन्या की कल्पना ‘सूर्या’ के रूप में ऋग्वेद में प्रस्तुत करी है, वह यौवन के लक्षणों सहित हुई है और उसे स्वतः पति की कामना करने वाली सूचित किया है। अपने जीवन-संगी निर्वाचित करने की स्वाधीनता रखने वाली ये कुमारिकाएँ आधुनिक नहीं, ठेठ वैदिक काल की हैं। नारी की यह प्रतिष्ठा, अविवाहितावस्था का स्वातंत्र्य, गृहव्यवस्था की स्वामिनी रूप में परिवर्तन, धर्म व्यवस्था शिक्षा का संतान को परंपरागत रूप में हस्तांतरण, पुरुष को संरक्षण व पोषण के लिए दिया जाने वाला दायित्व और ज्ञान-विज्ञान जैसे गंभीर विषय पर प्रभुत्व – पश्चिम के प्रकाश में सुधार की धूसित धारणा रखने वाले लोगों विशेषकर देवियों को अब भी पथ-प्रदर्शन के लिए पर्याप्त है। 

हमारी भारतीय व्यवस्थाओं और पद्धति ने समाज के मनोनुकूल सुविधा प्रदान करके भी पवित्र परंपरा का जो अंकुश रखा है, उसकी कल्पना भी आधुनिक सुधारकों को मुश्किल ही छू सकी है। ये सामाजिक आधार की दूरदर्शी सुविधाएँ, हमारी पुरातन सभ्यता के मूल – निरंतर प्रगतिशीलता – पर ही टिकी हैं। प्रगतिशीलता व प्रगति को शुद्ध व विवेकी बुद्धि से समझना आवश्यक है। क्योंकि प्रगतिशील संस्कृति के सुदृढ़ सिद्धांत पर समाश्रित होने वाले समाज का अस्तित्व ही सदा अविचल रहता है। 


Is this the right path in the chaos?

Can we really sort a chaos by only being another voice adding to that chaos? Thinking that their voice is the sane one, the dharmiks also come and share their thoughts, knowledge and suggestions to rest of the world in the limited confinement of a social media platform. They (most likely) do that on more than one platform, each time in the confinement of that social media platform, talking in the format (micro-blog, audio-visual, Q-ans and so on) of that platform.

All this for explaining and bringing back people to something which is a complex system called sanatana, if I may call it so for the sake of discussion (see, I just did it by calling sanatana a system so that I can say what I have to say using the limited vocabulary and space I have got).

Why chaos? Because they are so many voices with each one saying ‘listen to me’. A knowledgeable and well-intentioned dharmik writes a book in an ‘acceptable’ language about certain aspect of santana, sharing deep insights, reasons, explainable tarkas and suggestions on how to start following it; but at the same time there are 100 other books written by modern hindus with the repackaged truth, they use the rules of the game and have better shelf availability of their book. This proportion of dharmik to modern hindus is what, 1:10 maybe 1:100? Dharmik’s book doesn’t reach the desired shelf, the desired audience. How is the audience supposed to know that the dharmik’s book is the genuine and better one? We blame the audience for not using their ‘viveka’ to choose, we blame them for not being the seeker and search for themselves but why do we forget that so many dharmic warriors have to come up because this collective ‘viveka’ is very weak and the spirit of being a seeker has been killed in a planned and structured manner in last few hundred years? So does the job start or end by simply calling them a failed collective? Does it solve the problem? No. They rather get further pushed away, as being defensive is in the DNA for atleast 2 to 3 generations now.

While doing manan I struggle with the question that can we really explain or move people to a complex system called santana or vedic sanskruti which is fluid, interdisciplinary and doesn’t use the tool-set which is popular or understood by people today?

This complex system which has been made surprisingly simple by our sages, great rushi-munis to understand and follow by knitting various practices, rules of life, sanskaras and biggest & oldest ever documented repository!

Using this repository and by being the pracharak shishya of the guru-shishya parampara, a big number of dharmiks are trying to bring the knowledge to people in an ‘acceptable format’ or ‘bite sized’ information (not gyan). Is that really the right step-by-step approach to ultimately bring all into the purview of understanding santana thoughts and practices completely and later start following them?

I also observe a lot of well-intentioned Hindu’s getting pulled into the same tricks of social media which they initially took up only to reach out to more people. The initial intension was noble but gradually they get taken over by the thought of talking to people in the language they understand, where the core problem is that the language (set of life practices, attitudes, approach) which is understood by all itself is very shallow, promotes alasya, wants everything to be served to a person instead of motivating the person to be a seeker and initiate the journey of being wiser than the previous day, every day.

Another example is where a lot of these dharmiks write smaller bite sized pieces to explain various aspects of sanatana in the modern understandable language and all the references they get to cite are non-Indian westerners? So, by giving reference of a recent researcher ( 50 -100 years is recent in this context) from the western world we try to ‘justify’ that that our age old knowledge and practices are scientific and relevant by putting them in a tool-set which is modern but very limited and certainly very different from the original tool-set where these practices were originated. Why are we unable to provide the vedic and shastriya-tarkik scientific explanation and have to switch to modern science process to explain it. The indic scientific explanation also goes to the last molecule of detail and in a simple way but every such explanation disappears in the chaos and the explanation using the modern scientific/technical language rather starts sounding like a rant.

I have my doubts if this is the right path. Can’t articulate all of them well here as my vaakpatuta isn’t good enough to bring all of them forth.

That is the reason I am sharing this open question to all!

I have seen a dharmiks sharing their disappointment at times on twitter, some are sad, some are angry, some are anguished, some seem to be giving up and but still trying their best to keep on the path as they realise it is a difficult one. But I have my doubts if this is the right path to reach the goal post we want to reach.

Rajiv Malhotra ji has been working on the project of creating ‘Intellectual Kshatriyas’ for long. He gets very annoyed at a lot of emotional hindus not been able to present their case well and defend sanatana and dharma. But some IKs that would have been created by now, are they visible? Or have they been lost to this chaos as well? If yes, then is this one of the right paths?

The fundamental question is, if I am willing to change the game itself because it is on shallow and incorrect grounds, doesn’t follow the right rules and has blind folded the participants/participants don’t want to play with blinds unfolded, Can I really change it by playing it, by being a part of the same game and playing it by same rules? It is beyond that point of metaphor that ‘if you want to understand the game, you will have to play it first’ as we have been part of this game for so long and now are willing to change it (atleast I have made this transition, some are lucky to always have been outside it) because we have understood it to be the faulty one with a adhogaami goal post.

Sanatana system has enormous experience of having set up the game from scratch, define the rules, enable the players with capabilities and skills, clearly define the goal posts and provide the attitude that there are various right paths to reach the goal posts. But the dharmiks are not able to create the new game. Prevailing conditions are already known like secular democracy, politics being priority of govt as it may be ruling but ultimately it is a political party, too much left ideology influence, conversion missions, religious extremism. My point is the game has to be designed to address these conditions/limitations so citing them as reasons doesn’t answer the question.

There is overload of indic information on twitter now, be it about temples, our pauranic tales, various roopa of Ishwara, Devi’s. But is that really serving the collective purpose that we want to achieve or is it just adding to the chaos?

This thought got triggered when I was reading this article on indictoday.com https://www.indictoday.com/quick-reads/balis-water-temples-understanding-technology-dharmic-rituals/ by Dr Nagendra Setumadhavrao

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः।  वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥

Charpatpanjarikastotram

The childhood is lost by attachment to playfulness. Youth is lost by attachment to woman. Old age passes away by thinking over many things. But there is hardly anyone who wants to be lost in parambrahman.

The journey continues…….